ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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रोजगार परक उच्च शिक्षा एवं सामाजिक दायित्व

– डाॅ0 मीना यादव
एसोसिएट प्रो0- हिन्दी, बरेली कालेज, बरेली।

हमारा वर्तमान उच्च शिक्षा पद्धति न तो छात्रों के रोजगार के योग्य बनाने से समक्ष है और न ही उन्हें अच्छा नागरिक । नैतिक और सामाजिक सरोकारों से विद्यार्थियों का दूर पूरक रिश्ता नहीं रहा है। इस प्रकार हमारी शिक्षा पद्धति न तो हमारी संस्कृति की रक्षा कर पा रही है और न विद्यार्थियों को जीना मापन योग्य तैयार कर पा रही है। प्रस्तुत लेख एक ऐसे शिक्षा के एक ऐसे मॉडल की संकल्पना है। जो वेरोजगारी का सम्पूर्ण उनमूलन दर्शाता है और विद्यार्थियों को आर्दश नागरिक बनाती है।हमारा वर्तमान उच्च शिक्षा पद्धति न तो छात्रों के रोजगार के योग्य बनाने से समक्ष है और न ही उन्हें अच्छा नागरिक । नैतिक और सामाजिक सरोकारों से विद्यार्थियों का दूर पूरक रिश्ता नहीं रहा है। इस प्रकार हमारी शिक्षा पद्धति न तो हमारी संस्कृति की रक्षा कर पा रही है और न विद्यार्थियों को जीना मापन योग्य तैयार कर पा रही है। प्रस्तुत लेख एक ऐसे शिक्षा के एक ऐसे मॉडल की संकल्पना है। जो वेरोजगारी का सम्पूर्ण उनमूलन दर्शाता है और विद्यार्थियों को आर्दश नागरिक बनाती है।    शिक्षा सांस्कृतिक प्रक्रिया है, समाजीकरण का माध्यम, शक्ति का स्रोत और शौषण से मुक्ति का मार्ग है। शिक्षा का व्यक्ति और समाज के वीक्स से गहरा रिश्ता है, विशेषकर आज की ज्ञान केन्द्रित व नियन्त्रित दौर में। समाज के विकास और बदलाव के साथ साथ शिक्षा व ज्ञान का चरित्रभी बदला है। शिक्षा-विमर्श के मुद्देभी बदले हैं शिक्षण संस्थाओं के नाम विश्वविद्यालयों,डिग्री कालेजों, इंजीनियरिंग कालेजों, पोल-टेक्नीक कालेजों, प्रबंधन कालेजों फार्मेशी कालेजों वी,एड, कालेजों का विशाल जाल है जिससे शिक्षा-तन्त्र के विस्तार का अनुदान लगाया जा सकता है। संस्थाओं में वृद्दि शिक्षा की प्राप्त करने की प्रबल-इच्छा को दर्शातीहै। शिक्षा ग्रहण कर रहे विद्यार्थियों की संख्या में निश्चिततौर पर बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इस सब के बावजूद भी उच्च शिक्षा गृहण करने योग्य युवाओ का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षण संस्थाओंसे बाहर है। पिछले वर्षों में निजी संस्थाओं की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन सरकारी सस्थाओं में अपेक्षा के अनुरूप वृद्धि नहीं हुई है। शिक्षा की व्यक्ति के विकास में भूमिका के महत्व को रेखांकित किया है, लेकिन सामुदायिक स्तर पर जिस तरह की पहल कदमियां करके संस्थाओं का निर्माण किया जाता था, वह जोश समाप्त प्राय है। इसका एक कारण यह भी सामुदायिक प्रयासों से बनी संस्थाओं से विद्या प्राप्त करके लेकिन विद्यार्थियओं का प्रतिदान समाज की अपेक्षओँ  के अनुरूप नहीं था। शिक्षा व्यक्तिगत उन्नति और रोजगार प्राप्त करने का साधन मात्र बनी समाज उत्थान और विकास का नहीं। शिक्षण संस्थाएं भी अपनी      उपलब्धियों में उन्ही को दर्ज करती रही जो शिक्षा ग्रहण करके व्यवस्था में उच्च पदों सुशोभित होते रहे। शिक्षा अब दान की वस्तु नहीं रह गया, बल्कि व्यापार की वस्तु हो गई हैद्य। इसीलिए यह अब बुद्धिजीवियों के ही सोचने का विषय नहीं रह गया हैं, बल्कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों और कारपोरेट घरानों की गिद्ध दृष्टि इस पर है। पूंजी का स्वाभाविक चरित्र है लाभ का विस्तार।