डाॅ0 रश्मि फौजदार
प्राचार्या (कार्यवाहक)
मुस्लिम गल्र्स डिग्री काॅलिज, बुलन्दशहर
भारत का राष्ट्रपति, देश का सिर्फ संवैधानिक (औपचारिक) प्रमुख होता है। राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति ब्रिटिश सम्राट के समान है। इस प्रकार भारत में एक साथ संसदीय लोकतंत्र तथा गणराज्य स्थापित किया गया है। ब्रिटिश सम्राट का पद वंशानुगत है वहीं भारत के राष्ट्रपति का चुनाव होता है।
अनुच्छेद 58 के अन्तर्गत राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव की योग्यतायें वर्णित हैं- वह भारत का नागरिक हो। वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, तथा लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो। किन्तु ऐसा कोई व्यक्ति जो भारत सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है, राष्ट्रपति पद के लिए योग्य न होगा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपाल और संघ अथवा राज्यों के मंत्रियों के पद को लाभ का पद नहीं माना जाता है।
राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का नाम कम से कम 50 मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित और 50 मतदाताओं द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। 1997 से पूर्व यह संख्या 10-10 थी। राष्ट्रपति पद के लिए जमानत की राशि 15000रू. है। जो कि पहले 2500 रू0 थी। 1997 में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम 1952 में संशोधन कर प्रस्तावकों व अनुमोदकों की संख्या तथा जमानत की राशि को इसलिए बढ़ा दिया गया जिससे कि ऐसेे उम्मीदवारों को हतोत्साहित किया जा सके जो गम्भीरता से चुनाव नहीं लड़ते हैं।
राष्ट्रपति संसद अथवा राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होगा। यदि निर्वाचन के पूर्व वह इनका सदस्य है तो निर्वाचन की तिथि से उसका स्थान उस सदन से रिक्त समझा जायेगा। राष्ट्रपति अपने कार्यकाल की अवधि में कोई अन्य पद ग्रहण नहीं कर सकता। (अनुच्छेद-59)। अनुच्छेद 57 में कहा गया है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद पर पुनर्निर्वाचन के लिए योग्य है किन्तु वह कितनी बार राष्ट्रपति चुना जा सकता है इस प्रश्न पर संविधान मौन है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद अब तक के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें दो बाद (1952 तथा 1957 में) इस पद हेतु चुना गया था।
अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे ‘निर्वाचक मण्डल’ द्वारा किया जायेगा जिसमें (प)संसद के दोनों सदनों (लोक सभा तथा राज्य सभा) के निर्वाचित सदस्य तथा (पप)राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होंगे। 70वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा ‘पुदुचेरी’ संघ शासित राज्य के विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल कर लिया गया है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में संसद तथा राज्यों की विधान सभाओं के मनोनीत सदस्यों और राज्य विधान परिषद के सदस्यों (निर्वाचित एवं मनोनीत दोनों) तथा दिल्ली व पुदुचेरी की विधान सभाओं के मनोनीत सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है।
राष्ट्रपति का चुनाव ‘अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली’ द्वारा किया जाता है। अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति दी गयी है। राष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित अन्य बातें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम-1952 में दी गयी हैं। अनुच्छेद 55 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ‘‘अनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा तथा यथासम्भव विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापन में एकरूपता रखी जायेगी। राष्ट्रपति के निर्वाचन में दो सिद्धान्तों को अपनाया जाता है- समरूपता एवं समतुल्यता का सिद्धान्त तथा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली
