ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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पंचायतीराज में महिला का नेतृत्व एवं राजनीतिक भूमिका

रूद्र प्रताप सिंह (शोध छात्र
राजनीजि विज्ञान विभाग,
बरेली कालेज, बरेली

  लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में 73वाँ संशोधन अधिनिय मील का पत्थर साबित हुआ है। विकेन्द्रीकरण की इस प्रक्रिया से समाज के सभी वर्गों को नेतृत्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। प्रस्तुत अध्ययन अमरोहा जनपद में ग्राम पंचायत स्तर पर निर्वाचित होकर महिला वर्ग के नेतृत्व के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित है। जैसाकि भारत में पंचपरमेश्वर तथा महिला स्वतंत्रता की परम्परा प्राचीन काल से ही थी। पंचपरमेश्वर के रूप में ईमानदार व निष्ठावान सदस्य निष्पक्ष होकर सच्चा व सस्ता न्याय प्रदान करते थें तथा महिलाएंँ स्वतंत्रता पूर्वक अपने को साक्षर, शिक्षित और सशक्त बनाकर सामाजिक व्यवस्था को संतुलित एवं सर्वहितकारी बनाने में निर्विघ्न नही रह पाया। दुर्भाग्यवश सैकड़ो वर्षों की पराधीनता के काल में विदेशी शासक अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु पंचायतीराज व्यवस्था तथा महिला स्वतंत्रता को जानबूझकर समाप्त करने की चेष्टा करते रहे। महिलाओं को घरों की दिवारों के अन्दर बन्द रखने के लिए सतत प्रयास होते रहे, ताकि वे निरक्षर अविकसित और शक्तिहीन बन जायें। ऐसी विकृत व्यवस्था स्थापित करने में एक सीमा में वे सफल भी हुए। सौभाग्य से सन 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो पंचायतीराज व्यवस्था को पुनर्जीवित और सक्रिय करने का प्रयास किया गया, फिर भी पुरूषों में सैकड़ों वर्षों की दासता वाली मानसिकता तथा महिलाओं में व्याप्त निरक्षरता एवं अबलापन की स्थिति के कारण पंचायतीराज व्यवस्था सुदृढ़ और सक्रिय न हो सकी। परिणामतः पुनर्जीवित की गयी उस व्यवस्था जो अपेक्षित परिणाम मिलने चाहिए थे, वे प्राप्त नही हो सके। इस विफलता के लिए उत्तरदायी अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण यह भी था कि उस पुनर्जीवित पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की सहभागिता 4 षताब्दियों तक नगण्य सी रहती रही। उस स्थिति को सुधारने के लिए भारतीय संविधान में सन 1992 में एक संशोधन अधिनियम 73वाँ एवं 74वा पारित किया गया ताकि पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी कम से कम एक तिहाई अवश्य हो सके। संविधान के संशोधन से यह स्थिति तो बनी की सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायतों में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिल गया।  लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की दिशा में 73वाँ संशोधन अधिनिय मील का पत्थर साबित हुआ है। विकेन्द्रीकरण की इस प्रक्रिया से समाज के सभी वर्गों को नेतृत्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। प्रस्तुत अध्ययन अमरोहा जनपद में ग्राम पंचायत स्तर पर निर्वाचित होकर महिला वर्ग के नेतृत्व के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित है। जैसाकि भारत में पंचपरमेश्वर तथा महिला स्वतंत्रता की परम्परा प्राचीन काल से ही थी। पंचपरमेश्वर के रूप में ईमानदार व निष्ठावान सदस्य निष्पक्ष होकर सच्चा व सस्ता न्याय प्रदान करते थें तथा महिलाएंँ स्वतंत्रता पूर्वक अपने को साक्षर, शिक्षित और सशक्त बनाकर सामाजिक व्यवस्था को संतुलित एवं सर्वहितकारी बनाने में निर्विघ्न नही रह पाया। दुर्भाग्यवश सैकड़ो वर्षों की पराधीनता के काल में विदेशी शासक अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु पंचायतीराज व्यवस्था तथा महिला स्वतंत्रता को जानबूझकर समाप्त करने की चेष्टा करते रहे। महिलाओं को घरों की दिवारों के अन्दर बन्द रखने के लिए सतत प्रयास होते रहे, ताकि वे निरक्षर अविकसित और शक्तिहीन बन जायें। ऐसी विकृत व्यवस्था स्थापित करने में एक सीमा में वे सफल भी हुए। सौभाग्य से सन 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो पंचायतीराज व्यवस्था को पुनर्जीवित और सक्रिय करने का प्रयास किया