ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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गीतिकाव्य के रूप में पवनदूतम् की समीक्षा

– डाॅ0 अल्का श्रीवास्तव

काव्य प्रारम्भ में उत्तम मध्यम और अधम भेद से तीन प्रकार का होता है। व्यङ्ग्य सहित काव्य को उत्तम, व्यङ्ग्य रहित काव्य को अधम तथा किष्चित् व्यङ्ग्य सहित काव्य को मध्यम कहा जाता है। यह विभाजन काव्य गुण के आधार पर किया गया है किन्तु आकार के रूप में काव्य दो प्रकार का होता है – काव्य प्रारम्भ में उत्तम मध्यम और अधम भेद से तीन प्रकार का होता है। व्यङ्ग्य सहित काव्य को उत्तम, व्यङ्ग्य रहित काव्य को अधम तथा किष्चित् व्यङ्ग्य सहित काव्य को मध्यम कहा जाता है। यह विभाजन काव्य गुण के आधार पर किया गया है किन्तु आकार के रूप में काव्य दो प्रकार का होता है -1. दृश्य काव्य।2. श्रव्य काव्य।श्रव्य काव्य के पुनः तीन भेद होते है – (अ) पद्य काव्य। (ब) गद्य काव्य। (स) चम्पू काव्य।पुनश्च पद्य काव्य के दो भेद होते है – (अ) प्रबन्ध काव्य। (ब) मुक्तक काव्य।1. महाकाव्य।2. खण्ड काव्य।खण्ड काव्य काव्य के एक अंश का अनुसरण करने वाला खण्ड काव्य होता है।1 खण्ड काव्य अथवा गीतिकाव्य दोनों वस्तुतः एक ही है क्योंकि संस्कृत के लक्ष्मणग्रन्थों में गीतिकाव्य से कोई भेद या अभेद दृष्टिगोचर नहीं होता है। इसका कोई नाम, सङ्केत भी संस्कृत जगत में नहीं है। रागात्मक वृत्ति को अल्पशब्दों में प्रकाशित करते हुए भावुक कवि की माधुर्यमयी अभिव्यक्ति भी गीति है और गीति आध्यात्मिक भावों का साङ्गीतिक अभिव्यष्जन भी है। ताल, लय और गेय गुणों से युक्त गीति        माधुर्य एवं संक्षिप्तता तथा सङ्गीत का त्रिस्त्रोत सङ्गम है। उत्तेजना के भावनामय क्षणों में मानवमन किसी आभा से स्वयं ही शब्दों में चमक उठता है और मार्मिक भावाभिव्यष्जन करता है तो उसे गीतिकाव्य कहते हैं। यद्यपि गीतिकाव्य का बीज वेदों में मिलता है तथापि इसका प्रशस्त रूप कालिदास विरचित ऋतुसंहार और मेघदूत से प्राप्त होता है। गीतिकाव्य प्रेम, परिचय, सौहार्द, व्यवहार व्यङ्ग्य, विदेहमुक्ति और जीवन का आनन्द भी है। वह प्रेम की अजस्त्र धारा का पान भी करती है। प्रेम प्रसार भी है और परमार्थ भी। प्रेम प्रसङ्ग में अचेतन पदार्थ के द्वारा संदेश प्रेषित करना ही संदेश काव्य की विशेषता है। कालिदास की मेधदूत से स्फूर्ति लेकर संस्कृत साहित्य में एक विशिष्ट साहित्य का अभ्युदय हुआ। सङ्गीतात्मकता प्रमुख भाव प्रधान एवं रस परिपाक से परिपूर्ण संदेश काव्य का प्रणयन हुआ। मेघदूत की शैली पर लिखे गये दूत काव्यों में पवनदूतम् प्राचीन एवं उत्कृष्ट है। दूतकाव्यों में पूर्णतया विरह की प्रधानता होती है। विप्रलम्भ श्रृङ्गार प्रधान दूतकाव्यों में नायक अथवा नायिका अपने प्रियजन के पास संदेश प्रेषित करते है। इस प्रकार के काव्यों का प्रणयन उत्तर भारत से लेकर बङ्गाल तक सर्वाधिक हुआ। इस देश के दूतकाव्य के प्रणेताओं में निहित काव्यात्मक सौन्दर्य संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर है।    