ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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लोकमान्य तिलक का स्वराज्य दर्शन

डां0 ममता यादव
एसोसिएट प्रोफेसर
राजनीतिविज्ञान
डा0 शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुर्नवास विश्वविद्यालय लखनऊ

उग्र राष्ट्रवाद के जन्मदाता एवं भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिषा एक नई धार देने वाले महान नेता थे वाल गंगाधर तिलक जिन्हें श्रद्धा से लाकमान्य कहकर पुकारा जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जो मात्र उदारवादियों तक सीमित था, जनता तक पहुंचा दिया। डा0 आर. सी. मजमूदार ने लिखा है कि अपने परिश्रम तथा अथक प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बालगंगाधर तिलक लोकमान्य कहलाए जाने लगे और उनकी एक देवता के समान पूजा होने लगी। वह जहां कही भी जाते के उनका राजकीय स्वागत और सम्मान किया जाता था उनके द्वारा अभूतपूर्व बलिदानों में उन्हें पहले महाराष्ट्र का और बाद में सम्पूर्ण भारत का छत्र रहित सम्राट बना दिया था। तिलक सच्चे अर्थों में लोकमान्य थे। भारत की आधुनिक और परम्परागत ऊर्जा को एक साथ पिरोने वाले करिश्माई नायक अभिजन और आमजन के बीच का सेतु भारतीयता को विराट अर्थ से जोड़ने वाले विचारक परम्परागत प्रतीकों नायकों और मिथकों का प्रयोग करने स्वराज्य के महायज्ञ में जन ऊर्जा को जाग्रत करके उसका उपभोग और नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता तिलक जैसे राष्ट्रनायक में ही थी। उग्र राष्ट्रवाद के जन्मदाता एवं भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिषा एक नई धार देने वाले महान नेता थे वाल गंगाधर तिलक जिन्हें श्रद्धा से लाकमान्य कहकर पुकारा जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को जो मात्र उदारवादियों तक सीमित था, जनता तक पहुंचा दिया। डा0 आर. सी. मजमूदार ने लिखा है कि अपने परिश्रम तथा अथक प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बालगंगाधर तिलक लोकमान्य कहलाए जाने लगे और उनकी एक देवता के समान पूजा होने लगी। वह जहां कही भी जाते के उनका राजकीय स्वागत और सम्मान किया जाता था उनके द्वारा अभूतपूर्व बलिदानों में उन्हें पहले महाराष्ट्र का और बाद में सम्पूर्ण भारत का छत्र रहित सम्राट बना दिया था। तिलक सच्चे अर्थों में लोकमान्य थे। भारत की आधुनिक और परम्परागत ऊर्जा को एक साथ पिरोने वाले करिश्माई नायक अभिजन और आमजन के बीच का सेतु भारतीयता को विराट अर्थ से जोड़ने वाले विचारक परम्परागत प्रतीकों नायकों और मिथकों का प्रयोग करने स्वराज्य के महायज्ञ में जन ऊर्जा को जाग्रत करके उसका उपभोग और नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता तिलक जैसे राष्ट्रनायक में ही थी।  भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में प्रस्तुत लोकमान्य तिलक ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीयों को स्वतन्त्रता एवं श्वसन के लिए प्रेरित किया। यद्यपि कि स्वराज्य की अवधारणा का उल्लेख, दादा भाई नौरोजी फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी जैसे नरमपंथियों ने भी किया पर उनकी स्वराज्य कि अवधारणा अधूरी और अस्पश्ट थी। इसलिए स्वराज्य के सम्बन्ध में उनके अनुदान का महत्व नहीं मिला। उग्रवादी नेताओं ने स्वराज्य की विचारधारा को अपनी राजनीतिक पद्यपि में पूरी वरीयता दी इसके अतिरिक्त इन्होेंने इस अवधारणा का सरलाश्य कर सीधे जनता से जोड़ा। आजदी की मांग स्वराज्य पर आधारित की। लोकमान्य बालगंगाधर ने पूर्ण स्वाधीनता की मांग का दूसरा नाम स्वराज्य बतलाया उन्हें स्वराज्य का मयदाता कहा गया। मातृ भूमि के प्रति अपनी भक्ति तथा समर्पण भावना के कारण तिलक को भारतीय राष्ट्रवाद का ‘हरकयूलीस’ इस संज्ञा से अभिधानित किया गया है। उनका राजनीतिक दर्शन स्वराज्य शब्द पर ही केन्द्रित का स्वराज्य एक पुरातन वैदिक शब्द है। स्वराज्य माने प्रत्येक व्यक्ति का राज्य यानी ऐसा राज्य जो प्रत्येक को अपना लगे अर्थात सबका राज्य स्वराज्य अर्थ है अन्तिम सत्ता जनता के हाथ में है उत्तरदायी राजनीतिक व्यवस्था का ही दूसरा नाम स्वराज्य है यह सामाजिक व्यवस्था का आधार है। स्वराज्य व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है। तिलक ने स्वराज्य शब्द को इसी रूप में हिन्दू शास्त्रों से प्राप्त किया। तिलक इसे मातृ एक अधिकार ही नहीं वरन धर्म मानते थे। उन्होंने ‘स्वराज्य’ को एक विशुद्ध नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ दिया था राजनीतिक दृष्टि से इसका अर्थ होमरूल था अर्थात अपने घर में अपना ही षासन नैतिक दृष्टि से पूर्णताः था इससे द्योतन होता था आत्म नियत्रण की पूर्णताः की प्राप्ति का जो अपने कत्र्तव्य पालन के लि नितान्त आवश्यक है। इसकी इसकी आध्यात्मिक अर्कवत्ता निहित है अपनी आन्तरिक आध्यात्मिक स्वतन्त्रता तथा विचारपरक आनन्द अनुभव करने में राजनीतिक के क्षेत्र में तिलक के विचारों का आरम्भ बिन्दु स्वतन्त्रता की अवधारणा थी, स्वतंत्रता की यह अवधारणा एक ओर तो वेदान्त दर्षन पर और दूसरी ओर मिल, बर्क व विल्सन के पाष्चात्य विचारों पर आधारित थी तिलक जी के अनुसार “स्वतन्त्रता की व्यक्तिगत आत्मा का जीवन है” उनके षब्दों में “सृजनात्मकता की स्वायत्त शक्ति को ही स्वतन्त्रता कहा जा सकता है, “इस स्वतन्त्रता को तिलक जी ने भारत के संदर्भ में स्वराज्य कहा सन् 1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में तिलक ने भारतीयों को स्वराज्य का मंत्र देते हुए कहा- “स्वराज्य भारतवासियों का जन्मसिद्ध अधिकार है तिलक ने स्वराज्य की माँग को नैतिक, राजनैतिक और सामाजिक सभी आधारों पर न्यायोचित ठहराया और यह विश्वास व्यक्त किया कि स्वराज्य की प्रगति भारतीय राष्ट्रवाद की एक महान विजय होगी। तिलक ने स्वराज्य को एक राजनैतिक आवष्यकता मातृ नहीं बल्कि नैतिक जरूरत बताया और कहा कि यह तो मनुश्य के नैतिक स्वरूप की अनिवार्य आवश्यकता है हर व्यक्ति में एक दैवीय तत्व