लाभ की रक्षा व बढ़ोतरी के लिए एक संगठित शिक्षा-माफिया पनप रहा है। निजी क्षेत्र का यह विशाल तंत्र अपने व्यापारिक लोभ वृति के लिए मोटी-मोटी फीसें वसूले करके छात्रों का तद्यथा नियमों से अत्यधिक कम वेतन देकर शिक्षकों के शोषण के लिए तो अपने जन्म से ही बदनाम है, लेकिन अब इसकी गुणवत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसके अधिकांश स्नातक अयोग्य पाए  जा रहे हैं। युनेस्कों की लर्निंगः दी ट्रेजर विद इन रिपोर्ट शिक्षा पद्धतिव उसके उत्पाद यानी छात्र का व्यक्तिगत व ज्ञान की कसौटीबन सकती है। इसमें शिक्षा को व्यक्तिगत व सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वाह के लिए सक्षम बनाने का माध्यम माना है और ज्ञान अर्जुन के चार स्तम्भ चिन्हित किए हैं। जिनमे) क ( ज्ञान बोध-बृहद सामान्य ज्ञान और कुछ विषयों में विशेषज्ञता हासिल करने के अवसरो से ज्ञान सीखा जा सकता  है। ज्ञान के तरीके सीखना ताकि जीवन पर्यन्त सीखनें के मौके का लाभ उठाया जा सके।) ख (कार्यबोध-इसमे व्यवसायगत कुशलता प्राप्त करने के साथ साथ विभिन्न परिस्थितियों का मुकाबला करना सीखना तथा कार्यों का सामूहिक तौर पर निपटारा करना सीखना शामिल है।) ग ( सह-अस्तित्व बोध-दूसरों को समझाकर और परस्पर निर्भरता का अहसास करते हुए साथ-साथ जीना सीखना। विवधता,परस्पर समझ और शान्ति के प्रति सम्मान के मनोभाव से मिलजुलकर कार्य पूरे करना और द्वन्दव की परिस्थितियों से निपटना सीखना।) घ (अस्मिता बोध-अपने अस्तित्व का विकास करना सीखना और उत्तरोत्तर स्वायत्तता,आत्म निर्णय और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ काम करना सीखना। इस संदर्भ में व्यक्ति की शारीरिक छमता, संचार कौशल, सौन्दर्यबोध, तार्किक छमता व स्मकरण शक्ति आदि की अनदेखी नही की जानी चाहिए।महाविद्यालय-विश्वविद्यालय आदि  उच्च शिक्षा के संस्थानों की त्रि-अयामी भूमिका को रेखांकित किया गया। शिक्षण,बोध और विस्तार इनकी परस्पर पूरकता। लेकिन इसे अपनी सच्ची भावना में लागू करने के गंभीर प्रयास नहीं हुए। जहां शिक्षण है वहां शोध नहीं, जहां शोध है वहां उसका विस्तार नहीं। जहां ज्ञान विस्तार हैं वहां अन्य दोनों पहलू नहीं।उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए यह आदर्श वाक्य ही बने रहे। शिक्षण संस्थाओं के विभाग परीक्षा उत्तीर्ण करवाने के केन्द्र बनकर रह गए ।समाज कार्य विभागों कार्यरत शिक्षकों में कोई समाज सेवी नहीं हैं, पर्यावरण के विभागों में कोई पर्यावरणविद् नहीं है। जिस समाज में उन्होनें कार्य करना उस समाज में कार्य करने के तरीके विकसित करने की अपेक्षा वे विदेशी पुस्तकों के पन्नों को विद्यार्थियों के भेजे में ठूंस रहे हैं। विभिन्न विषयों की पाठ्य सामग्री पर एक नजर डालने से ही स्पष्ट हो जाएगा कि बेशक राजनीतिक आजादी मिल गई हो, लेकिन ज्ञान पर अभी भी पश्चिमी का ही वर्चस्व है जो हमारी मेधा का स्वतंत्र ढंग से पनपने ही नहीं देता। विद्यार्थी कैसे सीखता है, विषय पर शिक्षकों से सवांद करते हुए स्वामी रंगनाथ संस्कृत साहित्य में एक प्रसंग की चर्चा करते हैंविद्यार्थी आचार्य २५ प्रतिशत अपने युग-काल से २५ प्रतिशत ज्ञान हासिल करता है। आज की शिक्षा पद्धति में ज्ञान के इन स्त्रोतों का संतुलन नहीं है। विशेषतौर पर सहपाठियों से संवाद, विचार-विमर्श,चर्चा-परिचर्चा तथा अपने युग-काल की परिस्थितियों जुड़ाव में अत्यधिक कमी है। जिसमें ज्ञान-शिक्षा समाज व युग निरपेक्ष होकर एकायामी हो गई है। ज्ञान के आभिजात्य चरित्र का ही संस्थाओं में वर्चस्व है, लोक