पवनदूतम् में गन्धर्वकन्या कुवलयवती के विरह से आकुलित मानस का गम्भीर चित्रण किया गया है। वियोग से व्यथित होकर कुवलयवती परवश हो उठती है और अपने प्रियतम से मिलने के किसी भी मार्ग को प्राप्त कर अपने घर की ओर से आने वाले पवन के द्वारा गन्धर्वकन्या कुवलयवती राजा लक्ष्मणसेन को संदेश भेजती है। पवनदूतम् में संदेशात्मक वाक्य विन्यास एवं पद संघटन मनोमुग्धकारी है। मलयपर्वत से बङ्गाल तक के मार्ग का रम्य वर्णन मन्यमुग्धकारिणी शैली में प्रस्तुत करते हुए महाकवि धोयी ने वसन्त ऋतु की वायु को दूत बनाकर भेजने की जो कल्पना की है वह कालिदास रचित मेघदूत में मेघ की कल्पना से अधिक त्वरित गति वाला है। मेघदूत के सृदश ही पवनदूतम् भी एक आदर्श खण्डकाव्य  या गीतिकाव्य है। पवनदूतम् में गीतिकाव्य के सभी गुण विद्यमान है। गन्धर्वकन्या कुवलयवती का संदेश लेकर पवन राजा लक्ष्मणसेन से कहता है कि! मलयाचल के शिखर पर कोई गन्धर्वों का देश है। उस गन्धर्व देश में कुवलयवती नाम की श्रेष्ठ लावष्यमयी अङ्गनाओं में एक अद्वितीय मान्या निवास करती है। आप मुझे उस मान्या योषिता का दूत समझो जो एकाकी ही परस्पर वियुक्त हुए प्रणयीयुगल को संयुक्त कर देता है – श्री खण्डाद्रेर्वसति शिखरे कोऽपि गन्धर्वलोकः, स्तत्रास्त्येका कुवलयवतीनाम् मान्याङ्गनानाम्। दूतं तस्याः कलप मलयोपत्यकामारूतं माँ, कामिद्वन्द्वं घटयति मिथो विप्रयुक्तं य एकः।।1 कुवलयवती पवन को समझाती हुई कह रही है कि तुम उस राजा से निवेदन करना कि वह कान्ता कुवलयवती आप की विरह से व्यथित होकर निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित कर रही है – जित्वा देवं त्वयिसरभसं दाक्षिणात्यान् क्षितीशान् प्रत्यावृत्ते मलयकटाच्चित्तमादाय तस्याः। दूरं याते कमितरि वृथा वृत्तिरस्येति तस्या, वाष्पोत्पीड़ा सपदि पदवीं संरूरोधे क्षणस्य।।2        दूत पवन को यह कहने के लिए प्रेरित करती है कि वह प्रणयिनि कुवलयवती तुम्हारे समीप आने के लिए अत्यधिक उत्कङ्ठित है – विन्यस्याग्रं भुवि चरणयोः कौतुकोत्तम्भिताक्षी, त्वत्सम्पर्क प्रकृति सुभगामुन्नत ग्रीवमाशाम्। उत्पश्यन्ती किमपि सुतनुर्लक्ष्यते सौध ङ्गाद् उद्भिन्नाश्रुस्थगितभसकृत् त्वत्समीपं यियासुः।।3 कामपीड़िता कुवलयवती की जीवनरक्षा का उपाय अब राजा लक्ष्मणसेन पर ही निर्भर करता है। यह बात पवन स्वयं राजा लक्ष्मणसेन से कहता है – तस्यास्तीव्रस्मरहुतभुजा दह्यमानाङ्गयष्टे – न्र्यस्तं सद्यः स्तनपरिसरे चन्दनं शोषमेति, उक्तैः किं वा बहुभिरपदारोपितस्वान्तवृत्ते – स्त्वय्यायत्तः कुवलयदृशो जीवरक्षाप्रकारः।।4    अर्थात् तीक्ष्ण कामानल से जाज्वल्यमान सुकुमार अङ्गों वाली उस कुवलयवती के पयोधर पर लगाया गया चन्दन शीघ्र शुष्कता को प्राप्त हो जाता है अथवा अधिक कहने से क्या लाभ, अनुपयुक्त स्थान में अपने हृदयव्यापार को आरोपित करने वाली तथा नीलकमल के समान नेत्रों वाली उस कुवलयवती की प्राणरक्षा का उपाय आप पर भी है। गन्धर्व कन्या कुवलयवती दूत पवन से एकान्त स्थान में राजा लक्ष्मणसेन से संदेश कहने के लिए प्रेरित करती है –    सद्यः कृत्वा पवन दिनियादष्जलि मूध्र्नि किष्चिद् वक्तव्योऽसौ रहसि भवता मद्गिरा गौडराजः। त्वक्तः श्रोष्यत्यवहित मनाः सोऽनु रक्ताङ्गनानां, जायन्ते हि प्रणयिनि सुधावीचयो वाचिकानि।।