विद्यमान रहता है जिसकी अनुभूति के लिए आवष्यक है कि उसे स्वधर्म के अनुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो, सच्ची स्वतन्त्रता कोई स्वेच्छाचारिता नहीं है वरन् विनियमित और संयमित स्वतन्त्रता है जिसकी प्राप्ति सभी संभव है जब हमारे सामाजिक जीवन में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापना हो जिसमें लोग धर्मानुसार चले साथ ही जनता की जो नैतिक मनोभावना हो। तिलक ने कहा  िकइस प्रकार की उत्तरदायी राजनीतिक व्यवस्था का ही दूसरा नाम स्वराज्य है। तिलक के अनुसार स्वराज्य अधिकार भी था और साथ ही धर्म की राजनीतिक क्षेत्र में स्वराज्य का अर्थ राष्ट्रीय स्वशासन से था, “स्वराज्य से अभिप्राय केवल यह है कि भारत के आन्तरिक मामलों का संचालन और प्रबन्ध भारतवासियों के हाथ में हो नैतिक दृश्टि से स्वराज्य का अर्थ था आत्मनिग्रह की पूर्णता प्राप्त करना तथा आध्यात्मिक रूप से स्वराज्य है “स्वराज्य व्यक्ति और राष्ट्र के जीवन की अनिवार्यता थी क्योंकि “जिन लोगों ने इस संसार में स्वराज्य का उपभोग नहीं किया वे परलोक में भी स्वराज्य के अधिकारी नहीं हो सकते”। तिलक राष्ट्रवादी थे किन्तु उनके राष्ट्रवाद का चरित्र पुनरूत्थानवादी था। भारतीय राष्ट्रवाद की नींव हिन्दू धर्म व संस्कृति के मजबूत आधार पर रखकर वह उसे हिन्दू राष्ट्रवाद में बदलना चाहते थे, तिलक का दृढ़ विष्वास था कि “सच्चा राष्ट्रवादी पुरानी नींव पर ही निर्माण करना चाहता है”।  वास्तव में तिलक के विचारों और दृष्टिकोण में हमें यथार्थवादी तत्वों के दर्षन होते हंै। उनके राजनीतिक विचार में प्राचीन भारतीय विचार और आधुनिक पश्चिम में बैद्धिक तता प्रजातन्त्रिक विचारों का मिश्रण शिटगोचिर होता है। वह एक प्रजातान्त्रिक विचारों का मिश्रण होता है वह एक वेदान्ती थे। वह आत्मा को सर्वोच्च वास्तविकता मानते थे। क्योंकि सभी व्यक्ति उस पूर्ण सार का एक भाग और पक्ष है। अतः सभी में एक जैसी स्वतन्त्रता आध्यामिक्ता शक्ति होगी। इसने उनहें स्वतन्त्र भावना की सर्वोच्चता में विश्वास रखने की प्रेरणा दी। उनके शब्दों में स्वतन्त्रता होमरूल आन्दोलन की आत्मा थी। स्वतन्त्रता का दिव्य संस्कार कभी बूढ़ा नही होता। स्वतन्त्रता तो वयक्ति की आत्मा का जीवन है और वेदान्त यह घोषणा करता है कि आत्मा बह्म से पृथक नही, उससे एकरूप है। स्वाधीनता सदा अक्षुण रहने वाला सिद्धान्त है। डां0 वर्मा की सम्मति में, ‘‘तिलक का राष्ट्रीयता सम्बन्धी दर्शन आत्मा को सर्वोच्च स्वाधीनता मानने वाले वेदान्तिक दर्शन और मेजिनी, वर्क, मित्र और उनके अन्तर विल्सन के पश्चिमी दर्शन का संश्लेषण ैलजीमेपे था,‘‘ इस संश्लेषण को स्वराज्य जो एक वैदिक शब्द है, के रुप में व्यक्त किया गया है। स्वराज्य शब्द का प्रयोग महाराष्ट्र में शिवाजी के राजतन्त्र के लिए भी किया जाता था। चूँकि तिलक का आध्यात्मिक था इसलिए वे स्वराज्य को मनुष्य का अधिकार ही नहीं धर्म मानते थे। तिलक स्वराज्य को एक राजनीतिक आवश्यकता ही नहीं एक नैतिक कर्तव्य भी मानते थे। तिलक के स्वराज्य का अर्थ धर्म राज्य था जो गाँधी के रामराज्य के अनुरूप जान पड़ता है। तिलक ने नारा दिया-  ष् व्नत सपअमे ंदक वनत कींतउं ंतम पद जीम अंपद पद जीम ंकेमदबम व िैूंतंरंण्ष्अर्थात हमारा जीवन और धर्म दोनो ही स्वराज्य के बिना व्यर्थ है।    