समरूपता एवं समतुल्यता का सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों के मतमूल्य के मापन में एकरूपता तथा विभिन्न राज्यों और संघ के प्रतिनिधत्व में समतुल्यता रखी जायेगी। दूसरे शब्दों में सभी राज्यों के निर्वाचित विधान सभा सदस्यों के मतमूल्य के निर्धारण के लिए एक ही प्रक्रिया अपनायी जायेगी तथा सभी राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतमूल्य का योग, संसद के दोनांे सदनों के सभी निर्वाचित सदस्यों के मतमूल्य के योग के समतुल्य अर्थात् समान होगा। इसे आनुपातिक प्रतिनिधत्व का सिद्धान्त भी कहा जाता है। किसी राज्य की विधान सभा के किसी एक सदस्य के मत का मूल्य जानने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या में, उस राज्य के विधान सभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाता है तथा प्राप्त भागफल को पुनः एक हजार से विभाजित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त भागफल उस राज्य विशेष के किसी एक निर्वाचित सदस्य का मत मूल्य होता है। किन्तु यदि विभाजन के पश्चात शेषफल 500 या उससे अधिक आता है तब उक्त भागफल में एक जोड़ दिया जाता है। उस राज्य के सभी निर्वाचित सदस्यों का मतमूल्य जानने के लिए सभी निर्वाचित सदस्यों की संख्या से, उस राज्य के एक निर्वाचित सदस्य के मतमूल्य में गुणा किया जाता है। 84 वें संविधान संशोधन अधि. (2001) द्वारा अनु. 55 में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि 2026 तक राष्ट्रपति के चुनाव में 1971 की जनसंख्या को ही आधार माना जायेगा। संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों में से किसी एक सदस्य का मतमूल्य जानने के लिए, सभी राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतमूल्य को जोड़कर उसमें संसद के सभी निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाता है। उŸार प्रदेश में ‘‘प्रत्येक विधायक के मत का मूल्य जहां 208 है, तो सिक्किम के विधायक के मत का मूल्य 7 है। इसका अर्थ हुआ कि उŸार प्रदेश में 403 विधायकों के मत 83,824 (208 गुना 403) मत हुए। सिक्किम के 32 विधायकों के मत 224 (32 गुना 7) हुए। सभी विधान सभाओं के कुल मत 5.43 लाख है। प्रक्रिया के मुताबिक 776 सांसदों (लोक सभा के 543 और राज्य सभा के 233) के कुल मत विधायकों के कुल मतों जितने होने चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक सांसद के मत का मूल्य 700 (5.43 का 776 से भाग) है। विधान सभाओं और सांसदों के कुल मत 10.86 लाख होंगे।’’1
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली सिद्धान्त के अनुसार यदि प्रत्याशियों की संख्या एक से अधिक है तो प्रत्येक मतदाता उतने मत वरीयता क्रम से देगा जितने प्रत्याशी हैं अर्थात् प्रत्येक मतदाता, प्रत्येक प्रत्याशी को अपना मत वरीयता क्रम के अनुसार देता है। यथा-यदि कुल तीन प्रत्याशी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं तो मतदाता तीनों प्रत्याशियों को प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय वरीयता क्रम के अनुसार अपना मत देगा।
राष्ट्रपति पद के चुनाव में मतगणना के लिए एक विशेष प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रपति पद के लिए उसी व्यक्ति को सफल घोषित किया जाता है जो कुल वैध मतों के आधे से कम से कम एक मत अधिक अर्थात् 50ः से अधिक मत प्राप्त करता है। इसे न्यूनतम कोटा कहा जाता है।