1 पवन कुवलयवती द्वारा भेजे गये संदेश को कहते हुए कहता है कि कुवलयवती आपको साक्षात् विष्णु के समान मानती है:- पाश्र्वे पश्चार्दाप च पुरतो दर्शयन्नात्मरूपं, व्यक्तं देव त्वमसि जगतामीश्वरः शाङर््ग पाणिः। तन्मां भक्तिप्रवणमनसं नानुगृह्णासि कस्मात्, कायव्यूहं रचयितुमलं नापरः कैटभारेः112 कवि के काव्य में समाज की झलक सदा विद्यमान रहती है। पवनदूतम् चूंकि विप्रलम्भ श्रृङ्गार प्रधान है अतः अधिक तो नहीं फिर भी कुछ विवरण संयोग श्रृङ्गार के पवनदूतम् में अवश्य मिलते है। गन्धर्वकन्या कुवलयवती का स्वयमेव दूतभेजना इस बात का प्रतीक है कि तत्कालीन समाज में कदाचित स्वच्छन्द आचरण भी होता रहा होगा। ऐसी स्त्रियां क्या कर रही हैं, इसकी भनक उनके घरवालों को भी नहीं लगती है। इसी भाव को महाकवि धोयी ने पवनदूतम् में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है – लीलोद्याने वितरति दृशं यत्नसंरूद्धवाष्पा, सान्द्रे चन्द्रार्चिषि निविशते चन्दनाभ्यक्त गात्रौ। क्रीडावापी मरूद्भिमुखं धावति व्याकुलासौ, किं वा नार्यो रमण विरहे साहसं नाचरन्ति।।3 पवनदूतम् में वर्णित काल वीर भोग्या वसुन्धरा का समय था। राजागण अपना शौर्य, यश तथा राज्य सीमावर्द्धन के लिए सदैव एक दूसरे पर आक्रमण किया करते थे। राजा लक्ष्मणसेन ने भी दक्षिण के राजाओं पर विजय प्राप्त की थी – जित्वा देवं त्वयिसरभसं दाक्षिणात्यान् क्षितीशान, प्रत्यावृत्ते मलयकटकाच्चित्तमादाय तस्याः। दूरं याते कमितरि वृथा वृत्तिरस्यति तस्या, वाष्पोत्पीड़ा सपदि पदवीं संरूरोधेक्षणस्य।।4 राजा यद्यपि अन्तःपुर में अनेक रानियों के होते हुए भी प्रायः रसिक प्रवृत्ति के होते थे तथापि अन्तःपुर के भय से बाह्य रमणियों को स्वीकार करने में हिचकते थे – सा सर्वत्राप्रतिहतगतिर्विद्यया सत्यपि त्वां, प्रत्याख्यानात्सुभग सहसा विभ्यती नाभ्युपैति। राजानो हि प्रकृतिरसवच्चेतसोऽव्यन्यनारीं, रूढ़प्रेमप्रबलवनिताभीरवो नो लसन्ति।।5
तत्कालीन समाज में धार्मिक भावना प्रबल रूप से विद्यमान थी। राजा या धनाढ्य व्यक्ति प्रायः मंदिर बनवाया करते थे और मंदिर गगनचुम्बी शिखरों वाले होते थे। देखने पर इनका वैभव राजसी प्रतीत होता था क्योंकि भारत में मंदिर सदैव वैभव, कला, सङ्गीत आदि के केन्द्र होने के फलस्वरूप आकर्षण बिन्दु रहे हैं जिनमें भारतीय संस्कृति की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है। कवि धोयी के समय में दक्षिण और बङ्गाल में विष्णु तथा शिव के कलात्मक मन्दिर प्रायः दृष्टिगोचर होते थे – क्रुध्यद्गौरीकरकिसलयाकृष्ट चूङ्ासुधांशो – र्द्रक्ष्यस्युच्चैः कुलमकलुषं, तत्र रामेश्वरस्य। मध्यं यत्र त्रिवलिविषमं वारसीमन्तिनीनां हस्तोत्कम्पं कथयति विधेः सृष्टकाष्चीपदस्य।।