ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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मण्डल आयोग तथा केन्द्रीय सरकारी सेवाओं में संरक्षण- मिथक एवं यथार्थ

डाॅ0 आनन्द कुमार,
प्राचार्य-बी0डी0एस0 महाविद्यालय
रिसिया, बहराइच

विषमतावादी भारतीय समाज में सदियों से ऊँच-नीच का आचरण मनुष्यों के बीच जन्म के आधार पर रहा है। यहाँ की जातिवादी व्यवस्था में जन्म के आधार पर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति का निरुपण किया जाता रहा है। वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था के कारण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक स्तरीकरण का प्रभुत्व रहा है।भारतीय संस्कृति के आधारभूत ग्रन्थों, वेदों, उपनिषदों, पुराणों एवं स्मृतियों में इस सामाजिक विषमता का समर्थन ही किया गया है। हजारो वर्षो के सामाजिक इतिहास इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य मनुष्य समान नही हो सकता। भारतीय संस्कृति के आधारभूत ग्रन्थों के आदर्श वाक्य व्यवहार की भूमि पर समानता को प्रतिष्ठित नही करते, इसलिए उच्चजातीय वर्ग एवं निम्न जातीय वर्ग समूहो की खाई पाटने का प्रयास सार्थक सिद्ध नही हुआ। 1947 में आजादी के बाद संविधान जनवरी 1950 में लागू हुआ।विषमतावादी भारतीय समाज में सदियों से ऊँच-नीच का आचरण मनुष्यों के बीच जन्म के आधार पर रहा है। यहाँ की जातिवादी व्यवस्था में जन्म के आधार पर व्यक्ति के सामाजिक स्थिति का निरुपण किया जाता रहा है। वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था के कारण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक स्तरीकरण का प्रभुत्व रहा है।भारतीय संस्कृति के आधारभूत ग्रन्थों, वेदों, उपनिषदों, पुराणों एवं स्मृतियों में इस सामाजिक विषमता का समर्थन ही किया गया है। हजारो वर्षो के सामाजिक इतिहास इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य मनुष्य समान नही हो सकता। भारतीय संस्कृति के आधारभूत ग्रन्थों के आदर्श वाक्य व्यवहार की भूमि पर समानता को प्रतिष्ठित नही करते, इसलिए उच्चजातीय वर्ग एवं निम्न जातीय वर्ग समूहो की खाई पाटने का प्रयास सार्थक सिद्ध नही हुआ। 1947 में आजादी के बाद संविधान जनवरी 1950 में लागू हुआ।
भारतीय संविधान के भाग ग्टप् में समाज के विषेश वर्गो के लिए विषेश प्रावधानों का उल्लेख हैं अनुसूचित जातियों,  अनुसूचित जनजाजियों, तथा एंग्लो-इण्डियनों के लिए लोक सभा, विधान सभाओं, शिक्षा अनुदानों में प्रतिनिधित्व के लिए विशेष संरक्षण है। इसके अतिरिक्त धारा 340 में यह भी प्रावधान है कि समस्त देश में सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गो (जिन्हे प्रायः अन्य पिछड़े वर्ग अथवा व्ण्ठण्ब् भी कहा जाता है।) की अवस्था के निर्धारण तथा पहचान करने के लिए, एक आयोग की नियुक्ति की जाए।भारत के राष्ट्रपति ने काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की जिसके विचारार्थ ये थेः-       (क) उन मापदण्डों का निर्धारण करना जिनके अनुसार किसी विशेष वर्ग  को पिछड़ा वर्ग कहा जा सके।       (ख) समस्त भारत के पिछड़े वर्गों की सूची प्रस्तुत करना।       (ग) पिछड़ें वर्गों की कठिनाइयों की जांच करना और उन कठिनाइयों को दूर करने के लिए तथा उस वर्ग की स्थिति को सुधारने के कलए सुझाव देना।       1955 में कालेलकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को विचार के लिए प्रस्तुत की। सरकार ने आयोग के सुझावों को व्यवहारिक रूप से अत्यन्त स्पष्ट ;अंहनमद्ध तथा विस्तृत बतलाया। अतएव उस पर कोई कार्यवाही नही की गई।        एक अन्य आयोग जिसे प्रायः मण्डल आयोग कहा जाता है, की नियुक्ति पिछड़े वर्गों की षिकायतों की जांच करने के लिए की गई। इस आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मण्डल थे।       