तिलक के अदैतवाद में स्वतन्त्रता के धारणा की सर्वोच्चता दिखाई देती है। तिलक के शब्दों में स्वतन्त्रता ही होमरूल (स्वराज्य) आंदोलन की प्राण था। स्वतन्त्रता की ईश्वरीय भावना कभी वार्धक्य को प्राप्त नहीं होती………. स्वतन्त्रता ही व्यक्तिमत आत्मा का जीवन है और व्यक्तिगत आत्मा ईश्वर से भिन्न नही है बल्कि वह स्वयं ईश्वर है। यह स्वतन्त्रता एक ऐसा सिद्धान्त है जिसका कभी विनाश नहीं हो सकता। तिलक के स्वराज्य की संकल्पना भगवत गीता के आध्यात्मिक विचारों पर आधारित थी। जैसे- स्वधर्म, स्वकर्म। उन्होने श्रीमद भगवत गीता रहस्य में इन नैतिक सिद्धांतो पर लिखा ळें भगवत गीता के अनुसार उन्हीं गतिविधियों में सम्मिलित होना चाहिए जो स्वयं के स्वभाव क अनुरूप हो। “ अपना स्वंय का कर्तव्य यदि पूर्णता के साथ नहीं भी किया गया हो तो भी नैतिक रुप से ज्यादा उत्तम है तुलना में किसी और के द्वारा प्रत्यक्षतः पूर्णता के साथ किये गये कर्तव्य के। वह जो अपने प्रवृति के अनुरूप कार्य करता है वह किसी प्रकार की बुराई नहीं करता।”स्वराज्य का उद्देश्य भाई चारे स्वं मानवतावादी समाज की स्थापना करना है जिसके प्रत्येक सदस्य सात्विक गुणों से युक्त हो। यह सब न्याय, दयालुता, बुद्धिमता, दूरदर्शिता, इन्द्रियों के अनुशासन आदि के गुण हैं। नैतिक वह है जो इस मानवता को बढ़ावा दें।तिलक ने कहा कर्मयोगी स्वराज्य को हासिल करने का प्रयत्न करता है और ज्ञानी या ऋषि इसकी कामना करता है। उन्होने कहा कि प्रत्येक सदस्य की अपने घर राज करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, कोई और यह नहीं कर सकता। उन्होंने गीता के कर्मयोग पर जोर दिया और कहा कि बाकि सभी लोग जैसे योग, भक्तियोग आदि इसमें सम्मिलित हैं। हमारे देश के सभी ऋषि मुनियों द्वारा मुक्ति के लिए इस निष्काम कर्म को स्वीकार किया गया है। यह हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य(मोक्ष) है। स्वतंत्रा आत्मा की मानसिक स्थिति ही मोक्ष को प्राप्त कर सकती है।  तिलक ने भारत की पुरानी प्रतिष्ठा, एवं मूल्यों को पुनः हासिल करने पर जोर दिया। वह एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली बनाना चाहते थे। उन्होंने पश्चिम का अंधानुकरण करने का विरोध किया। उन्होने धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जिससे लोगों के नैतिक चरित्र का निर्माण हो सके। 