ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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बुन्देलखण्ड के दुर्गो का सामाजिक एवं सामरिक प्रभाव

डा0 रविन्द्र कुमार यादव
डा0 रमेश त्रिपाठी
राजनीति विज्ञान विभाग
बरेली काॅलेज बरेली

बुन्देलखण्ड का सीमांकन इतिहासकारों और भूगोल वेत्तओं ने अपने ढंग से किया है। परन्तु सर्वमान तथ्य ये है कि उत्तर में यमुना नदी, दक्षिण में नर्मदा नदी, पूर्व में टोंस नदी, और पश्चिम में चम्बल नदी इसकी सीमायें निर्धारित करती है। दीवान प्रतिपाल सिंह के अनुसार इसी अंग में पूर्वोत्तर पाश्र्व में गंगा से दक्षिण इलाहबाद तथा मिर्जापुर जिलों के भाग और चम्बल से पूर्व ग्वालियर, भोपाल आादि के भाग तथा सागर, दमोह, जबलपुर जिले आते हैं। बुन्देलों का राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत अधिक विस्तृति नहीं था इसलिए इसका विभाजन प्रान्तों के रूप में नहीं हो सकता था। यह राज्य तीन रियासतों में विभक्त था ये रियासतें, ओरछा, दतिया और पन्ना, राज्य में विभाजित थी। ये तीनों शासक स्वतन्त्र और एक दूसरें के नियन्त्रण में नहीं थे बुन्देलखण्ड में ओरछा राज्य सबसे प्राचीन था।बुन्देलखण्ड का सीमांकन इतिहासकारों और भूगोल वेत्तओं ने अपने ढंग से किया है। परन्तु सर्वमान तथ्य ये है कि उत्तर में यमुना नदी, दक्षिण में नर्मदा नदी, पूर्व में टोंस नदी, और पश्चिम में चम्बल नदी इसकी सीमायें निर्धारित करती है। दीवान प्रतिपाल सिंह के अनुसार इसी अंग में पूर्वोत्तर पाश्र्व में गंगा से दक्षिण इलाहबाद तथा मिर्जापुर जिलों के भाग और चम्बल से पूर्व ग्वालियर, भोपाल आादि के भाग तथा सागर, दमोह, जबलपुर जिले आते हैं। बुन्देलों का राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत अधिक विस्तृति नहीं था इसलिए इसका विभाजन प्रान्तों के रूप में नहीं हो सकता था। यह राज्य तीन रियासतों में विभक्त था ये रियासतें, ओरछा, दतिया और पन्ना, राज्य में विभाजित थी। ये तीनों शासक स्वतन्त्र और एक दूसरें के नियन्त्रण में नहीं थे बुन्देलखण्ड में ओरछा राज्य सबसे प्राचीन था। गौड़ राज्य की शासन व्यवस्था के सन्दर्भ में कोई विशेष विवरण उपलब्ध नहीं है केवल इतना ही ज्ञात होता है कि सम्राट अकबर के जमाने तक इनके पास 52 गढ़ थे। निश्चित ही यह सम्राज्य प्रशासनिक दृष्टि से प्रान्तों अथवा मण्डलों में विभक्त रहा होगा जिनकी प्रशासनिक व्यवस्था मण्डलाध्यक्ष और उसके अधाीन कर्मचारी देखा करते थे। इस राज्य के प्रान्तीय कर्मचारी अनुशासित थे जो राजा के नियंत्रण में रहते थे तथा प्रजा सुखाी थी तथा प्रजा की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। बुन्देलखण्ड में प्रान्तीय शासन व्यवस्था प्रशासन की अन्तिम इकाई नहीं थी। बल्कि सम्पूर्ण प्रान्त अनेक जनपदांे में विभाजित होता था। जिन्हें विभिन्न युगों में विभिन्न नाम से पुकारा जाता था। ये जनपद, परगानों, तहसीलों अथवा ग्राम मण्डलों में