ISSN- 2278-4519
PEER REVIEW JOURNAL/REFEREED JOURNAL
RNI : UPBIL/2012/44732
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मोहन राकेश के नाटकों में पारिवारिक सम्बन्धों का विघटन- ’’आषाढ का एक दिन’’ के संदर्भ मे

डॉ0 मधुर बाला यादव
एसोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
पी0पी0एन0 कालेज, कानपुर

व्यक्ति वह नहीं, जो बाहर से दिखता है अपितु असली व्यक्ति वह है जो आदमीनुमा शक्ल का खोल ओढ़कर अपने भीतर एक और आदमी के लिए चलता है। यह तथ्य सामान्य व्यक्ति से लेकर कलाकार तक लागू होता है। मोहन राकेश के जीवन में तो इतने परिवर्तन और उलटफेर हुए है कि उनकी तह तक पहुॅचे बिना या कम से कम उसकी गहराईयों को जाने बिना न तो उनके व्यक्तित्व का सही विश्लेषण किया जा सकता है और न उसकी आदतों, रूचियों और प्रतिक्रियाओं का सही निर्णयात्मक हल ही ढूंढ़ा जा सकता है। राकेश एक कलाकार थे, जिसको एक ही सांस में ही सब कुछ नकारने की क्षमता थी। वो बहुत कुछ को एक साथ ही ग्रहण करने की शक्ति भी थी। आधुनिक बोध का यर्थाथवादी चितेरा कहानियों और उपन्यासों का थका-हारा किन्तु संभावना कुल व्यक्ति और नाटकों में अर्न्तमुख भावलयित चेहरे वाला मोहन राकेश आधुनिक युग का मोहन भी था और राकेश भी।
आषाढ़ का एक दिन 1958 ई0 में रचित महाकवि कालीदास के परिवेश रचना प्रक्रिया प्रेरणास्त्रोत आदि से सम्बन्धित नाटक कृति है। लेखक जब अपने परिवेश से कट जाता है तब उसकी लेखकीय क्षमता भी प्रभावित हो जाती है। कालीदास और मल्लिका के प्रेम पर आधारित ’’आषाढ़ का एक दिन’’ नाटककार की चर्चित रचना है।
नाटककार मोहन राकेश ने विभाजनेत्तर भारत में सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के फलस्वरूप व्यक्ति के जीवन में आने वाले मूल्यसंकट और सम्बन्धित घटना को अपना लक्ष्य बनाया है। जीवन में व्यक्तिगत रूप में इनका कटुतम अनुभव भोगने के कारण ही वे अपने नाटकों में उसे सजीव अभिव्यक्ति दे सकें। मोहन राकेश ने स्वीकार किया है कि ’’सोलह की उम्र में जिन्दगी ने एक चौखटे में फिट कर दिया था। जैसे भी हो, अपने को उस चौखटे के आकार में ढालना था। आँखें आस-पास की जिन्दगी के प्रति बहुत सतर्क हो रही थीं। अपने से बाहर घर को और घर से बाहर सामाजिक बन्धनों को प्रश्नात्मक दृष्टि से देखने लगी थी।’’1
इसी तरह मोहन राकेश का लेखन एक जटिल प्रक्रिया से गुजरा है। उन्होने बार-बार लिखा है कि अपने लिखे को अवास्तविक जानकार नकारा है। इसलिए कभी उन्हें लगता है कि ’’वह कुछ मेरे अंदर नहीं है जिससे व्यक्ति समुचित लिख सकता है, वरना लिखने के लिए क्या पहाड़ खोदने की जरूरत है।2
मोहन राकेश के नाटकों में पारिवारिक सम्बन्धों के विघटन का स्वरूप-
नाटककार मोहन राकेश वस्तुतः पारिवारिक जीवन की त्रासदी के ही कलाकार है। जीवन एक ऐसा विशाल रंगमंच है, जहाँ केवल त्रासदियाँ ही मंचित होती है संख वहाँ केवल पैर फिसलने पर पाँव की सिहरन मात्र है। गर्दिश के दिन में अपने को व्यक्त करते हुए राकेश ने लिखा है कि उन दिनों उनके लिखे शब्दों में अनायास ही जो एक कटुता घुल जाती है तो वे यह नहीं समझ पाते थे कि उसका वास्तविक स्त्रोंत अंदर का रिसता हुआ बिन्दु है। वास्तव में वर्तमान युग नायक का नहीं, अनाम और अपाहिज व्यक्ति का है, जिसकी संघर्ष यात्रा की घुटन, पीड़ा और करूण परिणति को आज साहित्य की प्रत्येक विधा मुखर कर रही है। इसलिए सामाजिक साहित्य में व्यक्ति के वाह्य संघर्ष के अपेक्षा आन्तरिक संघर्ष के चित्रण पर बल दिया है इस सम्बन्ध में ’’कुछ लोगों की जिन्दगी में विखराव होता है मै अपने को ऐसे ही लोगों में पाता हूँ बिखरना और बिखेरना मेरे लिए जितना स्वभाविक है सम्भलना और समेटना उतना ही अस्वाभविक है।3