1905 तक कांग्रेस का विश्वास संवैधानिक उपायों में था और वह अधिकारों के लिए यातना की वृति का अवलम्ब ले रही थी तिलक ने संवैधानिक उपायों को व्यर्थ घोषित करते हुए उसमें अविश्वास व्यक्त किया। अतः उन्होने साग्रह  कहा, “विरोध से कोई लाभ नहीं। मात्र विरोध यदि आत्मावलम्बन का परिचय देने वाले उपायों की शक्ति द्वारा सम्पुटित न तो प्रार्थना निष्प्रयोजन है। तिलक तथा उनके समान विचार वाले राष्ट्रवादियों ने स्वराज्य-प्राप्ति के लिए प्रभावपूर्ण कार्य करने के लिए राष्ट्र के समाने यह चार सूत्री कार्यक्रम रखा, बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय, शिक्षा तथा शान्तिपूर्ण प्रतिरोध। स्वदेशी का आरंभ उदारवादियों ने एक आर्थिक आदोलन के रूप में किया तथापि यह तिलक के नेतृत्व में एक ‘राजनैतिक मन्त्र’ बन गया। तिलक ने केसरी में लिखा “हमारा राष्ट्र एक वृक्ष की भांति है, जिसका मूल तना स्वराज्य है और विदेशी बहिष्कार उसकी शाखाए हैं।” वास्तव में स्वदेशी ने ही स्वराज्य का रास्ता दिखाया। तिलक ने स्वदेशी का व्यापक अर्थो में प्रयोग शिक्षा, विचारों और जीवन पद्धति के रुप में किया। तिलक ने भारतियों के मन और मस्तिष्क को स्वदेशी बना देना चाहा और इस प्रकार उनमें स्वाधीनता की भावना भर देने का प्रयास किया। डा0 गुप्ता के शब्दों में “स्वदेशी एक मुक्तियुक्त उपाय था जिसके द्वारा उस नवीन भावना का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन हो सकता था, जिसकी शिक्षा तिलक तथा अन्य राष्ट्रवादी लोगों को देते थे।” “स्वदेशी का यह आदोलन विचार शीघ्र ही राष्ट्रीय पुनरूद्वार के आदोलन में परिणत हो गया। इसे राष्ट्र के प्रति प्रेम के क्रियात्मक प्रयोग के रूप में मानना ही स्वदेशी आदोलन है।” इस प्रकार स्वदेशी ‘वन्दे मातरम’ प्रमाणित हो गया।तिलक बहिष्कार को ऐसा राजनीतिक अस्त्र मानते थे जो भारतीयों के निःशस्त्र होते हुए भी अमोध अस्त्र का काम कर सकता था। उन्होंने यह बल पूर्वक कहा कि  स्वदेशी में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के बिना क्रियात्मक से विश्वास अर्थहीन है। उन्होंने कहा, “यदि आप स्वदेशी का वरण करते है तो आपकों विदेशी का बहिष्कार करना पड़ेगा बिना इसके स्वदेशी की उन्नति नही हो सकती। बहिष्कार एक प्रबल शस्त्र है यह युद्ध का विकल्प है वास्तव में यह एक नया राजनीतिक उपया है।” तिलक ने कहा यदि आप समझते है कि आपको मनुष्य कहलाने के अधिकार है। यदि सरकार अथवा किसी अन्य के अत्याचारों से आप उद्धिग्न होते, यदि अपमान आपके हदयो में आन्दोलन उत्पन्न करता है, यदि अपने वीर योद्धा पूर्वजो पर आपकों गर्व है तो आप विदेशी का बहिष्कार करें। 2 जनवरी 1907 को कलकत्ता की सभा में कहा “क्या आपने आत्मोत्सर्ग और आत्मसंयम की शक्ति इनती नहीं है कि आप विदेशी शासन को अपने ऊपर राज्य करने में कोई सहायता न दे। यह बहिष्कार है………. एक राजनीतिक शस्त्र है। राष्ट्रीय शिक्षा प्रभावशाली राजनीतिक कार्यवाही का तिसरा महत्वपूर्ण तत्व था। तिलक ने कहा- “अगर मुझे कल स्वराज्य मिल जाए तो मैं सर्वप्रथम शिक्षा को मुत और अनिवार्य बना दूँ।” उन्होने धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जिससे लोगों के नैतिक चरित्र का निर्माण हो सकें। उन्होंने कहा- “शिक्षा प्रदान करने की भाषा मातृ भाषा होनी चाहिए तथा अंग्रेजी दूसरी भाषा के रूप में पढाया जाना चाहिए।” निष्क्रिय प्रतिरोध के संदर्भ अपने विचार व्यक्त करते हुए तिलक ने कहा निष्क्रिय प्रतिरोध साद्य प्राप्त करने का साधन है।