ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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न्यायिक सक्रियता एवं महिला सशक्तीकरण (कुछ न्यायिक निर्णयों के माध्यम से)

डाॅ0 नीलम गुप्ता
एसो0 प्रोफेसर
राजनीति विज्ञान विभाग, बरेली काॅलेज, बरेली

भारत का संविधान भारत की सर्वोच्च विधि है। भारतीय संविधान की सर्वप्रमुख विषेशता है कि इसमें प्रत्येक स्त्री-पुरुष को समान अधिकार दिये गये हैं। संविधान निर्माता स्त्रियों की स्वतंत्रता की समस्या के समाजशास्त्र के प्रति जागरूक थे। वे जानते थे कि लिंग समानता राष्ट्रीय विकास के लिये अपरिहार्य है। इन उद्देयों को ध्यान में रखते हुये तीन बातों का प्रावधान रखा गया0 -भारत का संविधान भारत की सर्वोच्च विधि है। भारतीय संविधान की सर्वप्रमुख विषेशता है कि इसमें प्रत्येक स्त्री-पुरुष को समान अधिकार दिये गये हैं। संविधान निर्माता स्त्रियों की स्वतंत्रता की समस्या के समाजशास्त्र के प्रति जागरूक थे। वे जानते थे कि लिंग समानता राष्ट्रीय विकास के लिये अपरिहार्य है। इन उद्देयों को ध्यान में रखते हुये तीन बातों का प्रावधान रखा गया0 -(1) लिंग के आधार पर विभेदीकरण का निषेध(2) महिलाओं की विशिष्ट मनोवैज्ञानिक, जीववैज्ञानिक एवं सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए  विधान बनाने की पक्ति। (3) राज्यों को इन विधानों के लिए निर्देशन देने के लिये नीति निर्देशक तत्व -महिलाओं के प्रति समानता हेतु प्रतिबद्व दृष्टिकोण भारतीय संविधान की आत्मा यानि प्रस्तावना से भी स्पष्ट परिलक्षित होती है -‘हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिये, तथा हम सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिचित करने वालीबंधुता बढ़ाने के लिये दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दि0 26.11.49 को ऐकद्वारा इस संवि को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मर्पित करते हैं0’ किन्तु संविधान और सिद्धान्तों में समानता की स्वीकृति एक बात है, और व्यवहार में उसे कार्यान्वयन करना दूसरी बात है, भारत में इन दोनों के बीच का फासला स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इस फासले को कम करने में न्याय पालिका ने समय-समयपर अपने निर्णयों के माध्यम से सकारात्मक प्रयास किया है। संविधान में प्राप्त महिला कानूनों को स्थापित करने हेतु अनेक विधानों को अपनाया गया है। संयुक्त राश्ट्र संघ द्वारा 1979 में ;ब्वदअमदजपवद व िमसपउपदंजपवद व िकपेबतपउपदंजपवद ंहंपदेज ूवउंदद्ध ;ब्म्क्।ॅद्ध बना। कोर्ट ने इन विधानों की व्याख्या करने के दौरान (अनु0 51) ब्म्क्।ॅ से अक्सर दिशा निर्देष लिये हैं। कोफी अन्नान (संयुक्त राष्ट्र के पूर्व            अध्यक्ष) ने कहा था-किसी भी देष की प्रगति को महिला स्पष्टीकरण से ही परिमापित किया जा सकता है। हमारे देश में स्वतंत्र न्यायपालिका, जहाँ एक ओर परम्परागत रुप में, कानूनों की व्याख्या करती है, वहीं न्यायिक सक्रियता के माध्यम से न्याय, मानवता के संरक्षण हेतु विधानों से परे जाकर भूमिका का निर्वहन करती है। एलेक्जेण्डर हैमिल्टन ने माना ‘‘न्यायपालिका की व्याख्या के बिना विधि/कानून मृत्यु पत्र के समान है।’’0 इस श्ंाोध पत्र मेें लैंगिक न्याय को स्थापित करने में न्यायपालिका द्वारा निर्णीत कुछ मामलों में दृष्टिपात करना समीचीन है, जो लैंगिक न्याय व महिला स्पष्टीकरण के क्षेत्र में स्तम्भ साबित हुए हैं। