ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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प्रगतिशील कवि त्रिलोचन की काव्य-संवेदना

प्रगतिशील कवि त्रिलोचन की काव्य-संवेदना

प्रो० रामअवध सिंह यादव
प्राचार्य
श्री गांधी पी०जी० कालेज मालटारी, आजमगढ़

सारांष

हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में त्रिलोचन ने सबसे कम राजनीतिक कविताएँ लिखी हैं, किन्तु अपने समय की, राजनीति की बारीकियों छद्मों और चालाकियों को इन्होंने सबसे अधिक अपनी कविताओं में चित्रित किया है। उनकी राजनीति उनकी कविता की पृष्ठभूमि में निहित होती है, कभी निष्पति और कभी प्रक्रियों में गुंथी होती है क्योंकि त्रिलोचन घटनाओ ंके कवि नहीं वे मानव जीवन पर घटनाओं का जो प्रमाण पड़ता है उसकी दशाओं और अनुभवों के कवि हैं। वे बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि हमारे सामने जो स्थितियाँ हैं, उसमें कविता की भूमिका क्या है? और वे कौन-सी कविताएँ हैं, जो अनुभूति, कल्पना, विचार और सपनों को बचाकर जीवन-संग्राम में हमारा साथ दे सकती हैं। त्रिलोचन यथार्थवादी धारा के अन्यतम कवि हैं, किन्तु उनका यथार्थवाद दूसरे कवियों के यथार्थवाद से अलग है। अपने स्वभाव में ही नहीं, अभिव्यक्ति-प्रक्रिया में भी। उनकी कविताओं में भावुकता है, न झूठा आशावाद, न काल्पनिक संघर्शों के अमूर्तचित्र हैं, न मारो-मारो, काटो-काटो की ललकार है। वहाँ जनशक्ति में आस्था है, संघर्श के लिए आह्वान है, मुक्ति आंदोलन के गीत भी हैं, लेकिन यह चेतावनी है कि ‘सोच-समझ कर चलना होगा’ डाॅ० लल्लन राय का कहना है कि- ‘‘त्रिलोचन ने अपनी प्रगतिशील चेतना को जिस ढंग से प्रस्तुत किया है, अन्य प्रगतिशील कवियों के बीच उससे उनकी एक अलग पहचान है। तुकान्त, अतुकान्त, भिन्न तुकान्त और मुक्त छन्दों के साथ ही उन्होंने चैपदे, सानेट गज़ल जैसे हिन्दी के लिए विजातीय छन्दों का भी प्रयोग किया है। त्रिलोचन ने बड़ी महत्वपूर्ण लम्बी कविताएँ लिखी हैं, जिसमें ‘मैं तुम’, ‘नगई महरा’, ‘चित्रा’, ‘जामबोरकर’, ‘छोटू’ और ‘रैन बसेरा’ शामिल है। लम्बी कविता को देशज संसकर देकर त्रिलोचन ने चरित्र, विषय और कौशल तीनों ही क्षेत्रों में नया प्रयोग किया। उनकी चर्चित लम्बी कविता ‘नगई महरा’ हिन्दी की एक उपलब्धि है। इस कविता के पाठ से जीवन और समाज के कई रूप खुलते हैं। एकान्त श्रीवास्तव का कहना है कि ‘‘कहना चाहिए कि अन्य पुरूष का पुल आत्मग्रस्तता से आत्मपरकता तक आने का ही माध्यम बनता है। यही कारण है कि ‘नगई महरा’ में प्रति संसर का हिस्सा होने के बावजूद यानी अपेक्षाकृत सम्पन्न और सवर्ण होने के बावजूद कवि की दृष्टि को प्रति संसार की व्याधियाँ धुधला नहीं करतीं बल्कि यह दृष्टि अपने संसार को अतिक्रमित करती है और लोक की तथा नगई की दृष्टि बनती है। इसलिए अपने समाज में व्याप्त विसंगतियों और अनर्विरोधों के लिए उन्हें उधेड़ने का साहस कर पाता है।’’

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