1 तथा पष्चाप्सर पवित्र जलाशय का दर्शन और स्थान धार्मिक भावना का प्रतीक है। गौण रागसेन वंशीय विष्णु उपासक ने विष्णु भगवान का एक मन्दिर बनवाया है। इस मन्दिर मे भगवान विष्णु की प्रधानता के साथ-साथ अनेक देवों के मन्दिर भी हैं – तस्मिन सेनान्वयनृपतिना देवराज्याभिषिक्तो, देवःसुह्येवसति कमलाकेलिकारो मुरारिः। पाणौ लीलाकमलमसकृद् यत्समीपे वहन्त्यो, लक्ष्मीशङ्का प्रकृतिसुभगाः कुर्वते वाररामाः।।2 इस श्लोक में ‘वाररामाः‘ से विदित होता है कि नील कमल लिए हुए अप्सरायें लक्ष्मी होने का भ्रम उत्पन्न करती हैं। इससे यह भी प्रतीत होता है कि उस समय तक मन्दिरों में देवदासियों की प्रथा भी प्रचलित हो चुकी थी – गोष्ठीबन्धः सकलकविभिर्वाचि वैदर्भिरीति – र्वासोगङ्गापरिसरभुविः स्निग्धभोग्या विभूतिः। सत्सु स्नेहः सदसि कविताचार्यकं भुभूजां में भक्तिर्लक्ष्मीपतिचरणयोरस्तु जन्मान्तरेऽपि।।3अपि च – यावच्छम्भुर्वहति गिरिजासंविभक्तं शरीरं, यावज्जैत्रं कलयति धनुः कौसुमं पुष्पकेतुः। यावद्रधारमणतरूणीकेलिसाक्षी कदम्ब – स्तावज्जीयात्कविनसतेरेष वाचां विलासः।।4अपि च – कीत्र्तिलब्धा सदसि विदुषां शीतलक्षौणिपाला, वाक्सन्दर्भाः कतिचिदमृतस्यन्दिनो निर्मिताश्च। तीरे सम्प्रत्यमरसरितः क्वापि शैलोपकण्ठे, ब्रहनाभ्यासे प्रयतमनसा नेतुमीहे दिनानि।।5      उपर्युक्त से यह प्रकट होता है कि तत्कालीन समाज में धार्मिक तथा भक्ति भावना अपने चरम उत्कर्ष पर थी। महाकवि धोयी ने अपने दूतकाव्य पवनदूतम् में वैभवपूर्ण समाज और भोग विलास का विवेचन किया है तत्कालीन युग में वाराङ्गनाओं आदि का विशेष स्थान था और वे उच्च वर्गीय समाज की एक अङ्ग थीं। वे अपने प्रिय के नखक्षत को गर्व से धारण करती थीं और उससे शिव द्वारा शिरोधार्य चन्द्रमा माँगती थी। प्रायः भक्त अपने        आराध्य के चिन्ह को धारण भी करते हैं। तत्कालीन समाज में भक्ति और श्रृङ्गार की गङ्गा जमुनी संस्कृति प्रचलित थी। पवनदूतम् में महाकवि धोयी ने अनेक उच्च अट्टालिकाओं का विवेचन किया है – यत्सौधानामुपरि वऽभी शालभुष्जीषु लीनाः, सुस्निग्धासु प्रकृतिमधुरा केलिकौतूहलेन। उन्नीयन्ते कथमपि रहः पाणिपङ्केरूहाग्र – स्पर्शोद्गच्छत्पुलकमुलाः सुभु्रवो वल्लभेन।।1 पवनदूतम् में रमणियाँ शरीर पर चन्दन, केसर आदि का अङ्गराग, हार, कर्णाभूषण महावर आदि से अपना श्रृङ्गार किया करती थीं। केलिगृह क्रीडावासी आदि धनाढ्य समाज के प्रतीक थे। उपवन का सेवन और चाँदनी रात ये विलास प्रियता के द्योतक थे। महाकवि धोयी ने विजयपुर नगर का वर्णन अत्यन्त समृद्धशाली नगर के रूप में किया है क्योंकि महर्षि अगस्त्य के द्वारा समुद्र के समस्त जल को पी लेने के बाद मानो राजा ने वहाँ के समस्त वैभव का अपहरण कर लिया है – रत्नैर्मुक्तामरकतमहानीलसौगान्धिकाद्यैः, शङ्खैर्बालावलय रचना बन्धुभिर्विद्रुमैश्च। लेपामुद्रारणमुनिना पीतनिः शेषवारेः श्रीः सर्वस्य हरति विपदं यत्र रत्नाकरस्य।।2 महाकवि धोयी विरचित पवनदूतम् में युवकों के लिए तप्तस्तन, अङ्गराग, झूला, वनिता, माला तथा चाँदनी रातें आदि का विवेचन किया गया है – वृद्धोष्माणः स्तनपरिसराः कुङ्कुमस्याङरागा, दोलाः केलिव्यसनरसिकाः सुन्दरीणां समूहाः। क्रीडावाप्यः प्रतनुसलिला मालतीदाम रात्रिः सत्यानज्योत्स्ना मुदमविरतं कुर्वते यत्र यूनाम्।।3