ज्ञान को अभी ज्ञान की श्रेणी में ही नही रखा जाता। शिक्षण संस्थाएं और  इसमें कार्यरत कथित बुध्दिजीवियों का बृहतर समाज से नाभि-नाल का रिश्ता नहीं बना। इसके अभाव में वे बुध्दिजीवी से तैयार ज्ञान को परोसने वाले अध्यापक बन गए और वर्तमान के विश्लेषण व बेहतर भविष्य की कल्पना के अभाव में अध्यापक से वेतनभोगी शिक्षक- कर्मचारी तक सिकुड़कर रह गए। शिक्षकों का काम अब सोचना नहीं, सिर्फ करना रह गया है, सोचने का काम या तो नौकरशाहों ने ले लिया है, या सैम पित्रोदाओं ने ले लिया है या फिर बिरला-अंबानियों ने। उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका तात्कालिक जरूरतें पूरी करने के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों की सी हो गई है। जो युवाओं को वेतनभोगी या स्वरोजगार से जीविका अर्जित करने में तो कुछ हद तक सक्षम बनाते हैं, जिससे नियोक्ताओं को भी लाभ होता है, लेकिन शिक्षा जगत के दीर्घकालिक हित में नहीं है। उच्च शिक्षा नीति व शिक्षा के चरित्र को शिक्षा की मात्रा, गुणवत्ता और समता की त्रयी की परस्पर पूरकता में ही समझा जा सकता है। इनमें संतुलन भारतीय लोकतंत्र व समाज के विकास का आधार है। गुणवत्ता के बिना शिक्षा को कोई अर्थ ही नहीं है, मात्रा के बिना इसका चरित्र आभिजात्य हो जाएगा और असमानता की अवस्था पूरी व्यवस्था के लिए विनाशकारी है। लेकिन शिक्षा में निजीकरण व व्यापारीकरण  की नीतियों ने इस विचार को ही नष्ट कर दिया है, तीनों  में संतुलन की बात तो बहुत दूर हो गई, ईन तीनों को ही त्याग दिया है। उनके लिए बच गई है परम्परागत सिक्षा जिसे अप्रासंगिक मान लिया गया है और उसके सुधार, विकास व युगानुरूप बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। साहित्य, समाज, इतिहास, दर्शन, संगीत, भाषा आदि की शिक्षा जो मनुष्यता को निखारती है, उसे बोझ माना जा रहा है। शिक्षा का परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य पूरी तरह बदला है, जनोन्मुखी दृष्टि व जन अपेक्षाएं प्रभारी शिक्षा-चिन्तन से ही गायब हो रही है। इस परिदृश्य के प्रति चिन्ता व रोष तो है लेकिन शिक्षा व ज्ञान की दिसा को जनोन्मुखी करने के लिए जिस सशक्त जन आन्दोलन की आवश्यकता है, वह समाज में दिखाई नहीं दे रहा है प्रस्तावित मॉडलरू वर्ष 2015 में प्रस्तुत मॉडल का परिवर्तित रूप है इसमें उच्च शिक्षा में कौशल विकास को सम्मिलित कर उच्च शिक्षा पद्धति का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है जिसमें 12वी के बाद विद्यार्थियों को  पॉच  स्टेप में से एक में प्रवेश लेना पडता है जिसमें राजनीति धारा को सम्मिलित  किया गया  है ।किसी भी सामाजिक विकास में शिक्षा की अहम भूमिका मेरी हो जिसमें मानव को मानव संसाधन में परिवर्तित करने की शक्ति होती है। लेकिन और इण्टर शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा भी देश का भविष्य संभालने में महत्वपूर्ण उपकरण का कार्य करती है। देश के सतत् विकास के लिए हर पूर्ण हस्थ में रोजगार होना आवश्यक है। इसके लिए हमें परम्परागत शिक्षा स्वास्थ्य में सुधार कर रोजगार परक शिक्षा को अपनाना होगा।प्रस्तुत शोध पत्र में 12वीं पास तकीनकी शिक्षा से वांचित सभी विद्यार्थियों में उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश लेना चाहते है योग्यतानुसार निम्न पॉच स्टेप में से किसी एक स्टेप(धारा ) में प्रवेश दिया जाऐगा।