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत किसी विधि के उन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है जो वर्गीकरण का आधार केवल महिला एवं पुरुष होने के आधार पर करते हैं एयर इण्डिया बनाम नरगिश मिर्जा,1 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने एयर इण्डिया एयर लाइन्स के उन विनियमों को असंवैधानिक घोषित कर दिया जो लिंग के आधार पर विभेद करती थी इस मामले में एयर इंडिया के उस नियम की वैधता को चुनौती दी गयी जिसके अधीन विमान सेवा एवं परिचारिकाओं को 35 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने अथवा उनके प्रथम बार गर्भवती हो जाने पर उन्हें सेवानिवृत्त करने का उपबन्ध था। उच्चतम न्यायालय द्वारा इन वर्षो को अंसवैधानिक घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने इसे विभेदकारी मानते हुए कहा कि पुरुश को 45 वर्श की आयु में और महिला को 35 वर्श की आयु में सेवानिवृत्त करना एक मनमानी व्यवस्था है लेकिन इसी मामले में उस व्यवस्था को संवैधानिक करार दिया गया जो परिचारिकाओं के सेवा में प्रवेश के 4 वर्षो के भीतर विवाह न करने का उपबन्ध करती थी। न्यायालय ने कहा यह परिचारिकाओं के स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण दोनों दृष्टियों से हितकर है। सी0बी0 मुथम्मा बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया और नरगिश मिर्जा2 कार्यस्थल पर स्त्री-पुरुष की बराबरी की न्यायिक चिन्ता की मसाले हैं। उच्चतम न्यायालय ने उन सेवा नियमों को असंवैधानिक ठहराकर रद् कर दिया जिनमें विवाह और गर्भधारण को किसी पद पर नियुक्ति अथवा पद पर बने रहने के अयोग्य ठहराया गया था। इसी तरह ‘माया देवी बनाम राज्य’ में किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने के लिये पति की मंजूरी लेने की बात को बराबरी और न्याय के मापदण्डों के खिलाफ बताया गया। न्यायाधीश ने महिला के आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होने के महत्व पर जोर दिया और कहा कि ‘यह हमारी सामाजिक समस्याओं के समाधानों में एक है, राज्य को कामकाजी महिला को प्रोत्साहित करना होगा। वह उसे निरूत्साहित करने वाले हालात पैदा करके काम नहीं चला सकेगा, ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 46 के राष्ट्र शब्दों और भावनाओं के विपरीत हैं। ‘नीरा माथुर बनाम जीवन बीमा निगम’3 बाद में भी न्यायालय ने महिला कर्मचारियों की निजी समस्याओं को गुप्त रखने के अधिकार को सुरक्षित रखा है। इसी प्रकार प्रगति वर्गीज बनाम सिरील जार्जवर्गीज4 के मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय की पूर्णपीठ ने भारतीय तलाक अधिनियम 1869 की धारा 10 को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि यह लिंग के आधार पर विभेद करती और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने के कारण अवैध है। अधिनियम की धारा 10 ईसाई महिलाओं और धर्म से शसित होने वाली महिलाओं के बीच विभेद करती है ऐसा विभेद केवल धर्म पर आधारित है अतः उससे अनुच्छेद 14 व 15 का उल्लंघन होता है। मधुकिष्वर बनाम बिहार राज्य5 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि बिहार राज्य की आदिवासी महिलाओं को उŸाराधिकार के अधिकार से वंचित करना अनुच्छेद 14 के आधार पर अविधिमान्य घोषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि उनके रूढ़िगत नियमों को अवैध घोषित किये जाने से वर्तमान विधियों में अनिश्चितता उत्पन्न हो जायेगी। प्रस्तंुत मामले में छोटा नागपुर रैयतवारी अधिनियम, 1908 के उन प्रावधानों की विधिमान्यता को इसी आधार पर चुनौती दी गयी थी, जिसके आधार पर सम्पत्ति के उŸाराधिकार का अधिकार केवल पुरुष को ही प्राप्त था। यह अभिकथन किया गया था कि उक्त प्रावधान महिलाओं के प्रति विभेदकारी है अतः अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने के कारण अवैध है। डैनियल लतीफी बनाम भारत संघ’6 के मामले में मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकारों का संरक्षण)     अधिनियम, 1986 की धारा 3 और 4 की विधि मान्यता को चुनौती दी गई थी। इन धाराओं के अधीन एक तलाक शुदा मुस्लिम महिला को इद्दत की अवधि के पश्चात् भी भरण-पोषण पाने का हक प्रदान किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि उक्त अधिनियम विधिमान्य है और अनुच्छेद 14 के अधीन विभेदकारी नहीं है एवं मुस्लिम पति धारा 3 के अधीन अपनी तलाकशुदा पत्नी का इद्दत की