अगस्त 1980 में मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की। उसमें सुझाव था कि पिछड़े वर्गों की जातियों को संरक्षण दिए जाए और 450 पिछड़ी जातियों की पहचान की गई जो कि देश की कुल जनसंख्या का 52 प्रतिशत थीं। आयोग ने यह सुझाव दिया कि अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को दिए गए 22.5 प्रतिशत संरक्षण के अतिरिक्त इस पिछड़े वर्ग के लिए अतिरिक्त 27 प्रतिषत संरक्षण दिया जाए।लगभग 10 वर्शो तक मण्डल आयोग की रिपोर्ट की तथा सुझावों की पूर्णतया अनदेखी की जाती रही, परन्तु अगस्त 1990 में राष्ट्रीय मोर्चे के प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के विरूद्ध कुछ असन्तोष उभरने लगा तो एक दिन अचानक उन्होंने यह घोषणा कर दी कि उनकी सरकार ने मण्डल आयोग के सुझाव स्वीकार कर लिए हैं और उन्हें सरकार के लिए अनिवार्य ;उंदकंजवतलद्ध बना दिया है।उन्होंने यह घोषणा भी कर दी कि केन्द्रीय नियुक्तियों में तथा सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में 27 प्रतिशत नियुक्तियां इस सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए (जिन्हें प्रायः ‘अन्य पिछड़े वर्ग‘ ;व्ण्ठण्ब्ण्द्ध कहा जाता है।) सुरक्षित रखी जायेगी।       नरसिंह राव की सरकार ने ‘मण्डल आयोग‘ की सिफारिशों को उच्चतम न्यायालय में विचार के लिए भेज दिया।सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मण्डल आयोग‘ की सिफारिशों में कोई संवैधानिक असंगति नही पाई। परन्तु सर्वाेच्च न्यायालय ने यह सुझाव दिया कि इस ”अन्य पिछड़े वर्ग की ऊपरी परत ;बतमंउल संलमतद्ध को इस सुरक्षित यथांश ;ुनवजंद्ध  में से निकाल दिया जाना चाहिए, अर्थात् उन्हें इस संरक्षण का लाभ नही मिलना चाहिए।“       नरसिंह सरकार ने अन्ततः यह सुझाव मान लिया कि भारत सरकार के असैनिक पदों की नियुक्तियों में ऊपरी परत ;बतमंउल संलमतद्ध की सन्तति को छोड़कर ही अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिषत यथांश ;ुनवजंद्ध सुरक्षित रखा जाएगा। और सरकार ने एक प्रज्ञप्ति द्वारा इस ऊपरी परत ;बतमंउल संलमतद्ध की व्याख्या भी कर दी, जो इस प्रकार हैः-(क) वे व्यक्ति जो संवैधानिक पद प्राप्त कर लेते है।(ख) यदि माता/पिता में से एक भी प्रथम श्रेणी का राजपत्रित कर्मचारी बन गया हो।(ग) यदि माता तथा पिता दोंनो ही द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित कर्मचारी बन गए हों।(घ) यदि माता अथवा पिता में एक भी व्यक्ति थल सेना, नौ सेना अथवा वायु सेना अथवा परा सेना ;चंतं उपसपजंतलद्ध दलो में कर्नल अथवा उसके बराबर की पदवी प्राप्त कर चुका हो।(ङ) उन परिवारों की सन्तान जिनके पास राज्य सरकार द्वारा नियत भूमि की अधिकतम सीमा का 85 प्रतिशत भाग सिंचाई वाला हो।(च) अथवा जिन लोगो की सकल वार्षिक आय लगातार तीन वर्ष तक एक लाख रूपयें से अधिक रही हो। परन्तु इस में माता तथा पिता तथा भूमि की आय तीनों का नही जोड़ा जाएगा।  अथवा जो लोग तीन वर्ष तक आय-कर द्वारा निर्धारित धन-कर ;ूमंसजी जंगद्ध देते रहे हों।        संरक्षण के प्रथम दौर में, संरक्षण का लाभ केवल उन्ही जातियों तथा वर्गो को दिया गया है, जो ‘मण्डल आयोग‘ तथा राज्य सरकार दोनो की सूची में सम्मिलित हैं। 14 राज्यों अर्थात् असम, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गोआ, गुजरात, हरियाणा,, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल की पिछड़ेे वर्ग की सूची भारत सरकार के राजपत्र ;ळं्रमजजमद्ध में मुद्रित कर दी गई। 1994 में पाण्डीचेरी, दादरा नागर हवेली और दमन तथा दिऊ की सूची भी प्रकाशित कर दी गई है। संघीय क्षेत्रों में प्रशासन, पिछड़ें वर्गो की पहचान कर रहें हैं ताकि केन्द्रीय सरकार उन्हें भी संरक्षण का लाभ दंे सके।