, अपने आप में कोई लक्ष्य नही निष्क्रिय प्रतिरोध किसी कारण का पालन करने से उत्पन्न लाभ तथा हानियों को संतुलित करने का माध्यम है, कानून का पालन नहीं। यदि विवेक द्वारा कानून की अवज्ञा अधिक लाभप्रद प्रतीत हो तो कानून का पालन नही किया जाना चाहिए, लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प ही निष्क्रिय प्रतिरोध है। यदि मार्ग में बाधाएं उपस्थित हो रही हों तो संकल्प प्राप्ति के लिए उनसे संघर्ष करना चाहिए। प्रत्येक कानून संवैधानिक नहीं कहा जा सकता। न्याय तथा नैतिकता के विरूद्ध बनाये गये कानून संवैधानिक नही होते। निष्क्रिय प्रतिरोध न्याय संगत तथा उच्च नैतिक आदर्श होने के नाते पूर्णतया संवैधानिक है।वास्तव में जिस प्रकार उदारवादियों के अपने लक्ष्य की प्राप्ति के साधन प्रार्थनाए स्मृति पत्र और            प्रतिनिधिमण्डल थे उसी प्रकार तिलक ने इन चार सूत्री कार्यक्रय के द्वारा स्वराज-प्राप्ति का यत्न किया। 1907 में सूरत विच्छेद से पूर्व अपने ओजस्वी राजनीतिक भाषण में तिलक ने कहा- “हमारा उद्देश्य स्वशासन है और इसे यथासंभव शीघ्र ही प्राप्त करना चाहिए। हमारा राष्ट्र आतंकवादी दमन के लिए नहीं है। आप लोग कायर न बने। जब आप स्वदेशी को स्वीकार करते है तो आपकों विदेशी का बहिष्कार करना होगा…………..हमारा उदेश्य पुनर्निर्माण है। हमारा स्वराज का आदर्श विशिष्ट लक्ष्य है जिसे जनसमुदाय समझे। स्वराज्य में जनता का शासन जनता के लिए होगा।”यद्यपि कि कांग्रेस ने कलकत्ता अधिवेशन में स्वराज्य को औपचारिक रुप से अपना लक्ष्य घोषित कर दिया था परन्तु उसे प्रभावी बनाने में वह उदासीन रही। माण्डले जेल से लौटने के बाद तिलक ने स्वराज्य का संदेश जन जन तक पहुंचाने के लिए एक प्रभावी कार्यक्रम बनाया, जिसके लिए उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना की और इस बात के औचित्य को सिद्ध किया कि भारत को अविलम्ब स्वराज्य दिया जाना चाहिए। तिलक ने कहा “होमरूपल की बड़ी ही सरल परिभाषा है, जिसे एक साधारण किसान भी समझ सकता है —यह कि मैं अपने देश में भी वैसी ही स्वतन्त्रता का अनुभव करूँ, जैसे कोई अंग्रेज इंग्लैण्ड मे या किसी और उपनिवेश में रहकर अनुभव करता है। तिलक ने कहा “होमरूल आदोलन इसिलए चलाया गया कि आप लोग अपने घर के स्वामी बन सके, केवल सेवक न बने। यह इस आदोलन का यर्थाथ लक्ष्य है। प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि वह नैतिक तथा बौद्धिक से इस लक्ष्य को प्राप्त करे।”तिलक ने आगे कहा वस्तुतः “होमरूल हमारा धर्म है। जैसे आप ऊष्मा के गुण को अग्नि से पृथक नहीं कर सकते, वैसे ही आप हमे होमरूल से पृथक नही कर सकते। ये दोनो एकता के सूत्र में बधे है। आपके विचार स्पष्ट हो, आपके लक्ष्य ईमानदार हों और आपके प्रयास संवैधानिक हों तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकों अपने प्रयत्नों में सफलता मिलेगी। कारय न बनें, शक्तिशाली बने और विश्वास रखें कि ईश्वर आपके साथ है। याद रखिए ईश्वर उनकी सहायता करना हैं, जो अपनी सहायता स्वयं करते है।”