अवधि के पश्चात भी युक्तियुक्त और उचित भरण-पोषण के लिए दायी है। अनुच्छेद 15 (3) का उद्देश्य विशेष रूप से स्त्रियों को संरक्षण प्रदान करना है क्योंकि स्त्रियाँ शारीरिक, मानसिक, आर्थिक तथा अन्य दृष्टियों से पुरुषों से अलग होती है। इन सभी कारणों से कहीं-कहीं इन्हें विशेष संरक्षण की आवश्यकता होती है। इसी कारण राज्य को उनके लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार प्रदान करना उचित है। दŸााश्रेय बनाम स्टेट7 के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया कि राज्य केवल स्त्रियों के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कर सकता है तथा अन्य ऐसी संस्थाओं में उनके लिए स्थान भी आरक्षित कर सकता है। श्रीमति ए0 क्रेकनेल बनाम स्टेट8 के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि किसी महिला को मात्र महिला होने के कारण सम्पत्ति धारण करने अथवा उसका उपयोग-उपभोग करने से वंचित नहीं किया जा सकता है। यदि कोई विधि मात्र इस आधार पर सम्पत्ति से वंचित करने वाली व्यवस्था करती है तो वह असंवैधानिक मानी जायेगी।  आन्ध्रप्रदेश सरकार बनाम विजय कुमार (1995) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया है कि 15 (3) को संविधान में स्त्रियों की प्रास्थिति और सभी कार्य कलापों में उनकी भागीदारी मेंसुधार करने के लिए रखा गया है। विजयलक्ष्मी बनाम पंजाब विश्वविद्यालय9 में विश्वविद्यालय कैलेण्डर के एक नियम के अन्तर्गत महिला महाविद्यालयों में पिं्रसिपल केे पद पर केवल महिलाओं की नियुक्ति का प्रावधान किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि यह नियम अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 16 का उल्लंघन नहीं करता है क्योंकि इसके अधीन किया गया वर्गीकरण युक्तियुक्त है और इसका उस उद्देश्य से सम्बन्ध है जिसे पूरा किया जाना है अर्थात् महिलाओं की सुरक्षा। इसके अधिनियम 15 (3) के अधीन राज्य सरकार को स्त्रियों के लिए विशेष उपबन्ध बनाने की शक्ति प्राप्त है और न्यायालय अनुच्छेद 15 (3) के अधीन राज्य द्वारा लिए नए नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।  अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष उसे अपने प्राण अथवा दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त शब्द ‘दैहिक स्वाधीनता’ का उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्तृत निर्वचन किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न वादों में अपने निर्णयों द्वारा अनुच्छेद 21 का विस्तृत निर्वचन कर महिलाओं को विभिन्न प्रकार के अधिकार प्रदान किये गये है जिसमें से कुछ अधिकार निम्नलिखित हैं- एकान्तता का अधिकार, मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार, शिक्षा पाने का अधिकार, चिकित्सा सहायता पाने का अधिकार, पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरूद्व संरक्षण, नियोजन के दौरान यौन शोषण के विरूद्व अधिकार, बलात्कार से पीड़ित महिला का अन्तरिम प्रतिकर पाने का अधिकार, महिलाओं को वेश्यावृत्ति से बचाने तथा उनकी सन्तानों के पुनर्वास हेतु सरकार को निर्देश देने का अधिकार, अमानवीय व्यवहार के विरूद्व संरक्षण, मृत्युदण्ड से निलम्बन का अधिकार।  एकान्तता का अधिकार प्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद 21 में प्रदत्त नहीं किया गया परन्तु न्यायालय द्वारा निर्वचन के माध्यम से महिलाओं की एकान्तता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्य किया गया है। किसी भी व्यक्ति को किसी महिला की एकान्तता भंग करने का हक नहीं है। टी सरीथा बनाम दी वेंकट सुब्बैया’10 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 9 द्वारा प्रदŸा दाम्पत्य अधिकारों की पुनस्र्थापना सम्बन्धी उपचार को एक जंगलीपन तथा बर्बरता से भरा हुआ उपचार बताया जो संविधान के अनुच्छेद 21 में दिये गये व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मानवीय गरिमा का उल्लंघन करता है। न्यायालय के अनुसार दाम्पत्य अधिकारों के पुनस्र्थापन की डिक्री व्यक्तिगत एकान्तता के अधिकार का उल्लंघन है। इसी प्रकार महाराष्ट्र राज्य बनाम मधुकर नारायन11 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि एक चरित्रहीन महिला को भी एकान्तता का अधिकार प्राप्त है और उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।  