विभाजित होते थे। बुन्देलखण्ड में अनर्यों का निवास आर्यों से भी प्राचीन है। आर्य लोग इन्हें जात, धान, पाराक्ष के नाम से पुकारते थे। तथा इनका निवास स्थल जंगलों में था। मुख्य रूप से ये लोग कन्दराओं में निवास करते थे। प्रदेशों का विभाजन पौर जनपद में किया जाता था। इस पौर जनपद का सदस्य राजा की सभा का सदस्य होता था। जिसे राज्य में व्यापक अधिकार प्राप्त होते थे। तथा वह अपने पौर जनपद का स्वामी भी होता था। रामायण और महाभारत काल में पंचाल, कुरू, मत्स्य, अंग, वंश, मगध और पुण्ड जनपदों के नाम उपलब्ध होते है। वैदिक काल में नगरों की संख्या बहुत कम थी किन्तु धीरे-धीरे इन नगरों का विकास हुआ और अनेक नगर की संख्या बहुत कम थी किन्तु धीरे-धीरे इन नगरों का विकास हुआ और अनेक नगर बसे महाभारत में नगरों की विशेषता इस प्रकार मिलती है पुर, दुर्ग सम्पन्न हो धान्य और वस्त्रों से पूरित, दृढ़ दीवास और परिखा से घिरा हुआ तथा हाथी, घोड़े व समूह से युक्त हो इत्यादि।हम यदि और पीछे जायें जो देखते हैं कि प्रचीन भारत में ग्राम सबसे छोटी ईकाई थी। राज्यों का आकार छोटा होने के कारण इनका महत्व बहुत बढ गया था। वैदिक काल में ग्राम अधिकारी को ग्रामणी कहते थे। यदि केन्द्रीय शासन में परिवर्तन होता था तो भी ग्राम प्रशासन में परिवर्तन नहीं होता था ग्रामवासी अपना प्रशासन स्वयं देखते थे। कलान्तर में ग्राम अधिकारी को मालवा क्षेत्र में पट्टकील और उत्तरी भारत में ग्रामपति या ग्रामिक कहते थे। ग्राम के मुखिया के नीचे पंच अधिकारी होते थे इन्हें समा-हर्ता, सन्नी, धाता, गणक, लेखक और साथी कहते थे।प्रत्येक गंाव में शासन चलाने के लिए एक सभा का महासभा होती थी तथा अनेक समितियाँ होती थी। उनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय तालाब समिति बाढ़ों की देखरेख करने वाली समिति, न्याय की देखरेख करने वाली समिति, मन्दिर समिति, सामान प्रबन्ध समिति थी। मौर्यकाल में प्रशासन की प्राथमिक क्षेत्रीय इेकाई जनपद थी यह जनपद से जन (व्यक्ति) और भूमि अर्थात निवासी और प्रदेश दोनों का बोध होता है वस्तुतः प्राचीन भारतीय नीतिशास्त्रों में जनपद देश, विषय और राष्ट्र के पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक प्रान्त कई मण्डलों में विभक्त था तथा मण्डल अधिकारी को प्रदेष्टा के नाम से पुकारा जाता था। अशोक के अभिलेख में इसे प्रदेशिक नाम से सम्बोधित किया गया है। नगरों की शासन व्यवस्था नगरपालिकाओं के द्वारा चलाई जाती थी। प्रत्येक नगरपलिका में एक सभा होती थी। जिसका प्रमुख नगरक अथवा पुरमुख कहलाता था सभा के अन्तर्गत कई समितियों होती थी। जिनमें पाँच-पाँच सदस्य होते थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अभाव में इस राज्य की शासन व्यवस्था के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि गौड़ राज्य कई प्रान्तों में विभाजित था अनेक प्रान्तों में गुर्जर प्रतिहार वंशीय क्षेत्रीय इनके सूबेदार थे। बहरहाल