मोहन राकेश के नाटक स्थितियों के नाटक है। मनुष्य जीवन के द्वन्द्वात्मक क्षणों को स्थितियों को ही वे नाटकों की कथावस्तु का रूप देते हैं। स्वातन्त्रयोत्तर भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के फलस्वरूप तीव्रता से घटित होने वाले मूल्य-विघटन और सम्बन्धों में आने वाली दरार को राकेश ने अपने नाटकों का केन्द्र बिन्दु बनाकर मानव जीवन के विस्फोटक और द्वन्द्वपूर्ण क्षणों की विरोधी स्थितियों के टकराव को प्रस्तुत किया है।
जीवन में निरन्तर भटकाव और कटु अनुभवों ने उन्हें मनुष्य के अधूरेपन और उसकी यातना पर केन्द्रित कर दिया था, मनुष्य का वहीं रूप उनके नाटकों के मुख्य पात्रों का वरण है- वरण और मुक्ति के लिए छटपटाते, अपने अधूरेपन को पूर्ण करने के लिए भटकते ये पात्र वर्तमान जीवन के एक पक्ष का सत्य चित्र प्रस्तुत करते हैं, पर पूर्ण नहीं, क्योंकि जीवन में तमाम विसंगति और अनास्था के बाद भी ’कुछ’ ऐसा है जिसके लिए मनुष्य जीता है। इसलिए राकेश के नाटक समाज की व्यापक समस्याओं से दूर नितान्त व्यक्तिपरक माने जायें, तो अत्युक्ति न होगी राकेश का यथार्थ आन्तरिक यथार्थ है उसमें परिस्थितियों के चित्रण की अपेक्षा परिस्थितियों से दबे मनुष्य की घुटन, द्वन्द्व और पीड़ा का वर्णन है। इस आन्तरिक यर्थाथ के चित्रण में उन्होेने मानवीय सम्बन्धों विशेषकर स्त्री-पुरूष सम्बन्धों का परिवर्तित परिस्थितियों तथा मानदण्डों के आधार पर सूक्ष्मतिसूक्ष्म पक्षों में उद्घाटन किया है।
राकेश ने अपने नाटकों में जिस प्रकार पुरूष के जीवन की मूल त्रासदी को व्यक्त किया है उसी प्रकार नारी जीवन की भी मूल त्रासदी को उजागर किया है। पुरूष प्रधान दृष्टिकोण से लिखे जाकर भी इनके नाटक नारी जीवन की मूल त्रासदी को उजागर करते हैं। पारिवारिक जीवन में त्रासदी का सम्बन्ध दोनो नर-नारी में समान होता है। पर यह त्रासदी नारी में कहीं वृहत्तर हो जाती है क्योंकि नारी भावनामयी हो स्थूल आवश्यकताओं की मौन भाव से उपेक्षा करने वाली हो, अपनी कामनाओं को मन में दबा लेने वाली हो अथवा स्वार्थ का उद्घोष करने से कतराने वाली हो, अथवा पति को अपने अधिकार में लेकर सम्पूर्ण जीवन का सुख, भोग, करने वाली हो, अपनी कामनाओं को मन में दबा देने वाली हो अथवा अपनी कामनाओं को किसी क्षण के लिए स्थगित न करने वाली हो, जीवन के यथार्थ को मौन बने रहकर चुप-चाप सहन करते-करते एक कब्रिस्तान बन जाने वाली हो अथवा अपनी इच्छाशक्ति एवं प्रयत्नशीलता के द्वारा जीवन को अपने अनुसार मोड़ने को उत्सुक रहने वाली हो, पुरूषों के निर्णयों को उसकी इच्छाओं को चुपचाप स्वीकार करके अभाव का जीवन बिना देने वाली हो अथवा अपने पति में एक पूरी शख्सियत एक माद्दा देखने व उसको पति में पैदा कर देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली हो, नारी का जीवन हर स्थिति में एक असफलता है, एक अतृप्ति है, एक आपूर्ति है, एक विवशता है, दयनीयता है और एक ग्रिमत्रासदी। नारी जीवन को जिस परिस्थिति में चाहे रख दिया जाये, उसकी नियति एवं उसके जीवन का सत्य एक ही है। परमुखपोक्षिता, अवसाद, असफलता एवं रिक्तता। असमय वैधव्य ने यदि अम्बिका के मन, प्राण, आत्मा की इकाई को तोड़ दिया था तो पति पर एकच्छत्र शासन करने वाली सुन्दरी अचानक हाथ मलती रह गयी थी। अभाव की सन्तान यदि मल्लिका के सुख के रास्ते मे आ गयी थी तो अपने दाम्पत्य की सन्तानों के कारण सावित्री का जीवन एक दम ऐसा मशीन बन गया था कि अपने दिन-रात को उनके लिए आटा पीस-पीसकर देने में देर कर दे रही थी। एक अभाव की सन्तानों ने मल्लिका के द्वारा ही उसके प्रेमी को लौटा दिया और तीन वैद्य सन्तानों एवं उनके प्रश्नों ने जगमोहन को सावित्री को घर वापस छोड़ आने का बहाना दे दिया था।
मोहन राकेश ने स्वतंत्र की आर्थिक-सामाजिक विषमताओं के बदले मानवीय सम्बन्धों और टूटने जीवन-मूल्यों से व्यक्ति के जीवन के आने वाले द्वन्द्व, संघर्ष और मानसिक विघटन को अपने नाटकों मे चित्रित किया है। राकेश के पात्रों की निरर्थक संघर्ष यात्रा व्यक्ति का तनाव और द्वन्द्व में टूटना अपरिचय और अकेलेपन की पीड़ा तथा पारिवारिक सम्बन्धों की हास्यास्पद स्थिति वस्तुतः वर्तमान युग का यथार्थ है, जो हमारे पूरे परिवेश पर व्याप्त है। डा0 रीता कुमार इसे स्वीकार करते हुए लिखती हैं कि ’’राकेश ने अपने व्यक्तिगत जीवन में दाम्पत्य सम्बन्धों से प्राप्त तनाव, घुटन, विसंगति परिवेश और पराजित नियति के कटु अनुभवों को ही बार-बार विभिन्न रूपों में मूर्त करने के प्रयोग किये हैं।’’4 ’अषाढ़ का एक दिन’ के कालिदास और ’आधे-अधूरे’ के महेन्द्रनाथ की छटपटाहट, बौनापन और चाहकर भी संत्रास पूर्ण वातावरण से मुक्त न होने की करूण नियति राकेश के ही व्यक्ति और जीवन का परोक्ष चित्र है।
मोहन राकेश के सभी नाटकों में पात्र वर्तमान युग-जीवन के परिवेश और उसमें जीने के लिए संघर्षरत मानव का सटीक निर्वहन करते हैं। कलाकार के शाश्वत संघर्ष, कलाकार और राज्य-संरक्षण के सम्बन्ध, व्यक्ति का पार्थिवता में अपार्थिवता की खोज जन्य घटपटाहट, स्वातन्त्रयोत्तर भारत में बढ़ते मूल्य-संकट और मानवीय सम्बन्धों की हास्यास्पद स्थिति को मंच पर मूर्त करने की दृष्टि से राकेश पात्र सशक्त प्रतीक की भूमिका निभाते हैं। ’आषाढ़ का एक दिन’ के कालिदास का स्वयं राकेश ने सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक माना है। कालिदास का चरित्र कलाकार और राज्य एवं कलाकार और प्रेम के संघर्ष को सजीव रूप में मूर्त करता है। ’लहरों के राजहंस में नन्द पार्थिक-अपार्थिव मूल्यों के अर्न्द्वन्द्ध में उलझे तथा निर्णय लेने में अक्षम मनुष्य का और सुन्दरी नारी के स्वाभिमानी, अहम प्रिय और सौन्दर्य गर्वित रूप का सशक्त प्रतीक है। ’आधे-अधूरे’ के चरित्र मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन के विघटित, भग्न और अपाहित रूप को मूर्त करते है। सावित्री, महेन्द्रनाथ, अशोक, बिन्नी, किन्नी आदि पात्र यद्यपि आज के जीवन की विसंगतियों और सम्बन्ध विघटन के