तिलक ने स्वराज्य को एक राजनैतिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि मनुष्य के लिए नैतिक परम आवश्यकता बताया। तिलक के अनुसार स्वराज्य मनुष्य के नैतिक स्वरूप की अनिवार्य माँग है। प्रत्येक व्यक्ति में दैविक तत्व विद्यमान कहता है जिसकी अनुभूति के लिए आवश्यक है। कि उसे स्वधर्म के अनुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो। यह सच्ची स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारित नही है वरन विनियमित और संयमित स्वतन्त्रता है जिसकी प्राप्ति तभी संभव हैं जब क ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना हो जिसमें लोग धर्मानुकूल आचरण कर सकें और जो जनता के नैतिक मनोभावना व आत्मा के अनुकूल है। इस प्रकार की उत्तरदायी राजनीतिक व्यवस्था का ही दूसरा नाम स्वराज्य है।  तिलक ने स्वराज्य की धारणा में जिस प्रकार की उत्तरदायी सरकार की परिकल्पन  की उसके आधार पर यह स्पष्ट होता है कि वह “लोकतान्त्रिक स्वराज्य”  के थे। तिलक के जीवनीकार टी.वी. पर्वते ने तिलक को लोकतान्त्रिक स्वराज्य का प्रर्वतक माना क्योंकि तिलक तत्कालनीन सम्पूर्ण शासन प्रणाली को ही बदल देना चाहते ते और कहते थे कि स्वराज्य का अर्थ केवल कुछ थोड़े से उच्च वेतन वाले पदों को प्राप्त कर लेना नहीं है वरन एक ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें शासन के सभी अधिकारी और कर्मचारी स्वयं को जनता के प्रति उत्तरदायी समझे। तिलक के लिए स्वराज्य का आश्य था कि अंतिम सत्ता जनता के हाथ में हो। उनके लिए स्वराज्य का आधार यह विश्वास था कि अंतिम सत्ता जनता के हाथ में हो। उनके लिए स्वराज्य का आधार यह विश्वास था कि राज्य का आस्तित्व जनगण के कल्याण और सुखः के लिए है पर्वते ने लिखा है “कि तिलक को “भारतीय क्रांति के ‘जन्मदाता’,             ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ आदि नामों से उल्लेखित किया गया है और इन नामों में लोकतान्त्रिक स्वराज्य के प्रतिपादक अवश्य ही जुड़ जाना चाहिए क्योंकि लगभग अपने जीवन पर्यन्त उन्होने जो प्रचार कार्य किया उसमें इस बात को बराबर दोहराते रहते उनके लिए लोकतन्त्र और स्वतन्त्रता समान उद्देशीयी थे। पवर्त के ही अनुसार “तिलक भारतीय स्वराज को लोकतान्त्रिक स्वराज के रुप में देखते थे। और भारतीय स्वराज के युग.ष्टि की तरह उनकी यह धारणा बहुत अमुल्य थी गाँधी जी के अनुसार तिलक जन्मजात लोकतन्त्रवादी थे। तिलक का .ढ़ विश्वास था की लोकतान्त्रिक स्वराज केवल जनजाग्रति जनता थी आत्मभिव्यक्ति की शक्ति और उसके आत्मविश्वास से ही निर्मित हो सकेगा। वे कभी भी यह नही मानते थे कि आतंकवादी या सेना के नेता बिना जनता की सक्रिय सहानुभूति और  समर्थन प्राप्त अकेले ही थी भारत में स्थापित सरकार को उखाड़ सकेगें।  