बुन्देलखण्ड के दुर्ग और राज्य प्रशासन का महत्व सिर्फ इस  दृष्टिकोण से ही नहीं था कि यह उचित राजनीतिक प्रबन्ध के स्त्रोत थे बल्कि यह दुर्ग सामाजिक प्रबन्ध के भी सर्वोत्तम उदाहरण थे। तत्कालीन दुर्गो की सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार संतुलित थी कि इससे दुर्ग के भीतर ही सभी प्रकार की सामाजिक गतिविधियों को संचालित किया जा सकता है यह दुर्ग अपने व्यवस्था हेतु विभिन्न जातियों कामगारों की शरण स्थली थी। जहाँ सभी रीति रिवाज एवं अनुष्ठा और सामाजिक क्रिया कलाप आसानी से सम्पन्न हो सकते थे। बुन्देलखण्ड में आय के मुख्य स्त्रोत, खनिज सम्पदा छिपी बहुतायत है। इनमें मुख्य रूप से इमारती पत्थर, गे्रनाइट पत्थर और चुने के पत्थर होते हैं। इन पत्थरों से नाना प्रकार का सामान निर्मित होता है जो बुन्देलखण्ड के अतिरिक्तबाहर भी भेजा जाता है। पत्थरों के अतिरिक्त यहाँ लोहो, ताँबा, तथा अन्य धातुएँ भी उपलब्ध होती है। धातुओं के अतिरिक्त यहाँ कीमती पत्थर और रत्न भी उपलब्ध होत है। यहाँ पर वन सम्पदा से भी शासन को बहुत अधिक लाभ होता था यहाँ क पहाड़ों में नाना प्रकार के वृक्ष     उपलब्ध होते हैं। जिससे, लकड़ी, छालपत्ती, और फलों से नाना प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं। इन्ही वनों में नाना प्रकार की औषधियों के वृक्ष भी हैं जिनसे दवाइयाँ बनती है महुआ, और ता़ड के वृक्षों से मदिरा का निर्माण होता है। खैर से कत्था बनाता है इसके अलावा लाल चन्दन और आचार के पेड़ों से चिरौंजी आदि उपज उपलब्ध होती हैं। यहाँ के समाज का एक बड़ा भाग प्राकृतिक रूप से उपलब्ध खनिज सम्पदा एवं प्राकृतिक वस्तुओं के उत्पादन से अपने जीवन यापन को सरल एवं शक्तिशाली स्थिति में विद्यमान थे। वनों में उपलब्ध जंगली जानवर शेर, तेंदुआ, चीता, भालू जंगली खरगोश, सुअर, हिरण, नीलगाय, आदि से भी शासन को अच्छी आय हो जाती है। बुन्देलखण्ड में कृषि उपज भी शासन की आय का मुख्य स्त्रोत था। यहाँ पर रबी, खरीफ और जायद तीन प्रकार की फसेलें होती थी। इनमें कोदो, राली, कुटकी, बसारा, समा, काकुन, मटा, ज्वार, बाजरा, उरद, मूंग लोसार और धान उत्पन्न होते थे। गेहूँ मटरा, चना, जौ, के अतिरिक्त तिली, सरसों, अलसी, अण्डी, यहाँ उपलब्ध होती थी इसके अलावा, ईख, कपास, सिंघाड़ा, सन आादि नाना प्रकार के फल और सब्जी से प्राप्त यह कर बुन्देलखण्ड की प्रशासनिक व्यवस्था एवं दुर्गों के आय के प्रमुख स्त्रोत थे और कर द्वारा प्राप्त यह आय दुर्ग के माध्यम से ही जनता के कल्याण एवं कृषि उत्पादन एवं सामाजिक व्यवस्थापन हेतु लोक कल्याण के मद में खर्च भी किया जाता था जिससे राज्य में खुशहाली प्राप्त की जा सके। प्रशासनिक दृष्टि से बुन्देलखण्ड के दुर्ग महत्वपूर्ण स्थान रखते है सेरपुर सेवढा का दुर्ग सर्वाधिक प्राचीन प्रतीत होता है। अतिप्रचीन युग में जब यह क्षेत्र शुक्तमती नगरी के नाम से प्रसिद्व था उस समय यदुवंश के संस्थापक राजा उरिचरि बसु