रागात्मक वृत्ति को अल्प शब्दों में प्रकाशित करते हुए भावुक कवि की माधुर्यमयी अभिव्यक्ति ही गीति है और गीति आध्यात्मिक भावों का सांगीतिक अभिव्यष्जन है। ताल, लय और गेय गुणों से युक्त गीति माधुर्य संक्षिप्तिता एवं सांगीतिका का त्रिस्त्रोत संगम है। उत्तेजना के भावनामय क्षणों में मानवमन जब किसी आभा से उद्दीप्त होकर स्वयं ही शब्दों में चमक उठता है और मार्मिक भावाभिव्यष्जन करता है तो उसे गीतिकाव्य कहते है। यद्यपि गीतिकाव्य का बीज वेदों में मिलता है तथापि इसका प्रशस्त रूप कालिदास विरूचित मेघदूत से प्राप्त होता है। प्रेम-परिचय, सौहार्द्र, व्यवहार, व्यङ्ग्य, विदेहमुक्ति आनन्द भी है। प्रेम अजस्त्र धारा का पान भी करती है। प्रेम पुरूषार्थ भी है और परमार्थ थी। प्रेम प्रसङ्ग में अचेतन पदार्थ के द्वारा ही संदेश प्रेषित करना संदेश काव्य की विशेषता है। धोयी ने कालिदास विरचित मेघदूतम् से प्रभावित होकर पवनदूतम् की रचना की है। क्योंकि मेघदूतम में विरह संतप्त मानस यक्ष अपनी प्रेयसी यक्षिणी को मेघ के द्वारा संदेश भेजता है जबकि पवनदूतम में वियोगव्यथिता गन्धर्वकन्या कुवलयवती मलय पवन के द्वारा अपने प्रियतम तक संदेश भेजने की योजना बनाती है। पवनदूतम में संदेशवाहक पवन प्राकृतिक तत्व है। महाकवि धोयी का पवन नामक दूत केवल संदेश लेकर जाता है। संदेश कहता है किन्तु लौटता नहीं हैं अस्तु यह एक पक्षीय प्रबन्ध काव्य है। महाकवि धोयी का प्रकृति वर्णन विप्रलम्भ श्रृङ्गार पूर्ण है किन्तु कालिदास जितना सशक्त नहीं।    कालिदास से प्रभावित होकर महाकवि ने भी लताकुष्ज, वन, उपवन, नगर, पर्वत, नदियाँ, जलक्रीड़ारत, सुन्दरी आदि का वर्णन किया है कुछ वैषम्य होते हुए भी कालिदास और महाकवि धोयी में अनेक साम्य हैं। साहित्य दर्पण के लक्षण के अनुसार गीतिकाव्य में जीवन के किसी एक भाग का चित्रण होता है। मेघदूत मंे यक्ष के जीवन के किसी एक भाग का चित्रण हुआ है, उसी प्रकार पवनदूतम् में गन्धर्व कन्या कुवलयवती के जीवन के एक भाग (प्रणय प्रसङ्ग) का चित्रण हुआ है। गीतिकाव्य प्रधानतः श्रृङ्गार, धर्म अथवा नीति प्रधान होते हैं, पवनदूतम् श्रृङ्गार रस के वियोग पक्ष से अलङ्कृत रचना हैं। गीतिकाव्य में भावना को उच्च स्थान प्राप्त होता है, घटना वर्णन गौण होता है। पवनदूतम् में कुवलयवती द्वारा लक्ष्मणसेन के प्रत्यक्ष दर्शन की घटना गौण है और विरह भावना की प्रधानता है। इस प्रकार के काव्य में एक ही भावना, एक ही निवेदन, एक ही रस होता है। पवनदूतम् इस उक्ति को चरितार्थ करता हैं। इस खण्डकाव्य में कुवलयवती का एक मात्र उद्देश्य पवन के माध्यम से लक्ष्मणसेन तक अपना प्रणय संदेश प्रेषित करना है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत लक्षणग्रन्थों के अनुसार पवनदूतम् खण्डकाव्य अर्थात् गीतिकाव्य के अन्र्तगत आता है। इस