इसी क्रम में एक महिला को कौमार्य परीक्षण के लिए मजबूर करना उसके एकान्तता के अधिकार का उल्लंघन माना जायेगा। सुरजीत सिंह थिंड बनाम जीत कौर12 के मामले में पंजाब और हरियाणा के उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि किसी महिला के कौमार्य परीक्षण के लिए अनुमति देना अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रदŸा उसके एकान्तता के अधिकार का उल्लंघन है, किन्तु शारदा बनाम धर्मपाल13 के मामले में यह निर्धारित किया गया कि एकान्तता का अधिकार उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत विकसित किया गया है, यह किसी अधिनियम या संविधान में स्पष्टता है उल्लिखित नहीं है। अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ शब्दावली के निर्वचन के दौरान ही एकान्तता के अधिकार का सृजन किया गया है किन्तु यह अधिकार निरपेक्ष अधिकार नहीं है। वाद के तथ्य के अनुसार वैवाहिक मामलों में परिवार न्यायालय विवाह के किसी भी पक्षकार को चिकित्सीय परीक्षण का आदेश दे सकती है ऐसा आदेश एकान्तता के अधिकार का अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत उल्लंघन नहीं माना जायेगा। विक्रमदेव सिंह तोमर बनाम बिहार राज्य’14 के मामले में एक लोकहित वाद द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है और राज्य का यह कर्तव्य है कि मानव गरिमा को सुरक्षित करने के लिए अपेक्षित सुविधायें प्रदान करें। मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य15 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने ऐतिहासिक महत्व के निर्णय में यह अभिनिर्धारित किया है कि शिक्षा पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है। संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21 के पश्चात एक नया अनुच्छेद 21 (क) जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार बना दिया गया है। अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार – ‘‘राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे छः वर्ष की आयु से चैदह वर्षा की आयु के सभी बालकांें के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के लिए उपबन्ध करेगा।’’     पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु के विरूद्व संरक्षण का अधिकार के अन्तर्गत पुलिस हवालात में स्त्री कैदियों के साथ होने वाली हिंसा के संबंध में शीला बार्से बनाम महाराष़़़्ट्र राज्य’16 के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा इस संदर्भ में विस्तृत मार्ग दर्शक सिद्वान्त प्रतिपादित किये गये -1. संदिग्ध स्त्री को पृथक रूप से हवालात में रखा जाना चाहिए, उसे पुरुष कैदी के साथ नहीं रखा जाना चाहिए एवं उनकी अभिरक्षा स्त्री कान्सटेबिलों द्वारा की जानी चाहिए।2. स्त्री से पूछताछ स्त्री पुलिस अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए।इसी प्रकार नीलबŸाी बोहरा बनाम उड़ीसा राज्य’17 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया कि पुलिस अभिरक्षा में गिरफतार राष्ट्र व्यक्ति तथा जेल में कैदियों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है और यदि पुलिस अभिरक्षा या जेल में उसके मूल अधिकारों का राज्य या उसके सेवकों द्वारा उल्लंघन होता है तो राज्य को ऐसे नागरिक को प्रतिकर देना होगा।  