फलस्वरूप आने वाली कटु संभावना के प्रतीक हैं। जिसे राकेश की सूक्ष्म-दृष्टि ने गहराई से पकड़ा है। सामाजिक युग की स्त्री के लिए नाटककार द्वारा सावित्री के नाम का चयन अपने आप में नारी के परिवर्तित रूप (सत्यवान की सावित्री) पर सशक्त व्यंग्य है। ’’राकेश के लिए रचना जीवन के परिस्पन्दनो की अभिव्यक्ति है, इसलिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाकर अपने युग के मानव के अर्न्द्वन्द्ध, और पीड़ा को अभिव्यक्ति देना वे आवश्यक मानते हैं।5
मोहन राकेश इस तथ्य को स्वीकार करते हुए लिखते हैं कि स्वतन्त्रता के बाद देश में मंहगाई, मुद्रा स्फीति, काला धन, लूट-खसोट, बेरोजगारी व असमाजवादी नारों ने एक ऐसी स्थिति खड़ी करके रख दी, जिससे अस्तित्व के कई प्रश्न उभरकर ऊपर आये- ’’निर्माण हुआ बड़े-बडे़ भवनों का, सरकारी और अर्द्धसरकारी संस्थाओं समितियों और आयोगों का, कारखानों ओर मशीनों का, बांध और विकास योजनाओं का और शासकीय शब्दकोशों का, इस निर्माण की सतह के नीचे इंसान का जो रूप सामने आया बहुत ही विकृत था। लगा कि आसपास के बड़े-बड़े परिवर्तनों के साये में लोग निरन्तर पहले से छोटे और कमीने होते जा रहे है। जिन्दगी का सारा अंदरूनी ढ़ांचा भुर-भुरी मिट्टी की तरह झड़ता ढ़हता जा रहा है।’’6
आषाढ़ का एक दिन-
’आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के निर्माण मे आठ-दस वर्षों के विस्तार का रेखांकन हुआ है। यह समय नाटक के तीनों अंकों में कलापूर्ण ढं़ग से विभाजित है। मोहन राकेश ने समय के विस्तार को मल्लिका के घर, बर्तन और वस्त्रों की मलिनता तथा अम्बिका के बिगड़ते हुए स्वास्थ्य के द्वारा प्रस्तुत किया है।
’आषाढ़ का एक दिन’ की प्रत्यक्ष विषय-वस्तु कवि, कालिदास के जीवन तथा उसकी बालसंगिनी मल्लिका से सम्बन्धित है। कवि कालिदास ऐतिहासिक होते हुए भी भिन्न है। उसकी प्रेमिका मल्लिका एक सीधी सादी समर्पित लड़की है। मल्लिका कालीदास से प्रेम ही नहीं करती बल्कि उसे यशस्वी होने के निर्णय के दर्द को सहन करने का प्रशंसनीय साहस भी दिखाती हैं मल्लिका कालिदास को उज्जैन का राज कवि बनने के लिए उसे प्रेरित करती है लेकिन मल्लिका के प्रेम का अभाव महसूस कर कालिदास योन के प्रति उदासीनता व्यक्त करता है। कालिदास उज्जैन जाने के बाद महान अवश्य बनता है लेकिन उसका सारा मूल्य मल्लिका को सर्वस्व न्यौछावर करके चुकाना पडता है। कालिदास मल्लिका को सहानुभूति के अलावा कुछ भी नहीं दे पाता। बिना किसी आकांक्षा के वह गुप्त सम्राट का राज कवि और फिर कश्मीर का शासक बन जाता है किन्तु गाँव की पर्वतीय सरल सरस प्रकृति की गोद में वापस ले आती है। तब तक मल्लिका किसी की पत्नी और किसी की माँ बन चुकी रहती है। कालिदास लौटने पर समय के शक्तिशाली रूप को देखकर क्षत-विक्षत हालत में ही आषाढ़ के दिन चमकती बिजली और गरजते बादलों में चला जाता है। लेकिन मल्ल्किा उसके साथ जाना चाहकर भी बच्ची की आवाज सुनकर अपने कमरे में बंधी रह जाती है।