मतगणना के समय सबसे पहले प्रथम वरीयता के मतों की गणना की जाती है। यदि कोई प्रत्याशी न्यूनतम कोटा प्राप्त कर लेता है, तो उसे सफल घोषित कर दिया जाता है। यदि कोई भी उम्मीदवार न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं करता तो द्वितीय चक्र की गणना प्रारम्भ की जाती है। इसमें सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को स्पर्धा से बाहर कर उसके मतपत्रों के द्वितीय वरीयता के मतों की गणना की जाती है तथा उसे अन्य उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त प्रथम वरीयता के मतों में जोड़ दिया जाता है। यदि द्वितीय चक्र की गणना के बाद भी कोई उम्मीदवार न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं कर पाता है तो उक्त प्रक्रिया पुनः दुहराई जाती है और वह तब तक चलती है जब तक किसी उम्मीदवार को न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं हो जाता है। सन् 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में ‘‘पहली वरीयता के मतों की गणना के बाद किसी उम्मीदवार की स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका। उस समय वी.वी.गिरि, नीलम संजीव रेड्डी, सी.डी. देशमुख आदि उम्मीदवार थे। पहली वरीयता मतों में वी.वी. गिरि को 401,575 पहली वरीयता के मत मिले थे। दूसरे उम्मीदवार रेड्डी को 3,13,548 मत मिले थे। स्पष्ट बहुमत के लिए वी.वी.गिरि की 16,654 मतों की जरूरत थी। दूसरी वरीयता के मतों की गणना के बाद गिरि को कुल 4,20,077 और रेड्डी को कुल 4,05,427 मत मिले। गिरि को राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित कर दिया गया था।’’2
21 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति चुनाव में राजग उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू ने विपक्ष के यशवंत सिन्हा को बड़े अंतर से हराया। दस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के वोटों की गिनती शेष रहते ही मुर्मू ने जीत के लिए जरूरी 5.43 लाख वोटों का आंकड़ा पार कर लिया। राज्यसभा महासचिव और राष्ट्रपति चुनाव के मुख्य निर्वाचन अधिकारी पीसी मोदी ने बताया, ‘‘मुर्मू को 6,76,803 वोट मिले, जो कुल मतों का 64.3ः है। सिन्हा को 3,80,177 यानी 35.97ः वोट मिले। चुनाव में 4754 वैध निर्वाचक थे। 53 वोट अमान्य हो गए। मुर्मू को कुल 2824 निर्वाचकों, जबकि यशवंत सिन्हा को 1877 का समर्थन मिला। वहीं, विपक्ष के सत्रह सांसदों और 126 विधायकों ने क्राॅस वोटिंग कर मुर्मू को वोट दिया। मुर्मू को 540 सांसदों, जबकि सिन्हा को 208 सांसदों के वोट मिले।’’3
उनका चुनाव ‘‘भारतीय जनतंत्र के समावेशीपन को दिखाता है, जहां अपनी सारी भिन्नता तथा विकास के मामले में पिछड़ेपन के बावजूद आदिवासी समुदाय की एक महिला, देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच सकती है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनतंत्र के समावेशीपन के संबंध में जिस तरह के सवाल उठते रहे हैं, उन्हें देखते हुए, इस तरह के संदेश की इस समय बेशक जरूरत थी।’’4 द्रौपदी मुर्मू का देश का ‘‘15वां महामहिम बनना, निस्संदेह, हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की उन गिनी-चुनी घटनाओं में से एक है, जिन पर गर्व किया जा सकता है।’’5 इतिहास यही बताता है कि ‘‘राष्ट्रपति के चुनाव में सŸााधारी दल के प्रत्याशी की ही जीत होती है, लेकिन विपक्ष अपना प्रत्याशी उतारकर जनता को एक संदेश देता है। इस बार वह ऐसा नहीं कर सका।’’6 ज्ीम म्समबजपवद व् िक्तवनचंकप डनतउन ंे जीम 15जी चतमेपकमदज ष्पे ं उवउमदज वित प्दकपं जव ेंअवनत ंदक बमसमइतंजमष्7 च्तमेपकमदज.मसमबज क्तवनचंकप डनतउन ष्ेलउइवसपेमे इतपकहपदह व िहंच इमजूममद जीम पितेज बपजप्रमद ंदक जीम संेजष्8 प्दकपं मसमबजपदह पजे पितेज ।कअंेप चतमेपकमदज पे ंसेव ष्ं जतपइनजम जव ीवू पज पे बवदेजंदजसल कमउवबतंजपेपदह पद जमतउे व िकपअमतेपजल पद चवसपजपबंस तमचतमेमदजंजपवदण्ष्9
अनुच्छेद-56 के अनुसार राष्ट्रपति पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करता है। किन्तु वह पाँच वर्ष के पूर्व कभी भी उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है। उसे संविधान का अतिक्रमण करने पर अनुच्छेद-61 में उपबन्धित महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया भी जा सकता है। अनु. 56(1) (ग) के अनुसार राष्ट्रपति अपने पाँच वर्ष की पदावधि की समाप्ति के पश्चात भी तब तक अपना पद धारण किये रहता है जब तक कि उसका उŸाराधिकारी (नया राष्ट्रपति) अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। इस स्थिति में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य नहीं करता है। संविधान में यह उपबन्ध पद रिक्ति की स्थिति में शासनांतरण से बचने के लिए किया गया है। राष्ट्रपति जब उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देता है तब उपराष्ट्रपति तत्काल इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देता है।