गया, फिर भी पुरूषों में सैकड़ों वर्षों की दासता वाली मानसिकता तथा महिलाओं में व्याप्त निरक्षरता एवं अबलापन की स्थिति के कारण पंचायतीराज व्यवस्था सुदृढ़ और सक्रिय न हो सकी। परिणामतः पुनर्जीवित की गयी उस व्यवस्था जो अपेक्षित परिणाम मिलने चाहिए थे, वे प्राप्त नही हो सके। इस विफलता के लिए उत्तरदायी अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण यह भी था कि उस पुनर्जीवित पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की सहभागिता 4 षताब्दियों तक नगण्य सी रहती रही। उस स्थिति को सुधारने के लिए भारतीय संविधान में सन 1992 में एक संशोधन अधिनियम 73वाँ एवं 74वा पारित किया गया ताकि पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी कम से कम एक तिहाई अवश्य हो सके। संविधान के संशोधन से यह स्थिति तो बनी की सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायतों में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिल गया।     आज के समय में महिलाओं की सामाजिक स्थिति को परिवर्तित करने के लिए तथा शोषण, अन्याय और असमानता की व्यवस्था का अन्त करने लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से ही अनेक महत्वपूर्ण प्रयत्न किये गये। ब्रिटिश काल में पुलिस, कानून और न्याय की नवीन व्यवस्था स्वीकार करके महिलाओं पर आधारित अन्याय और सामाजिक असमानता पर आघात किया गया ब्रिटिश काल से ही अनेक सामाजिक और धर्म सुधार आन्दोलन, नवीन शिक्षा प्रणाली, पाश्चात्य शिक्षा के मूल्य, आदर्श और संस्थायें तथा नवीन सामाजिक विधानों ने भारतयि समाज में व्याप्त असमानता और शोषण के प्रति समाज के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान आकर्शित किया। स्वतंत्रता आन्दोलन की अवधि में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में महिला उत्थान के लिए अनेकों कार्य किए गये। वर्तमान पंचायतीराज व्यवस्था सामसजिक समता, न्याय, व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं महिला कल्याण पर आधारित ग्रामीण जीवन को एक नया रूप देने का सामुहिक प्रयास है।      वैदिक काल में ये पंचायतें महंत्वपूर्ण मानी जातीं थी। महाभारत काल के समय में पंचायतें अत्यन्त ताकतवर प्रशासनिक इकाईयांँ थी। यहाँ तक कि राजा महराजा भी इन इकाईयों के कार्यों में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नही करते थें। श्री के. एम. पन्नीकर पंचायतों को प्राचीन भारत की बुनियाद मानते हैं। युद्ध के बारे में निर्णय लेने के साथ पंचायतें ग्रामों की सुरक्षा, कर लगानें, स्थानीय झगडों का निपटारा, योजनाओं का कार्यान्वयन और साधारण अधिकार की योजना की भी अधिकारिणी शक्ति रखती थीं।      भारतीय संविधान के अनुच्छेद-40 में पंचायतों के लिए प्रमुख प्रावधान रखे गये। इसमें कहा गया है कि ‘राज्य पंचायतों का गठन कर सकता है और उन्हे वह अधिकार व शक्ति दे सकता है, जो उन्हे स्थानीय स्वायत्त सरकार की तरह कार्य करने की शक्ति प्रदान कर सके। देश की पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं को समाज और जीवन के हर क्षेत्र में समानता के अवसर प्राप्त करने के योग्य बनाती है। वे ही पंचायतों से उसकी संबद्धता पर असर डालती है। महिलाओं की बराबरी के दर्जे की पहली बार भारतीय संविधान में मान्यता मिली। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी भारतीयों के लिए कानूनी, सामाजिक, आर्थिक, विचार रखनें की स्वतंत्रता, विश्वास और पूजा पाठ, समान     अधिकार और अवसर, आपसी भाई-चारा को बढावा देनें, सभी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर देश की एकता बनाये रखने जैसे सुझाव शामिल किये गये।        भारतीय महिलाओं को भी पुरूषों की तरह बराबरी के अधिकार प्रदान किये गये हैं। भारतीय संविधान के अनेक अनुच्छेदों में महिलाओं को अधिकार दिये गये विभिन्न अनुच्छेदों में महिलायें कनून की नजर में समान है और उनके साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव को निशेध माना गया है। राज्य के किसी भी कार्यालय में महिला सशक्तीकरण अथवा नियुक्ति संबन्धी मामलों में महिलाओं को समान अवसर उपलब्ध है। मूल अधिकार तथा राज्य के निति निर्देशक तत्वों में भी महिलाओं को अनेक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किये गये हैं।     