ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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अनुसूचित जातियों के सामाजिक न्याय के संरक्षण में आधुनिक पंचायतो की भूमिका -भारतीय संस्कृति की झलक

शोधार्थी बृजेन्द कुमार

 राजनीति विज्ञान विभाग, बरेली कालेज, बरेली

भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही मानव कल्याणकारी रही है। ऋषि -मुनि से लेकर भारतीय इतिहास के अनेक शासकों और उनके साथ-साथ समय-समय पर हुए सूफी सन्त समाज सुधारक, एवं सामाजिक एवं राजनीतिक विचारक आदि सभी ने मानव कल्याण के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। प्राचीन काल से लेकर आज तक हमारे देश के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है। हमारा देश ‘भारतवर्ष‘  गाँवों का देश कहा जाता है, क्योेंकि हमारे देश की अधिकतम आबादी गावों में ही निवास करती है। इसलिए हमारे देश को आगे बढाने के लिए समाज की सबसे छोटी इकाई गाँव को भी सुसंस्कृत, सुसभ्य एवं पूर्ण विकसित होना चाहिए।  भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही मानव कल्याणकारी रही है। ऋषि -मुनि से लेकर भारतीय इतिहास के अनेक शासकों और उनके साथ-साथ समय-समय पर हुए सूफी सन्त समाज सुधारक, एवं सामाजिक एवं राजनीतिक विचारक आदि सभी ने मानव कल्याण के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। प्राचीन काल से लेकर आज तक हमारे देश के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है। हमारा देश ‘भारतवर्ष‘  गाँवों का देश कहा जाता है, क्योेंकि हमारे देश की अधिकतम आबादी गावों में ही निवास करती है। इसलिए हमारे देश को आगे बढाने के लिए समाज की सबसे छोटी इकाई गाँव को भी सुसंस्कृत, सुसभ्य एवं पूर्ण विकसित होना चाहिए।   भारतवर्ष मे पंचायतें अतीतकाल से ही विद्यमान हैं। पंचायतों को जानने से पहले, भारतीय संस्कृति को जानना आवश्यक है। क्योकि ‘संस्कृति को इतिहास की आत्मा कहा जाता है। परम्परा प्राप्त सुन्दर जीवन पद्धति तथा सद््््््््््पृवत्ति प्रेरित कर्म को संस्कृति के रुप में माना जाता है। संस्कृति मानव के क्रियाकलापो का लेखा जोखा या विवरण के अध्ययन का विषय है। यजुर्वेद में कहा गया है-‘सा संस्कृतिः प्रथमा विश्वारा‘ अर्थात पहली संस्कृति विश्व को उन्नयन करने वाली थी, अतः संस्कृति मनुष्य की सहज प्रवत्तियों नैसर्गिक शक्तियों तथा उसके परिष्कार की द्योतक है। संस्कृति से सामाजिक साहित्यिक, कलात्मक राजनितिक और वैज्ञानिक क्षे़त्रों में प्रगति होती है। संस्कृति को आगे बढाने के लिए सभ्यता को स्थापित करना होगा। सभ्यता शब्द संस्कृत की सभा से बना है, जिसका शाब्दिक अथर्् है, ‘सभा मे बैठने की योग्यता‘ इस प्रकार सभ्यता का अर्थ है सभा या समाज में रहने की योग्यता अर्थात सामाजिकता। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृति है, जो आज तक सतत् प्रवाहमान है। भारतीय वेद, उपनिशद रामायण, महाभारत, गीता आदि के आदर्श आज भी हमारे लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए है। भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता, ग्रहणशीलता,समन्वयवादिता, आध्यात्मिकता वर्णाश्रम व्यवस्था एंव साहित्यिक सम्पन्नता आदि प्रमुख विषेशताएॅ विद्यमान है। इनके साथ साथ भारतीय संस्कृति में विविधताओं का संमावेश है। अनेक वाह्य विषमता या विविधता के वावजूद इसमें आन्तरिक एकता विद्यमान हैं, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा है। एकता सदैव हमारे समाज में पायी जाये, एंव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समाजिकता का भाव हो, अर्थात समाज पूरी तरह से सुसंस्कृत एंव अनुशासित हो इसके लिए समाज की सबसे छोटी इकाई गाँव में एक सुसंगठित एंव अनुशासित व्यवस्था की आवश्यकता ने पंचायतों का विकास किया।  