अनुच्छेद 62 के तहत राष्ट्रपति के पद की रिक्तता को भरने के लिए कराये जाने वाले चुनाव एवं उसकी पदावधि सम्बन्धी प्रावधान दिया गया है। राष्ट्रपति पदावधि समाप्त होने के पूर्व ही नये राष्ट्रपति के लिए चुनाव सम्पन्न करा लिया जायेगा। इन री प्रेसीडेंशियल पोल (1974) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि राष्ट्रपति की पदावधि की समाप्ति के पूर्व ही उसका चुनाव करा लेना अनिवार्य है और इसे किसी भी आधार पर टाला नहीं जा सकता है। यह प्रावधान अनु0 56(1) (ग) के अधीन है; अर्थात् राष्ट्रपति अपनी पदावधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उŸाराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है। यदि राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग या किसी अन्य कारण से रिक्त होता है तो उसको भरने के लिए चुनाव 6 माह के भीतर कराया जायेगा। जब राष्ट्रपति का पद आकस्मिक रूप से (मृत्यु, त्यागपत्र, पद से हआये जाने या किसी अन्य कारण से) रिक्त होता है तो उप-राष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। यहाँ उल्लेखनीय है कि यदि उप राष्ट्रपति का पद भी रिक्त हो तो भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा मुख्य न्यायाधीश के पद की रिक्तता की स्थिति में उच्चतम न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। एम0 हिदायतुल्लाह भारत के एक मात्र ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं जिन्होंने 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त, 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था।
राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 60 के अनुसार अपना पद ग्रहण करने से पूर्व उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष शपथ ग्रहण करते हैं। यथा; मैं अमुक…………..1. श्रद्धापूर्वक राष्ट्रपति के पदीय कर्तव्यों का पालन करूंगा। 2. संविधान और विधि का परिरक्षण (च्तमेमतअम), संरक्षण (च्तवबजमज) और प्रतिरक्षण (क्ममिदक) करूँगा तथा 3. भारत की जनता की सेवा एवं कल्याण में निरत रहूँगा।
‘राष्ट्रपति का वेतन, भŸाा एवं पेंशन (संशोधन) अधिनियम 2018’ के अनुसार होगा। उनका वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है तथा यह आयकर मुक्त होता है। राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया अनुच्छेद 61 में दी गयी है। इसके अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संविधान का अतिक्रमण किये जाने पर उसके विरूद्ध महाभियोग चलाया जा सकता है। राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग संसद द्वारा चलाई जाने वाली एक अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया हैें महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रस्ताव की सूचना राष्ट्रपति को 14 दिन पूर्व प्राप्त होनी चाहिए और प्रस्ताव की सूचना पर उस सदन के कम-से-कम एक चैथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि इस आशय का प्रस्ताव उस सदन में, जिसमें वह रखा गया है समस्त सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो वह आगे की जाँच के लिए दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति को दूसरे सदन में स्वयं अथवा अपने किसी प्रतिनिधि के माध्यम से स्पष्टीकरण देने का अधिकार है। जाँच के पश्चात यदि द्वितीय सदन भी प्रथम सदन की भाँति महाभियोग के प्रस्ताव को समस्त सदस्यों के कम-से-कम दो तिहाई बहुमत से स्वीकार कर लेता है तो उसी दिन से राष्ट्रपति पद मुक्त समझा जाता है। अभी तक एक भी ऐसा अवसर नहीं आया जबकि राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाया गया हो।
राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों के नामांकित सदस्य, जो राष्ट्रपति के निर्वाचन में वे भी भाग लेते हैं किन्तु राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य तथा दिल्ली व पुदुचेरी संघ राज्य क्षेत्र की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य महाभियोग प्रक्रिया में भाग नहीं लेते हैं यद्यपि वे राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं।
अनुच्छेद 71 में कहा गया है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी विवादों का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जायेगा, तथा उसका निर्णय अन्तिम होगा। यदि उच्चतम न्यायालय किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन को अवैध घोषित कर देता है तो ऐसे व्यक्ति द्वारा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में, निर्णय के पूर्व किया गया कोई कार्य या घोषणा अवैध नहीं होगा। 11वंे संविधान संशोधन अधिनियम 1961 द्वारा अनुच्छेद 71 में उपखण्ड (4) जोड़कर यह प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव की वैधता को इस आधार पर चुनैती नहीं दी जा सकती है कि निर्वाचक मण्डल में कुछ स्थान रिक्त हैं। अतः यदि किसी राज्य की विधानसभा राष्ट्रपति के निर्वाचन के समय भंग हो तब भी उसका निर्वाचन अवैध न होगा। यह संशोधन डा0 खरे बनाम एलेक्शन कमीशन आफ इण्डिया (1957) के मामले के पश्चात पारित किया गया था।
अब अगर भारत के राष्ट्रपति चुनाव के ‘‘सबसे रोचक प्रसंग की चर्चा करें तो यह 1969 का चुनाव है। वस्तुतः राष्ट्रपति पद के लिए पांचवा चुनाव 1972 में होना था किंतु तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. जाकिर हुसैन की असामयिक मृत्यु के कारण यह पद बीच में ही खाली हो गया। तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने भी जब कुछ समय बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया तो नया चुनाव अपरिहार्य हो गया। यह वही समय था जब कांग्रेस गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही थी। सिंडिकेट और इंदिरा गांधी के बीच का गतिरोध प्रत्यक्ष था। इसलिए ही कांग्रेस में उम्मीदवार के नाम को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। सिंडिकेट और इंदिरा गांधी की ओर से अलग-अलग नाम प्रस्तावित हुए पर सहमति बन नहीं पाई। इसी बीच वीवी गिरि ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद के लिए पर्चा भर दिया दूसरी ओर कांग्रेस ने नीलम संजीव रेड्डी को अपना उम्मीदवार बनाया। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के इस उम्मीदवार का विरोध किया और कांग्रेस के विधायकों और सांसदों से ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर मतदान करने का आहवान किया। इसका परिणाम हुआ कि कांगे्रस समर्थित रेड्डी चुनाव हार गए और गिरि राष्ट्रपति चुन लिए गए यह अभी तक के राष्ट्रपति चुनाव का एकमात्र ऐसा उदाहरण है, जब सŸाा-समर्थित उम्मीदवार हार गया हो।
प्रश्न यह भी उठता है कि भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष क्यों रखा गया है और क्यों निर्वाचक-मण्डल में विधानसभाओं के सदस्यों को स्थान दिया गया। अप्रत्यक्ष निर्वाचन के कारण इस प्रकार हैं-राष्ट्रपति का निर्वाचन यदि जनता द्वारा प्रत्यक्ष और वयस्क मताधिकार के आधार पर होता तो लगभग 20 करोड़ मतदाताओं के लिए व्यवस्था करना अत्यधिक कठिन होता। राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख है तथा मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिक। ‘‘प्रत्यक्ष निर्वाचन को अपनाने में बड़ी बाधाएं और कठिनाईयां उपस्थित होंगी।’’