भारतीय नारी सृष्टि के प्रारम्भ से ही अनन्त गुणों यथा दया, प्रेम, करूणा, ममता, इत्यादि का सागर रही है। किसी राष्ट्र की परम्परा एवं संस्कृति उस राष्ट्र की महिलाओं से ही परिलक्षित होती है। महिलायें समाज की रचनात्मक शक्ति होती हैं उनकी इस रचनात्मक शक्ति का उपयोग करने के लिए हमे आज की महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना होगा। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम की तरह ही शहरी स्थानीय निकाय, नगर निगम और घोषित क्षेत्र प्राधिकरण के लिए नियम बनाये गये। संविधानिक संशोधन अधिनियम में प्रांतीय एवं केद्रीय विधायिका में आरक्षण की अनिवार्य है। 81वें संविधान संशोधन अधिनियम में महिलाओं के लिए संसद तथा विधानसभाओं में भी एक तिहाई आरक्षण का लक्ष्य रखा गया है।      73वाँ सविधान संशोधन के पश्चात उत्तर प्रदेश राज्य के अन्तर्गत सम्पन्न 10वें एवं 11वें पंचायत चुनाव में महिलाओं की सराहनीय भूमिका को को नीचे सारणी मे देखा जा सकता है-10वाँ सामान्य निर्वाचनः-      वर्ष 2010 में ग्राम पंचायतों के प्रधानों, ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिल पंचायत के सदस्यों के लिए सामान्य निर्वाचन सम्पन्न कराये गये। कलान्तर में 3 नये जनपदों के सृजन के फलस्वरूप 3 नये जिला पंचायतों का गठन किया गया। सम्पन्न निर्वाचन में पंचायत प्रतिनिधियों की संख्या इस प्रकार थी- क्र0 स0 पंचायती राज संस्था पंचायतों की संख्या अध्यक्ष पदों की संख्या सदस्यों की संख्या1. ग्राम पंचायत 51,914 51,914 6,51,1632. क्षेत्र पंचायत 821 821 64,8803. जिला पंचायत 75 75 2,624 कुल योग तीन 52,810 52,810 7,18,66711वाँ सामान्य निर्वाचनः-      उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों के सामान्य निर्वाचन ( जनपद गौतम बुद्ध नगर को छोड़कर ) अक्टूबर 2015 से फरवरी 2016 में निम्न इस प्रकार सम्पन्न हुए -क्र0 स0 पंचायती राज संस्था पंचायतों की संख्या अध्यक्ष पदों की संख्या सदस्यों की संख्या1. ग्राम पंचायत 59,162 59,162 7,45,4752. क्षेत्र पंचायत 821 816 77,9653. जिला पंचायत 75 74 3,128 कुल योग तीन 60,059 60,052 8,26,568
निष्कर्शतः ‘‘पंचायतीराज में महिला का नेतृत्व एवं राजनीतिक भूमिका’’ शीर्षक के अन्तर्गत यह कहना उचित होगा कि पंचायतीराज भारत के लिए कोई नई बात नही है, भारत में प्राचीन समय से ही महिलाओं ने पंचायत   गतिविधियों में अत्यंत महत्वपूर्ण अदा करती रहीं है। उपर सारणी से यह स्पष्ट हो रहा है कि आज महिलायें एक तिहाई आरक्षित स्थानों से अधिक अपना प्रतिनिधित्व पंचायत के विभिन्न स्तरों पर कर रहीं है। लेकिन महिला का नेतृत्व एवं राजनीतिक भूमिका से हमारा तात्पर्य महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को समाहित करते हुए सामाजिक सेवाओं में समान अवसर प्रदान करना, राजनीतिक और आर्थिक नीति निर्धारण में भागीदारी, समान कार्य के लिए समान वेतन, कानून के तहत सुरक्षा प्रदान करने इत्यादि से हैं। पंचायतीराज व्यवस्था में महिला का नेतृत्व एवं राजनीतिक भागीदारी के साथ ही साथ ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में भी सुधार देखा गया है।
सन्दर्भ सूची1- आॅस्कर लेबिस, ग्रुप डायनामिक्स इन नार्थ इण्डिया विलेजस, ए स्टडी आॅफ फ्रेक्शन, प्लानिंग कमीशन, नई दिल्ली, 19582- सिंह, अवतार, लीडरशिप पैटर्न एण्ड विपेज स्ट्रक्चर, स्टंिलंग पब्लिशर्स, नई दिल्ली, 19633- भार्गव, बी. एस., पंचायतराज सिस्टम एण्ड पोलिटिकल पार्टीज पब्लिकेशन नई दिल्ली, 19794- चैधरी, डी. एस. इमर्जिंग रूरल लिडरशिप इन इण्डियन स्टेटस, मथन पब्लिकेशन, नई दिल्ली, 19815- शर्मा हरिश्चन्द्र, भारत में स्थानीय प्रशास, कालेज बुक डिपो, जयपुर, 19686- प्रसाद ईश्वरी, भारत का इतिहास भाग-1 इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद, 19657- त्रिपाठी, आर. पी., राइज एण्ड फाॅल आॅफ मुगल एम्पायर, सेन्ट्रल बुक डिपो, इलाहाबाद, 19568- ’पंचायती राज विभाग, उत्तर प्रदेश, 2018

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