गौरव जैन बनाम संघ18 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने राज्य और गैर सरकारी स्वैच्छिक संस्थाओं को वेश्यावृत्ति को रोकने तथा उनकी सन्तानों के पुनर्वास के लिए समुचित कल्याणकारी उपायों को कार्यान्वित करने के लिए उनको निर्देश दिया है। विगत कुछ वर्षाे में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों के माध्यम से अनेक नीति निदेशक तत्वों को मूल अधिकार का दर्जा दे दिया है अर्थात् वे अब न्यायालयों द्वारा लागू किया जा सकते हैं। यूनीकृष्णन के मामले में अनुच्छेद 45 में विहित नीति निदेशक तत्व को मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है। रनधीर सिंह बनाम भारत संघ19 में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि यद्यपि समान कार्य के लिए समान वेतन संविधान के अधीन एक मूल अधिकार नहीं है किन्तु एक नीति निदेशक तत्व है, निश्चय ही यह अनुच्छेद 39 (घ) के अधीन एक संवैधानिक लक्ष्य है और यदि राज्य द्वारा इस मामले में विभेद किया जाता है तो न्यायालय इसे पालन कराने के लिए अनुच्छेद 32 केअधीन अपने अधिकारिता का प्रयोग कर सकता है तथा उŸाराखण्ड महिला कल्याण परिषद बनाम स्टेट आॅफ उŸार प्रदेश के बाद में समान कार्य के लिए पुरुष एवं महिला शिक्षकों के वेतन में भिन्नता को इस आधार पर चुनौती दी गयी कि समान पद पर कार्य करने वाले पुरुष शिक्षकों से अधिक वेतन दिया जाना अनुच्छेद 39 (घ) का उल्लंघन है एवं असंवैधानिक है। उच्चतम न्यायालय ने इसे असंवैधानिक मानते हुए महिला शिक्षकों को पुरुष शिक्षकों के समान वेतन दिये जाने के आदेश दिये। अनुच्छेद 42 में महिलाओं को विशेष प्रसूति अवकाश प्रदान करने की बात कही गई है। बी0शाह बनाम प्रिसाइडिंग कोर्ट, कोयम्बूटर20 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह मत व्यक्त किया गया कि अनुच्छेद 42 में अभिव्यक्त नीति निदेशक तत्वों का केवल यही आशय नहीं है कि महिला कर्मचारी अपने अस्तित्व में बनी रहे, वरन् सामाजिक न्याय के अन्तर्गत इसका यह भी आशय है कि ये महिला कार्यकर्मी अपने लुप्त अर्जस्व को भी प्राप्त कर लें।  नूर सबा खातून बनाम मोहम्मद कासिम21 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को उलटते हुए यह अभिनिर्धारित किया है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को अपने बच्चों के लिए जब तक कि वे बालिग नहीं हो जाते हैं, पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है। महिलाओं के साथ भेदभाव या लिंग असमानता व्यक्तिगत कानूनों में अधिक दिखती है। कोर्ट से इस बावत सक्रिय भूमिका निभाने की अपील इन सन्दर्भो के तहत की जाती है:-1ण् अनु0 13 व्यक्तिगत कानून या किसी अन्य कानून के बीच कोई विभेद नहीं करता।2ण् विधायिका राज0 कारणों से किसी नियम में हस्तक्षेप नहीं करेगी न ही नियम बनायेगी।3ण् व्यक्तिगत कानून मूलतः संविधान के भाग 3 के ही विषय क्षेत्र में सन्निहित है।4ण् व्यक्तिगत कानूनों के जो प्रावधान संविधान के अनु0 14, 15 (1) का हल करते हैं, उन्हें असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में कोर्ट ने सरला मुदगल बनाम यूनियन आफ इण्डिया22  एवं मधु किश्वर बनाम बिहार राज्य23 मे कुछ सकारात्मक कदमउठाये। सरला मुद्गल बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि विवाह द्वारा उŸाराधिकार आदि मामलों में एक समान सिविल संहिता का निर्माण किया जाना आवश्यक है।इसी संदर्भ में नारीवादियों के लिये ‘पर्सनल लाॅ’ का मुद्दा विशेष विवादास्पद सन् 1985 की उस घटना के बाद बना जिसे ‘शाहबानो केस’ के रूप में जाना जाता है। मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम24 वाद में धारा 125 के तहत न्यायालय ने शाहबानो के भरण-पोषण के हक में फैसला दिया किन्तु बाद में यह फैसला पर्सनल लाॅ के चलते सामुदायिक एवं धार्मिक सीमितताओं में उलझ कर रह गया। पर्सनल लाॅ के प्रश्न पर 28 फरवरी 1986 को न्यायमूर्ति वी0आर0 कृष्णा अय्यर द्वारा लिखे खुले पत्र के यह अंश उल्लेखनीय है-‘‘यह महिलाओं के मौलिक अधिकारों के प्रति अन्याय है अतः मानवाधिकारों का उल्लंघनकारी भी हैः यह हमारे संविधान में अनु0 14, 