का यहाँ राज्य था। महाभारत महाकाव्य में इस वंश का सविस्तार वर्णन मिलात है। इसी प्रकार दूसरा महत्वपूर्ण दुर्ग कालिजर दुर्ग है जिसका वर्णन भी रामायण, महाभारत, और विविध पुराणों में मिलता है। पहले यह दुर्ग कौशल राज्य के अधीन था बाद में यह दुर्ग चेदि राज्य शासकों के आधीन हो गया उसके बाद यह दुर्ग कल्चुरियों, चन्देलों, मुगलों और मुन्देलों के नियन्त्रण में रहा। चन्देलों के युग में दुर्ग चन्देलों की सैन्य राजधाानी रहा इसी प्रकार महोबा दुर्ग चन्देल काल में चन्देलों की प्रशासनिक राजधानी के रूप में विख्यात रहा । बुन्देलखण्ड के दुर्गों में शासन करने वाले नरेश अनेक धर्मों के अनुयायी थे प्रमुख रूप से जो धर्म स्थल दुर्गों में उपलब्ध हुए हें उनमें सर्वाधिक शक्ति शैव, विष्णु, सूर्य, हनुमान तथा तान्त्रिक धर्म स्थल उपलब्ध हुए हैं। हिन्दु धर्म में जब से बहुदेव वाद का विकास हुआ उस समय से यहाँ के लोग और नरेश विभिन्न देवी देवताओं की पूजा अनेक स्थलों में जैन एवं ंबौद्व धर्म से सम्बन्धिम धर्म स्थल भी उपलब्ध हुए हैं। तथा इन धर्म स्थलों में अनेक अभिलेख भी उपलब्ध हुए हैं जिनमें धर्म स्थल बनवाने वालों की चर्चा है। धर्म स्थल तथा अनेक देव प्रतिमायें इस बात की प्रतीक हैं कि दुर्ग के नरेश और सामन्त किसी न किसी धर्म से जुडे़ हुए थे। कालान्तर में यहाँ इस्लाम धर्म के अनुयायियों का भी प्रभाव पड़ा और उन्होंने कुछ दुर्ग हिन्दुओं से जीतकर अपने अधिकार में कर लिऐ थे। अलमगीर दरवाजा है इस द्वारा का निर्माण मुगल बादशाह औरंगजेब ने कराया था तथ इस दरवाजे से यह ज्ञात होता है कि कालिंजर दुर्ग इस्लाम धर्म के प्रभाव में था कालिंजर दुर्ग के दूसरे द्वारा का नाम गणेश दरवाजा है। जो गणेश के नाम से विख्याता है। इस द्वारा के सन्निकट एक गणेश प्रतिमा भी थी। गणेश शिव के पुत्र थे जिनकी उपासना बड़ी श्रद्वा से यहाँ के लोक करते थे। कालिंजर दुर्ग के तीसरे द्वारा का नाम चण्डी दरवाजा है। जिसमें यह बोध होता है  कि यहाँ के लोग शक्ति उपासना किया करते थे। इस द्वार के नीचे चण्डिका की मुर्ति थी। कालिंजर दुर्ग के पांचवे द्वार का नाम हनुमान दरवाजा है इस द्वारा के नीचे हनुमान प्रतिमा थी जिसका आशय यह है कि यहाँ के लोग हनुमान के परम उपासक थे। दुर्ग में प्रवेश करने के पश्चात अनेक धर्म स्थल यहाँ उपलब्ध होते है। बुन्देलखण्ड के यह अध्यात्मिक प्रेरक देवी-देवता एवं मान्यतायें यह सिद्व करती है कि वहाॅ का समाज आस्थावान था एवं सामाजिक व्यवस्थापन में उसका विश्वास था। इस प्रकार के देव स्थल यह भी सिद्व करते हैं कि वहाँ का समाज किसी भी आपदा एवं आक्रमण के समय अपने इष्ट के माध्यम से उसका साहस के साथ सामना करने को तत्पर थे। तत्कालिन समय अन्य राज्यों द्वारा युद्व नीति तथा राज्य विस्तार का था। इस दृष्टिकोण से भी बुन्देलखण्ड के दुर्ग अति सुरक्षित एवं सबल दिखायी पड़ते है। इन दुर्गों की संरचना में स्थापत्य के साथ ही साथ सुरक्षा के उपायों का भी