प्राचीन काल से ही पंचायत का कार्य बडें महत्व का था, पंचायत जहाॅ एक ओर अदालतों को उनके छोटे मोटे कार्यों से मुक्त करती थी वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन की उन्नति एंव उनके नियन्त्रण में महत्वपूर्ण भूमिका का भी निर्वहन करती थी। परन्तु समय के साथ साथ पंचायतो के स्वरूप में भी परिवर्तन होता गया। संविधान सभा में पंचायतों को संविधान का हिस्सा बनाया जाये या नहीं इस पर बड़ी बहस हुई। जहाॅ एक ओर महात्मा गाॅधी पंचायतों के पक्ष में थे तो दूसरी ओर डा0 भीमराव अम्बेडकर पंचायतों के पक्ष में नहीं थे, उनका कहना था कि गाॅव में दलित व अन्य कमजोर वर्ग की समस्या पंचायतों से और बढ़ेगी, क्योंिक इतिहास में इसके प्रमाण मौजूद थे। अन्त में गंभीर विचार विमर्श के साथ पंचायतों को संविधान के नीति निर्देशक सिद्धान्तो के अन्र्तगत रखा गया। गणतंन्त्र भारत में पंचायतें संविधान का हिस्सा बन गयी, परन्तु पंचायतों पर बहुत ध्यान नही दिया गया, पंचायतों द्धारा ग्रामीण समाज के लिए नौकरशाही, आधारित कार्यक्रम शुरु किये गये, जिसका डर था वही हुआ कार्यक्रम में समाज कें सभी वर्गो के लोगों की भागीदारी नहीं रही। कैसे समाज के सभी वर्गो की भागीदारिता पंचायत के         माध्यम से ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों में सुनिश्चित की जायें, इसके लिए 1959 में बलवन्त राय मेहता समिति ने तीन स्तरीय, पंचायतीराज व्यवस्था शुरु करने की सिफारिश की फिर भी यह निर्धन उपेक्षित एवं दलित वर्ग की प्रर्याप्त सहभागिकता न होने के कारण असफल रही। इन अवरोधों को दूर करने के लिए 1977 में अशोक मेहता समिति गठित की गयी, जिसने बताया कि पंचायतों के पतन का मुख्य कारण नेता एवं नौकरशाही व्यवस्था है ये दोनों नहीं चाहते कि सत्ता का कोई तीसरा केन्द्र उभरे, यदि पंचायतें और सशक्त होगीं तो इन दोनो की जवाबदेही सुनिश्चित होगी। और फिर 1986 में एम0 एल0 सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी, उसने सुझाव दिया कि पंचायतों को नौवी अनुसूची में रखा जायें, और इसमें समाज के कमजोर पिछडें एवं दलित जो समाज द्धारा उपेक्षित हैं, उनकी भी भागीदारिता सुनिश्चित की जायें, साथ ही साथ पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियाॅ भी दी जायें जिससे वे समाज का सर्वागीण विकास कर सकें, जिससे समाज में सामाजिक एवं आर्थिक न्याय स्थापित हो सके। अन्त में 24 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुआ। नवीन पंचायती राज व्यवस्था स्थापित हो गयी, जिसका मूलउद्देश्य सत्ता का विस्तार समाज के कमजोर और निर्बल तबके तक होना है, जिसके माध्यम से लोकतन्त्र में निर्बल और कमजोर सामाजिक तबका अर्थात अनुसूचित जाति/जनजाति की सहभागिता को बढ़ाना है। और इनके सामाजिक जीवन को उन्नत कर सामाजिक न्याय स्थापित करना है एवं भारतीय संस्कृति की आत्मा, ‘सामाजिक एकता‘ को मूर्त रुप प्रदान करना है।  उत्तर प्रदेश ने भी पंचायत की इसी व्यवस्था को अपनाया है। उ0प्र0 की पंचायतों में आरक्षण व्यवस्था लागू होने के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति की सहभागिता बढ़ी है, और उनके सामाजिक आर्थिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक जीवन में बृद्धि हुई है, और भविष्य में इनकी दशा में क्या सुधार होगा? इसलिए उ0प्र0 की पंचायतों के वर्तमान परिदृश्य में एक दृष्टि डालना आवश्यक है।  