11 अतः इस शासन-व्यवस्था में राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष निर्वाचन का औचित्य नहीं है और अप्रत्यक्ष निर्वाचन से कोई सैद्धान्तिक हानि नहीं है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों को भी इसलिए सम्मिलित किया गया है ताकि राष्ट्रपति सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर सके। निर्वाचक मण्डल में संसद सदस्यों के साथ.साथ राज्य विधानमण्डलों के सदस्यों को सम्मिलित करने का उद्देश्य राजनीतिक सन्तुलन बना रख सकें। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने का उद्देश्य यह था कि राष्ट्रपति बहुमत मतों के बजाय स्पष्ट बहुमत से निर्वाचित हो। इस पद्धति से छोटे.छोटे राजनीतिक दलों की शक्ति का भी चुनाव में महत्व हो जाता है और राष्ट्रपति के चुनाव को बहुमत दल की स्वेच्छाचारिता से बचाया जा सकता है। पायली के शब्दों में राष्ट्रपति राष्ट्र का मुखिया होता है राष्ट्र में सभी दल या गुट सम्मिलित हैं और राष्ट्रपति दलीय व्यवस्था से ऊपर है। इसलिए यह आवश्यक है कि उसका चुनाव भारी भारी बहुमत द्वारा हो। यदि साधारण बहुमत प्रणाली इस निर्वाचन के लिए अपनायी जाती तो इस बात का कोई आश्वासन नहीं था किन्तु वर्तमान निर्वाचन प्रणाली में यह निश्चित है कि राष्ट्रपति का चुनाव पूर्ण बहुमत प्राप्त करने पर ही हो सकता है।
राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अपनायी गयी वर्तमान निर्वाचन प्रणाली जटिल एवं पेचीदा प्रणाली है। इसकी आलोचना का एक आधार यह है कि इसके लिए ‘‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर आधारित एकल संक्रमणीय मत प्रणाली शब्दावली का प्रयोग उचित नहीं है, क्योंकि आनुपातिक प्रतिनिधित्व’’ का प्रयोग वहीं किया जा सकता है जहाँ एक से अधिक व्यक्तियों का निर्वाचन होता है। यह ठीक है कि इस व्यवस्था में मतों का हस्तान्तरण होता है परन्तु इस कारण से उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसका उद्देश्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं, वरन् यह देखना है कि उसमें राष्ट्रपति को निर्धारित मतों का समर्थन प्राप्त होता है या नहीं। आलोचना का दूसरा आधार यह है कि उसमें एक से अधिक प्रत्याशी होने पर भी यदि मतदाता अपनी ओर से मतपत्र पर केवल एक ही विकल्प चिह्नित करते हैं और यदि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रत्याशी को निर्धारित मत प्राप्त नहीं होते तो ऐसी स्थिति में निर्वाचन का कोई परिणाम नहीं निकलेगा।
उक्त आलोचनाओं के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि चुनाव प्रणाली व्यवहार में सरल प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत वही व्यक्ति निर्वाचित हो सकता है जिसे कुल मतों का पूर्ण बहुमत प्राप्त हो। यह निर्वाचन प्रक्रिया संघीय सिद्धान्त के अधिक अनुरूप है। राष्ट्रपति के चुनाव के समय अधिक हलचल नहीं होती और चुनाव अत्यधिक शान्ति के साथ जाता है।
संदर्भ ग्रन्थ –
1. कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव; हस्तक्षेप; राष्ट्रीय सहारा; 18 जून 2022
2. आर.सी. अग्रवाल व डाॅ. महेश भटनागर; भारतीय संविधान का विकास तथा राष्ट्रीय आंदोलन; एस. चन्द एण्ड कम्पनी लिमिटेड; नई दिल्ली; 2018 पृष्ठ-332
3. महामहिम द्रौपदी मुर्मू; अमर उजाला; नई दिल्ली; 22 जुलाई 2022
4. आशा और विश्वास; (सम्पादकीय); राष्ट्रीय सहारा; 23 जुलाई 2022
5. कृष्ण प्रताप सिंह; नई महामहिम का स्वागत है; राष्ट्रीय सहारा; 23 जुलाई 2022
6. प्रेरणा की स्त्रोत द्रौपदी मुर्मू; (सम्पादकीय); दैनिक जागरण; नई दिल्ली; 22 जूलाई 2022
7. ैचतपज व िं छंजपवदय ;म्कपजवतपंसद्धय ज्ीम प्दकपंद म्गचतमेेय श्रनसलय 2022
8. त्ंउ डंकींअय । च्तमेपकमदज वित वनत जपउमय ज्ीम प्दकपंद म्गचतमेेय श्रनसलय 2022
9. थ्पतेज बपजप्रमद डनतउनय ज्ीम ज्पउमे व िप्दकपंय छमू क्मसीपय 22 श्रनसलय 2022
10. सन्नी कुमार; (अध्येता इतिहास); दिलचस्प मुकाबलों की कहानी; हस्तक्षेप; राष्ट्रीय; सहारा; 18 जून 2022
11. डाॅ. बी.एल. फड़िया; भारतीय राजव्यवस्था एवं भारत का संविधान; प्रतियोगिता साहित्य सीरीज; आगरा; 2010 पृष्ठ डी-62