नारी समस्या ’आषाढ़ का एक दिन’ में आधुनिक संदर्भ में उभरकर आयी है। मल्लिका कालिदास से प्रेम और विलोम से घृणा करती है। कालिदास के प्रेम के साथ ही उसकी सृजनात्मक-प्रतिभा के विकास में सहायक सिद्ध होती है परन्तु इस मार्ग पर चलते हुए वह परिस्थितियों की चक्की में पिसकर टूट जाती है। जिससे वह घृणा करती है उसी को परिस्थितियों के कारण स्वीकार करती है, परन्तु उसका अन्तःकरण स्वीकार नहीं करता। नारी हृदय की कोमलता और उत्सर्ग की भावना मल्लिका में है, लेकिन बारम्बार प्रवंचित होकर भी उसके मन में आक्रोश क्यों नहीं जगता वह मानवीय से अधिक देवी या यों कहिये, मूर्तिमती समर्पण सी लगती है। मल्लिका का प्रवंचना सहन करते जाने और अन्त तक प्रवंचित रहना आधुनिक (पारिवारिक विघटन) समाज की कंठाओं की ओर संकेत करता है। आज समाज में मल्लिका जैसे अनेक महिलाएं है जो परिस्थितियों के चक्र में पिसकर टूट रही हैं। ’’मल्लिका का चरित्र एक प्रेयसी और प्रेरणा का ही नहीं, भूमि में रोपित उस स्थिर आस्था का भी है जो ऊपर से सुलझकर अपने मूल में विरोपित नहीं होती।’’7
’आषाढ़ का एक दिन’ में नाटकीय संघर्ष कला और प्रेम सर्जनशील व्यक्ति और परिवेश भावना और कर्म, कलाकार और राज्य आदि कई स्तरों पर चित्रित किया गया है। प्रेम, कलाकार की आन्तरिक क्षमता का विकास करता है और राज्याश्रय से उसे प्रतिष्ठा होती है किन्तु अपने आधार से कटकर राज्याधिकार ग्रहण करने पर कलाकार भीतर-भीतर टूटता और रीता होता जाता है। मल्लिका ओर कालिदास दोनो पात्र एक स्तर पर टूटने का एहसास करते हैं। कालिदास को इस संदर्भ में व्याख्यायित किया जा सकता है, वह वास्तविक सम्राट हैं उसके अधिकारों तथा आचरण को कोई चैलेंज करने वाला नहीं है। स्पष्ट है मल्लिका उसकी नारी अभाव सहते-सहते शून्य बन जाने की स्थिति में भी उसका कोई दोष देने अथवा अपना कोई भी अधिकार मांगने जैसा सवाल उठाती ही नहीं। उसके मन में ही यह बात नहीं समा सकती। उस पुरूष को वह कभी भी कटघरे में नहीं खड़ा करती। मल्लिका न केवल कालिदास को बल्कि विलोम को भी कहीं कटघरे में नहीं खड़ा करती। प्रियंगुमंजरी भी उसी युग की नारी है विदुषी होते हुए भी वह नारीकी पुरूष के बराबरी अथवा नारी के अधिकार और पुरूष के कर्तव्य जैसी कोई बात नहीं उठाती। कालिदास उसका पति है। वीरागंनाओं का सहवास करता है। वह तो शायद उसकी सामंती प्रतिष्ठा के अनुरूप ही हो- पर वह राज्य-कार्य के बीच-बीच में कहीं स्वयं में खो जाता है। प्रियंगुमंजरी जानती है कि वह कहाँ खोता है, और उसी सब को अपनी आँख से देखने के लिए वह मार्ग बदलकर ग्राम-प्रान्तर में आती है। मल्लिका को देखती है और बहुत कुछ समझ जाती है कि उसके बाद उसका प्रवास अपने पति का मन बदल सकने का है। उस पर उसे कोई क्रोध नहीं आता है। कालिदास रूपी पुरूष इस रूप में नारी से बहुत ऊँचा है। बराबरी का प्रश्न ही नहीं है। नारी का दमन शोषण करने की रत्ती मात्र इच्छा या प्रयास न होते हुए भी वह स्वछन्द है, मुक्त है इसी मुक्ततः में उसका विघटन होता जाता है। ’’कालिदास का अकेलापन समय और स्थिति की ही देन है किन्तु मल्लिका के अकेलेपन के और भी आयाम हैं। उस व्यक्तिके समान कोई अकेला नहीं जिसके जीवन में कुछ घटता ही नहीं। उसके सामने कोई चुनाव की गुंजाइश नहीं रास्ता भी नहीं। फिर भी औरों की तुलना में वह कितनी दृढ़ है, कितनी सक्षम उसकी जिन्दगी इसलिए उतनी त्रासद है नहीं जितनी संतृप्त है और यदि त्रासद है भी तो, उसकी त्रासदी औरों में बंट जाती है। इसलिए मल्लिका, कालिदास और विलोम तीनों एक ही बिन्दु से खींची तीन रेखाएं हैं किन्तु अपनी शक्ति में मल्लिका, कालिदास की आस्था का विस्तारित रूप बन जाती है।’’