पुनर्वेक्षण ;व्अमतअपमूद्ध मण्डल आयोग की रिपोर्ट को केन्द्रीय सरकार द्वारा स्वीकृत करना तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लिए संरक्षण देने का लोगो ने स्वागत भी किया है और उसकी निन्दा भी की है। इसको एक उस समतावादी ;महंसपजंतपंदद्ध समाज की गठन की और एक महत्तवपूर्ण चरण माना है, जो कि हमारे संविधान बनाने वालों का उद्देश्य था। प्रसिद्ध         विधि वेत्ता श्री एन.ए. पालखीवाला ने मण्डल आयोग की इसलिए निन्दा की है क्योंकि उस के अनुसार ”इस से जातीय अलगाव की प्रवृत्तियां जिन्हें डाॅ0 अम्बेडकर ने समाप्त करने का भरसक प्रयत्न किया, बढ़ेगी”। विश्वनाथ प्रताप सिंह के इस कथन पर “क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने मण्डल आयोग को स्वीकृति दे दी हैं, अ ब वह शान्ती से मर सकंेगे” टिप्पणी करते हुए पालखीवाला ने यह कहा, कि “ विश्वनाथ प्रताप सिंह तो सम्भवतः शान्ति से मर सकेंगे, परन्तु भारत आने वाली शताब्दियों तक शान्ति से जी नही सकेगा।”       अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की पहचान करना एक न समाप्त होने वाला कार्य है और इसे खुला रखा गया है। सरकार ने पिछड़े वर्ग के लिए एक स्थाई राष्ट्रीय आयोग ;छंजपवदंस ब्वउउपेेपवद वित ठंबाूंतक ब्संेेमेद्ध की स्थापना कर दी है। जिस का कार्य यह है कि वह इस वर्ग में सम्मिलित होने के लिए आवेदन मांगे और उनकी जांच करके सरकार के पास भेजे अथवा इस वर्ग में सम्मिलित वर्गों के विरूद्ध याचिकाओं का प्राप्त कर उन पर अपने विचार सरकार को भेजे। इस प्रावधान का पिछड़े वर्ग के कुछ लोगांे तथा उनके परामर्शदातओं द्वारा दुरूपयोग किया जा सकता है।       संरक्षण की परिपाटी शाश्वत बन जाती है जैसा कि अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के मामले में हुआ है। आरम्भ में यह संरक्षण केवल दस वर्ष के लिए दिए गए थे परन्तु आने वाली सरकारों ने चुनावों में वोटों को ध्यान में रखते इस संरक्षण को बार-बार दस-दस वर्ष के लिए बढ़ा दिया। सम्भवतः यही परिपाटी‘ अन्य पिछड़े वर्गों ;व्ण्ठण्ब्ण्द्ध ए  के लिए सुरक्षित यथांष ;ुनवजंद्ध  के मामले में भी होती जा रही है।       अन्ततः संरक्षण की राजनीति भारत की राजनीति में एक नासूर बन जाएगी। अब सवर्णों को मिला आरक्षण उस व्यतिरेक में एक कड़ी और जोड़ता है।       यह उल्लेखनीय है कि झारखण्ड, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों के चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। भारतीय जनता पार्टी की केन्द्रीय सरकार ने इसे नोटा और सवर्णो की नारागी से जोड़कर देखा और डैमेज कन्ट्रोल करने के लिए आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णाें को भी आनन-फानन में दस प्रतिशत आरक्षण सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रदान कर दिया। यह केवल दो या तीन दिन में ही कर दिया गया और सर्वोच्च न्यायालय में इसके विरूद्ध योजित याचिकाएं भी तत्काल रूप से कारगर नही हुई और न ही इन्दिरा साहनी मामले को ध्यान में  रखते हुए 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण हांेने पर प्रथम दृष्टया कोई आपत्ति माननीय न्यायालय ने दर्ज नही की। यह ध्यान देने की बात है कि जो सवर्ण समुदाय अयोग्यता का आधार लेकर आरक्षण की निन्दा करता था आज वही आरक्षण के आगोष में सोता नजर आ रहा है और आरक्षण को वरेण्य मान रहा हैं। झटपट में गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि कई राज्यों ने सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण सरकारी नौकरियों में देने के लिए विज्ञापन भी जारी कर दिया।        उपरोक्त वर्णन से यह बात स्पष्ट है कि पिछड़ी जातियों को 1953 के काका कालेलकर आयोग से लेकर मण्डल आयोग तक के लगभग 40 वर्षों तक संघर्श करना पड़ा फिर भी हमें केवल 27 प्रतिशत आरक्षण बहुत सारे किन्तु परन्तु के साथ मिला। हम आज अपने को इतना शक्तिशाली बना ले और इतनी ताकत से सरकार से मांग करें कि ‘जितनी जिसकी संख्या भारी उतनी हो उसकी भागीदारी‘ 60 प्रतिशत की संख्या वाले पिछड़े वर्ग को 60 प्रतिशत की भागीदारी होनी ही चाहिए जैसा कि डाॅ0 राम मनोहर लोहिया ने सैकड़े में ‘60‘ का आहृान किया था तभी सही मायनो में मण्डलवाद की दिशा आगे बढ़ेगी और पिछड़ा वर्ग समवेत होकर आगे बढ़ेगा।

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