भरपूर ध्यान रखा गया है।? बुन्देलखण्ड के अनेक दुर्गो में उन स्थलों का भी निर्माण कराया गया। जिनका महत्व सामरिक दुष्टि से था। पूर्व मध्यकाल और मध्यकाल में युद्व पद्वति में परिवर्तन हुआ था और अस्त्र शस्त्र, सैन्य उपकरणों में व्यापक परिवर्तन हुआ था इसलिए सर्वप्रथम दुर्ग उन स्थलों में बनवाये जाते थे जहां शत्रु के लिए प्राकृतिक बाधायें उपलब्ध हो। यदि प्राकृतिक बाधायें नहीं होती थी। तो कृत्रिम बाधाओं का निर्माण किया जाता था दुर्ग के प्रवेश द्वार निर्मित करने के लिए यह ध्यान रखा जाता था कि शत्रु  उनसे असानी से प्रवेश न कर सके। दुर्ग की दीवारों से सटे हुए बुर्जों का निर्माण इस तरह कराया जाता था ताकि वहाँ शत्रु सेना पर आक्रमण किया जा सके और आगे बढ़ने से रोका जा सके। परिकोटे की दीवार में कंगूरे बनाये जाते थे और उसके नीचे शस्त्र चलाने के लिए मारक छिद्र होते थे। प्रत्येक दुर्ग में गुप्त मार्ग हुआ करते थे इनकी लम्बाई 10 या 15 मील तक हुआ करती थी। इस गुप्त मार्ग का सम्बन्ध किले की गढ़ी, मन्दिर, कुआँ, जलाशय और कन्दराओं से हुआ करता था। कालिंजर, महोबा, अजयगढ़, देवगढ, तथा अन्य दुर्गों में इस प्रकार के गुप्त मार्ग हैं। इनका निर्माण युद्व कला को ध्यान में रखकर किया गया था। बुन्देलखण्ड की यह दुर्ग संरचना वहाँ के भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनायी गयी थी और साथ ही उसका सामाजिक प्रभाव भी था जो प्रजा के अन्दर सुरक्षा को जन्म देने वाला था। वर्तमान में भी यदि हम बुन्देलखण्ड का अवलोकन करें तो देखते हैं कि बुन्देलखण्ड में ऐसे अनेक ऐतिहासिक स्थल और दुर्ग है जिनका पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है ये स्थल उत्तर प्रदेश और यहाँ पहुँचने के लिए मार्गों का निर्माण किया जाये तो ये स्थल सरकारों को अच्छी आय प्रदान कर सकते है। यहाँ पर्यटकों की सुरक्षा व्यवस्था भोजन व्यवस्था और आवासीय व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। क्योंकि अधिकांश स्थल असुरक्षित है और जंगलों में है। ऐसा करना यहां की जनता के सामाजिक उन्नययन का प्रयास होगा तथा साथ ही पर्यटन एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यन्त उपयोगी सिद्व होगा।सन्दर्भ गंथ सूची:-1. पं गोरेलाल तिवारी, बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास, 19932. डा0 ईश्वरी प्रसाद, भारतीय इतिहास3. कृष्ण चन्द्र श्रीवास्तव, प्राचीन भारत का इतिहास, 19914. बाल्मिकी रामायण अरण्यकाण्ड चतुर्थ सर्ग5. जान मथाई- विलेज गर्वनमेंन्ट इन ब्रिटिश इण्डिया6. महाभारत भीष्मपर्व 5-11877. डा0 सुशील कुमार सुल्लेरे, अजयगढ़ और कालिंजर की देव प्रतिमाएँ8. बोस, इन.एस. हिस्ट्री आॅफ दी चन्देल राज्य9. कृष्ण कवि, बुन्देलखण्ड के कवि विक्रमी सवंत 202510. कृष्ण कवि, बुन्देलखण्ड का शोधपूर्ण इतिहास11. कनिघंम आर्कृलाजिकल सर्वंे रिपोर्ट, भाग 21

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