उ0प्र0 राज्य में कुल जिलों की संख्या 75 ब्लाक 823 एवं ग्राम पंचायतें 59062 है। यहाॅ पर  केवल ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जाति की सहभागिता पर ही विशेष रुप से मेरा षोध पत्र अधारित है, इसलिए इस ओर ध्यान आकर्षित करता हूॅ। 2015 के पंचायत चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभर कर आयी कि महिलाओं एवं अनुसूचित जाति के लोग सिर्फ वोट डालने व आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने तक ही सीमित नही रहे, बड़़ी संख्या में ग्राम                प्रधान के रुप में निर्वाचित भी हुए। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात इस चुनाव में यह देखी गयी कि जहाँ एक तरफ सबल व षक्तिमानों का आधिपत्य रहा तो दूसरी तरफ धीरे धीरे ही सही निर्बलों में भी राजनीतिक चेतना जगी जिसमें अनु0 जाति जनजाति की भागीदारीता लगभग साढ़े बारह हजार रही। इस चुनाव में बडें पैमाने पर शक्तिवान और सत्ता से जुड़े लोगों की ही जीत हुई है। जिनमें तत्कालीन सरकार के कैबिनेट मन्त्री, गायत्री प्रजापति का भतीजा, महबूब अली की भाभी, बलराम यादव के भाई, सीतापुर विधायक झीन बाबू की भाभी, बसपा प्रदेष अध्यक्ष रामअचल राजभर के पुत्र, संजय राजभर की पत्नी एवं डी0जी0पी0 जगमोहन यादव की भाभी आदि उम्मीदवार विजयी रहे।  इन पच्चीस वर्षों में पूरे राज्य में लगभग पचास हजार दलित एवं आदिवासी पंचायतों में अध्यक्ष के रुप में चुनकर आये है, इस समय गाॅव के प्रत्येक गली में चुना हुआ प्रतिनिधि है। क्या आज पंचायत स्वतंत्र रुप से अपना दायित्व निभा रही हैं, क्या आज नेता व नौकरशाही का पंचायतो में दखल नही है?  केन्दªीय पंचायती राजमन्त्रालय ने 2015-16 में विकेन्दªीकरण रिपोर्ट जारी की जिसके अनुसार देश का कोई ऐसा राज्य नहीं हैं जिसने पंचायतों को सशक्त करने के लिए पूरे 100ः प्रयास किया हो। यदि इस गति से पंचायतों का विकास होगा तो क्या भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा ( अनेकता में एकता ) को साकार रुप प्रदान किया जा सकता है। अर्थात समाज में अनेक विषमताओं के वावजूद भी समाजिक एकता और पंचायतों द्वारा ग्रामीण समाज में समाजिक न्याय को स्थापित किया जा सकता है?  73 वाँ सविधान सशोधन अधिनियम भारतीय लोकतन्त्र में अनुसूचित जाति के लोगों की राजनैतिक सहभागिता की दिशा में सकारात्मक साबित हुआ है, यह संशोधन प्रमुख रुप से लोकतान्त्रिक विकेन्दªीकरण की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों को राजनैतिक सहभागिता प्रदान करने हेतु प्रतिलक्षित हुआ है।
भारतीय लोकतन्त्र मूलतः पंचायतीराज व्यवस्था पर आधारित है। आधुनिक पंचायतें भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला है। पंचायतों का यह स्वरुप भारतीय संस्कृति की सतत् विकास को परिलक्षित करता है, जो समाज में सामाजिकता के साथ -साथ एकता को बनाये रखते हुए सामाजिक न्याय को स्थापित करने में सक्षम है।
यदि आधुनिक पंचायतों को स्वतंत्र रुप से कार्य करने दिया जायें और इन पर सत्ता में बैठे नेताओं एवं नौकरशाही की दखलन्दाजी न के बराबर हो और पंचायतों के द्वारा गाॅव में शिक्षा स्वास्थय, स्वच्छता के साथ साथ भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को स्थापित कर सुसभ्य, सुस्ंकृत एंव सकारात्मक सोच का नागरिक विकसित किया जायें, तो सम्पूर्ण भारत देश में भारतीय संस्कृति की आत्मा अनेकता में एकता को स्थापित किया जा सकता है।

संदर्भ सूची

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