गीतिकाव्य में अनुप्रास, श्लेष, उत्प्रेक्षा, रूपक, विभावना, विशेषोक्ति, समासोक्ति आदि अलङ्कारों का और विप्रलम्भ श्रृङ्गार का प्रमुखता से चित्रण तथा यत्रतत्र संयोग श्रृङ्गार के संयोजन के साथ-साथ करूण, वीर, रसों का अङ्गरस के रूप में प्रतिपादन किया गया है। कनक नगरी से लेकर सेन की राजधानी विजयपुर स्कन्धावार तक मार्ग विवेचन में नदी, पर्वत, नगर, लताकुष्ज आदि का वर्णन करते हुए महाकवि धोयी ने मानवीय सौन्दर्य तथा सौन्दर्य से उद्भूत माधुर्य का रसास्वादन कराया है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची -1. खण्डकाव्यं भवेत्काव्यैस्यैक देषानुसारि च। साहित्य दर्पण-आचार्य विश्वनाथ, 6/328, पृ0-226, सं0-शालग्राम शास्त्री।1. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-62, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।2. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-63, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।3. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-64, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।4. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-94, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।1. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-96, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।2. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-97, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।3. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-89, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।4. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-63, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।5. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-93, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।1. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-11, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।2. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-28, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।3. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-102, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।4. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-103, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।5. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-104, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।1. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-37, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।2. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-44, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।3. पवनदूतम्-धोयी, श्लोक सं0-42, सं0-प्रो0 महेश नाथ चतुर्वेदी।

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