जन आन्दोलनों द्वारा अपने अधिकारो को बराबर जनता तक पहुँचाना और उनकी मांग करने के लिए शक्ति का निर्माण करना तथा ऐसे आन्दोलनों द्वारा जनता की शिकायतों प्रस्तुत करना और उन्हें दूर करने की मांग करना ही उनका स्थायी कार्यक्रम था. उनका ऐसा अनुमान था कि इस कार्यक्रम को क्रियान्वित  करने से जो शक्ति प्राप्त होगी वही अंत में किसी अनुकूल राजनैतिक परिस्थित में पूर्ण राजनैतिक परिस्थित में पूर्ण राजनैतिक स्वराज की प्राप्ति कर सकेगी। तिलक ने स्वराज्य को सामाजिक व्यवस्था का आधार बताया। उन्होने कहा कि राष्ट्र की प्रगति का मूल स्वराज्य में ही निहित ही स्वराज्य के अभाव में औधोगिक प्रगति राष्ट्रीय शिक्षा सामाजिक            सुधार आदि कुछ की संभव नही थी ।यदि स्वराज मिल गया तो हमारे विफिल उद्देश्य सुगमतापूर्वक पूरे हो सकते है । उन्होने माना की स्वराज व्यक्ति का प्राक्रतिक अधिकार है और अंग्रेजों द्वारा भारत पर अधिकार जमाए रखना दोषपूर्ण है यह भारतीय का परम कर्तव्य है कि वे स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करें।वास्तव में तिलक भारतीय राजनैतिक एंव सामाजिक चिंतन के अदितीय विचारक थे। तिलक ने स्वराज्य की मान्यता को  सैदान्तिक शब्दावली से लाकर भारतीयों के  होठों पर ला बिठाया। स्वराज्य को सनातन धर्म के साथ सयुक्त कर तिलक ने स्वराज्य की शाश्वता सिद्ध की। राष्ट्रवाद की सुरसरी को भागीरथ के  समान जनमानस के स्मर्ति पटल पर  अवतरित  कर तिलक ने भारत को पुनः एकता का आदेश दिया। वे अनेकता में एकता का दर्शन करने वाले सहिष्णु तथा धर्मनिरपेक्ष मानव के रूप में उपस्थित हुए। गीता का अमर सन्देश देकर भारतीयों के मानव में सुपुष्त अर्जुन को कर्म- मार्ग के प्रति प्रेरित किया।      तिलक आधिनिक भारतीय लोकतन्त्र के प्रेणता है। जनशक्ति ही उनकी उपासना की देवी थी। तिलक की धारणा थी की स्वराज्य के अन्तर्गत देश का राजनैतिक ढाँचा सैघात्मक होगा। तिलक के अंतिम शब्द थे “यदि स्वराज्य न मिला तो भारत सम्रद्ध नहीं हो सकता। स्वराज्य हमारे आस्तित्व के लिए अनिवार्य है”। नेहरू के विचार तिलक के विषय में बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है कि   “तिलक आधुनिक भारत के हरक्यूलीज तथा प्रोमोथियस ही नही अपितु भारतीय राष्ट्रवाद के पिता थे।”
त्ममितबदबमेरू.1. ैचमंबदमे ंदक ूतपजपदह ंज ज्पसंा  ख्ळण्।ण्छण् ंजमेंद ंदक बवउचंदलए डंकतंे,2. ठण्ळण् ज्पसंा. ष्ज्ञंतउलवहं दक ेूंतंरए ेचममबीमे ंदक ूतपजपदहे ंज जममसंाण्3- रामगोपालः लोकमान्य तिलक बाम्बे 1956 4- टी. वी. पार्वते बालगंगाधर तिलक (नवजीवन पब्लिशिंग हाउस अहमदाबाद 1958)5- जवाहर लाल नेहरू टुवर्ड फ्रीडम (दी जाँन डे कम्पनी न्यूयार्क 1942)6- बाल गंगाधर तिलकः हिज राइटिंग्स एण्ड स्पीचेज(गणेश एण्ड को मद्रास 1922 तृतीय निस्करण)7- डी.वी. तहमानकर लोकमान्य तिलकः फादर आफ इण्डियन अनरेस्ट एण्ड दी मेकर आफ मोर्डन इण्डिया (जानमरे लन्दन 1956)

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