21 तथा 25 में वर्णित समानता के सिद्वान्तों के प्रति अन्याय है। यह इक्कीसवी शताब्दी के प्रति भी अन्याय है। भारत का न्यायप्रिय समाज आज इसकी इजाजत नहीं देता’’0। जीवन के अधिकार’ का तात्पर्य है ‘गरिमा के साथ जीवन’। कार्यस्थलों पर कामकाजी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की हर घटना या मुद्दा वास्तव में लिंग समानता, जीवन व स्वतन्त्रता के मूल अधिकारों का हनन है। किसी भी व्यवसाय नौकरी में मूल अधिकारों की रक्षा, काम करने के सुरक्षित वातावरण में निर्भर करती है। अतः यौनिक छेड़छाड़ की प्रत्येक घटना संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 19 (1) (9) का स्पष्ट अतः हनन है। इस सन्दर्भ में विशाखा बनाम राजस्थान केस25 में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। 1997 में इस वाद में पहली बार ‘महिलाओं के साथ अनचाहे व्यवहार’ या यौनिक छेड़छाड़’ को कानूनी रूप से न्यायालय द्वारा परिभाषित किया गया तथा भविष्य में उपयुक्त विधान बनाने सम्बन्धित कुछ दिशा निर्देश, सिद्वान्त तथा मानक तय किये।  लिंग समानता, गरिमा के साथ काम करना, काम करने का उपयुक्त वातावरण, तथा यौनिक छेड़छाड़ से सुरक्षा आदि केसन्दर्भ में संविधान केअनु0 14, 15, 19, 21 (1) (3), 42, 51 । (ं) (ब), 32 एवं 141 महत्वपूर्ण है। इस तरह विशाखा वाद में पहली बार यौनिक छेड़छाड़ को न्यायालय द्वारा परिभाषित किया गया तथा इस केस से छेड़छाड़ को पहली बार अलग अवैधानिक व्यवहार के तहत संज्ञा दी गई। यह यौनिक छेड़छाड़ के मुद्दे के सन्दर्भ में मील का पत्थर थी। छेड़छाड़ के मुद्दे में मुख्य तत्व हैं – ‘अवांछनीय व्यवहार’ (नदूमसबवउमक ेमगनंससल कमजमतउपदमक इमींअपवत) विशाखा बनाम राजस्थान वाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये गये निर्देशों को सर्वप्रथम ए0के0 चैपरा26 मामले में लागू किया गया जिसमें ए0के0 चोपरा ने अपनी सहकर्मी की गरिमा का हनन करने की कोशिश की। दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी याचिका इस आधार पर मानी कि उसने गरिमा का हनन नहीं किया बल्कि हनन करने की कोशिश की किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा केस के दिशा-निर्देशों के आधार पर यह कहा कि कार्यस्थलों में यौनिक छेड़छाड़ लैंगिक समानता तथा जीवन व स्वतन्त्रता के मौलिक            अधिकारों का हनन है। 2016 में निर्भया मामले के बाद जस्टिस वर्मा समिति ने महिला सुरक्षा के प्रति अनेक संस्तुतियाँ दी। न्यायालय ने अनेक न्यायिक निर्णयों के माध्यम से लैंगिक न्याय एवं महिला अधिकार की दिशा में सकारात्मक उठाये। बुद्धदेव कर्मास्कर बनाम बंगाल राज्य27 में महिला के चरित्रहीन होने के बावजूद एकान्तता का अधिकार सुरक्षित रखा। लिलू/राजेश बनाम हरियाणा राज्य28 में माना गया कि यौन उत्पीड़ित महिला का ज्ूव थ्पदहमत परीक्षण भी पुनः उत्पीड़न की पीड़ा जैसा होता है जो उसके शरीर और आत्मा को खण्डित करता है। लक्ष्मी बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया29 मामले में एसिड अटैक की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर एसिड की विक्रय सम्बन्धी सख्त निर्देश दिये गये। धन्नूलाल अन्य बनाम गणेशराम30 एवं अन्य बाद में लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को सम्पत्ति सहित अनेक अधिकारों के पक्ष में न्यायालय ने निर्णय दिया।  अतः न्यायालय ने अपनी सक्रियता के माध्यम से समय-समय पर महिला हितों से सम्बन्धित अनेक न्यायिक निर्णय दिये, जो महिला हितों, लैंगिक न्याय के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुये, जिनसे भारतीय महिलाओं को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों को व्यवहारिक पटल पर सम्भव बनाया जा सका। इसीलिए न्यायमूर्ति पी0एन0 भगवती ने माना – व्यवस्थापिका के सूखे कंकाल में रक्त और जीवन के प्रवाह को न्यायपालिका सम्भव बनाती है।

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