प्रथम स्टेप (धारा ) 12 वी पास करके स्नातक स्तर के पहले वर्ष में छरू माह का इलेक्ट्रोक्स, मैकेनिक्स मोबाइल रिपेयर, मॉस कम्युनिकेशन, सी0ए0, बी0ए0, हेल्थ साइंस आदि जैसे कोई एक (न्च्ैक्ड, च्ैक्ब् स्कीम से कोई एक डिप्लोमा कोर्स) स्पीकिंग इगंलिश कम्यूटर साइंस का आधार पाठ्यक्रम तथा स्नातक स्तर के बी0ए0, बी0कॉम, बी0एस0सी0 आदि पाठ्यक्रम में त्रिवर्षीय परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। यह धारा स्वरोजगार के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए है।व्दितीय धारा – यह धारा उन छात्र छात्राओं के लिए हो जो सशस्त्र बलों पुलिस मैलिट्री, बी0एस0एफ0 में शामिल होकर देश की रक्षा करना चाहते है और तकनीकी पाठ्क्रम से 12 वीं पास छात्र छात्राएं पहले छमाही धारा एक के समान ही कौशल विकास का एक डिप्लोमा पूरा करने में तदोपरान्त सुगम स्पीकिंग इंगलिश, कम्प्यूटर साइंस का आधार पाठ्यक्रम तथा सामान्य पाठ्यक्रम वाला स्नातक स्तर बी0ए0, बी0कॉम, बी0एस0सी0 से त्रिवषीर्य परीक्षा उत्तीर्ण कर लें। इस धारा में छात्र छात्राओं को ।कअंदबम स्मअमस में च्ीलेपबंस म्कनबंजपवद  कर त्रिवषीर्य पाठ्यक्रम (प्रयोगात्मक एवं सैध्दन्तिक) पूरा करना होगा।तृतीय धारा – धारा दो के समान इस धारा में भी छात्र छात्राओं को कौशल विकास का कम से कम एक डिप्लोमा. सुग्म्यव स्पीकिंग इंग्लिश, कम्प्यूटर साइन्स का आधार पाठ्यक्रम पूरा करना होगा क्योंकि यह धारा संघ लोक सेवा आयोग तथा प्रान्तीय लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा से सम्बन्धित है अतः छात्र छात्राओं को इतिहास, भूगोल से लेकर सभी जानकारी आवश्यक है। अतः सभी विषयों के साथ सामान्य पाठ्यक्रम (बी0ए0, बी0एस0सी0 एवं बी0कॉम0) में त्रिवर्षीय स्नातक होना चाहिए।चतुर्थ धाराः-  उपरोक्त धाराओं के सामान्य इसमें भी सभी छात्र छात्राएं कम से कम एक डिप्लामा के साथ कौशल विकास, सुग्म्य स्पीकिंग इंग्लिश, कम्प्यूटर साइन्स का आधार पाठ्यक्रम के साथ सामान्य पाठ्यक्रम में साथ त्रिवर्षीय (बी0ए0, बी0एस0सी0 एवं बी0कॉम0) स्नातक परीक्षा उतीर्ण करें क्योंकि यह धारा भारतीय वैश्विक राजनीति में कैरियर बनाने वालों के लिए है, अतः एडवांस लेवल की राजनीति शास्त्र, भारतीय संविधान, विदेशों के संविधान, देश-विदेश का इतिहास संस्कृति आदि का गहन अध्ययन छात्र छात्राओं के पाठ्यक्रम में होना चाहिए. संवैधानिक के साथ प्रयोगात्मक कार्य को भी वरीयता दी जानी चाहिए। पंचम धाराः-  इस धारा में छात्र छात्राओं को प्रवेश मिलना चाहिए जो अध्यापक, कवि, लेखक या वैज्ञानिक बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं। ऐसे सभी छात्र छात्राओं को कम से कम एक कौशल विकास पाठ्यक्रम में डिप्लोमा तथा संगत विषय के एडवांस लेवल के साथ त्रिवर्षीय स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम (बी0एड0, टी0ई0टी0, सी0टी0ई0टी0) माध्यमिक स्तर तक अध्यापन के लिए एडवांस लेवल पर स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के साथ नेट  पी0एच0डी0 उपरोक्त सभी धाराओं का मुख्य लक्ष्य छात्र छात्राओं को रोजगारमुखी शिक्षा देना है, अतः- छात्र रोजगार को केन्द्र में रखकर शिक्षा ग्रहण करेंगे अतः सामाजिक सरोकारों से उनका सम्बन्ध धीरे-धीरे समाप्त होता जायेगा और समाज में विरूपताए विषमताएं विकराल रूप धारण कर लेंगी। अतः सभी धाराओं में1. सामाजिक सरोकार सामाजिक अध्ययन को अनिवार्यत पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।2. नैतिक शिक्षा और इथिक को  भी नियमित रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

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