8 मोहन राकेश ने अन्य नाटकों की भाँति ’आषाढ़ का एक दिन’ में नायक को लौटाया है। टूटने और बिखरने के पश्चात् कालिदास मल्लिका के पास पहुॅचता है। कालिदास भी ’नन्द-सुन्दरी और ’महेन्द्रनाथ-सावित्री’ की भाँति विस्फोटक स्थिति से साक्षात्कार करने में कतराता है यही कारण है कि वर्तमान का सामना न कर पाने वाले कालिदास का चुपचाप प्रस्थान ’कायरता तथा अहमपूर्ण कृत्य सा प्रतीत होता है और यह कालिदास का अन्तर्द्वन्द्ध बेतुका नहीं लगता। शायद आधुनिक जीवन में भी कुछ ऐसा होता है-जब सुख की खोज में आदमी भटकते-भटकते थक जाता है तब अपने पुराने सुख-स्थान पर लौटता है। कालिदास जब मातृगुप्त या सरकारी चोले से मुक्त हो अपने ग्राम-प्रांतर में लौट आता है तथा जीवन को अथ से प्रारम्भ करना चाहता है। परन्तु समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, वह असफल होता है इसमें त्रासदी है या आयरनी इसमें संदेह हो सकता है लेकिन पारिवारिक विघटन की दास्तान स्पष्ट दिखती है। डॉ0 गिरीश रस्तोगी ’आषाढ़ का एक दिन’ की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहती हैं- ’’इस मायने में यह कालिदास और मल्लिका का नाटक है, लेकिन वस्तुतः यह आधुनिक मानव की विवशता, उसके अंतर्द्वन्द्ध का, उसकी जटिलता का नाटक है……. कालिदास का अन्तर्द्वन्द्ध और टूटन आज के साहित्य का द्वन्द्ध और पीड़ा है।’’9
निष्कर्षः-
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि राकेश ने उक्त नाटक में वर्तमान युग में जीवन में टूटते मानवीय सम्बन्धों और मूल्यों के फलस्वरूप व्यक्ति के आन्तरिक विघटन के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को भी स्वर देने का प्रयत्न किया है। जो वर्तमान परिवेश की विसंगतियों से उद्भूत युग सत्य है।
मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों में त्रासदी का यही स्वरूप है। उपन्यास और कहानी का सफर सचमुच डिप्रेसिंग है, क्योंकि लेखक जो प्रश्न उठाता है उसका उत्तर दुनिया से नहीं अपने आप से मांगना होता है और इस मुकाम पर हम अपने ही सामने निर्वस्त्र होने को विवश होते हैं, वरना उन समस्याओं का उत्तर मिल ही नहीं सकता। मानवीय सम्बन्धों को एक नयी दृष्टि और हृदय की अतल गहराई से कुरेदने वाले राकेश जी ने जिन्दगी भर मानवीय सम्बन्धों पर विचार किया। क्योंकि उनकी मान्यताएं पुरानी लीक छोड़कर समाज को देखने की एक नवीन दृष्टि रखती है।

संदर्भ सूचीः-
1. परिवेशः चीटियों की पंक्तियाँ- 1973- जमीन से कागजों तक, पृ0 16
2. सारिका- अगस्त 1968, पृ0 73
3. परिवेश- भूमिका अंश-मोहन राकेश
4. स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी नाटकः मोहन राकेश के विशेष संदर्भ में- डा0 रीता कुमार, पृ0 366
5. मोहन राकेश और उनके नाटक-डा0 गिरीश रस्तोगी, पृ0 50
6. बकलम खुद- मोहन राकेश, पृ0 97
7. अषाढ़ का एक दिन- भूमिका पृ0 9
8. आधुनिक हिन्दी नाटक का मसीहा मोहन राकेश-गोविन्द चातक, पृ0 58
9. मोहन राकेश और उनके नाटक- डा0 गिरीश रस्तोगी पृ0 68

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