ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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‘‘विश्व मंच पर भारत, वेद एवं कार्य संस्कृति के विशेष सन्दर्भ में’’

डाॅ0 इन्द्रमणि
एसो0प्रो0 राजनीति विज्ञान विभाग
वी0एस0एस0डी0 काॅलेज कानपुर

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की पहचान एवं प्रतिष्ठा को लेकर गम्भीर चिंतन हो रहा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक दृष्टि से भारत की छवि में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इस विषय को दो दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है एक है- भारतीय ज्ञान मीमांसा जन्य वैदिक कालीन सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से, दूसरा-वर्तमान में गतिमान भूमण्डलीकरण के युग में भारतीय कार्य संस्कृति की दृष्टि से। उल्लेखनीय बात यह है कि        ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’, ‘सबै-भूमि-गोपाल की’ एवं जय जगत का दर्शन भारतीय भूमि से उपजा ज्ञान है जो हजारों वर्ष बाद भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण के रूप में पश्चिमी राष्ट्रों से प्रचारित एवं प्रसारित हो रहा है और उससे हम परम प्रभावित हैं। प्राचीन विश्व के इतिहास इस बात का संकेत करते हैं कि साधारणतया ज्ञान एवं दर्शन के दो प्रमुख केन्द्र धुरी की भाँति वैश्विक ढांचा को गति दे रहे थे। प्रथम आर्यावर्त (भारत), द्वितीय यूनान। इस दृष्टि से प्राचीन काल में विश्व मंच पर भारत की वैदिक प्रतिष्ठा सिद्ध थी। भारत सिरमौर था। वेद को ज्ञान-विज्ञान का अभूतपूर्व कोष माना गया। अभूतपूर्व होने के कारण ही उसे अपौरूषेय कहा जाता है। वैदिक ज्ञान से हम वर्षों तक लाभान्वित होते रहे हैं परन्तु पिछले 1500 वर्षों के भारतीय इतिहास हमें इंगित करते हैं कि हमारे अन्दर एक ओर चिंतन की कमी हुई तो दूसरी ओर वासना की अधिकता हो गयी। कारण जो भी रहे हों पर यही असली चिंता की जड़ है। स्वयं के चिंतन में न्यूनता एवं वासना की अधिकता की वजह से हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर खिंचते चले गये, साथ ही कहीं न कहीं अन्य कारणों के साथ-साथ ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ के वर्तमान आर्थिक संस्करण भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण ने उक्त दोषों में और बढ़ोत्तरी कर दी। फलतः मानवीय मूल्यों में उल्लेखनीय गिरावट हुई, यद्यपि प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। अर्थ (धन) भी बढ़ा है, जीवन स्तर भी सुधरा है। हेरिटेज से स्मार्टनेस की ओर गतिमान इण्डिया, शाइनिंग हेतु स्वच्छता मिशन में लगा है। इन्हीं सब का असर भारतीय कार्य संस्कृति पर भी देखने को मिल रहा है जिसका शोधपरक उल्लेख अग्रांकित है।वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की पहचान एवं प्रतिष्ठा को लेकर गम्भीर चिंतन हो रहा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक दृष्टि से भारत की छवि में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इस विषय को दो दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है एक है- भारतीय ज्ञान मीमांसा जन्य वैदिक कालीन सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से, दूसरा-वर्तमान में गतिमान भूमण्डलीकरण के युग में भारतीय कार्य संस्कृति की दृष्टि से। उल्लेखनीय बात यह है कि                      ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’, ‘सबै-भूमि-गोपाल की’ एवं जय जगत का दर्शन भारतीय भूमि से उपजा ज्ञान है जो हजारों वर्ष बाद भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण के रूप में पश्चिमी राष्ट्रों से प्रचारित एवं प्रसारित हो रहा है और उससे हम परम प्रभावित हैं। प्राचीन विश्व के इतिहास इस बात का संकेत करते हैं कि साधारणतया ज्ञान एवं दर्शन के दो प्रमुख केन्द्र धुरी की भाँति वैश्विक ढांचा को गति दे रहे थे। प्रथम आर्यावर्त (भारत), द्वितीय यूनान। इस दृष्टि से प्राचीन काल में विश्व मंच पर भारत की वैदिक प्रतिष्ठा सिद्ध थी। भारत सिरमौर था। वेद को ज्ञान-विज्ञान का अभूतपूर्व कोष माना गया। अभूतपूर्व होने के कारण ही उसे अपौरूषेय कहा जाता है। वैदिक ज्ञान से हम वर्षों तक लाभान्वित होते रहे हैं परन्तु पिछले 1500 वर्षों के भारतीय इतिहास हमें इंगित करते हैं कि हमारे अन्दर एक ओर चिंतन की कमी हुई तो दूसरी ओर वासना की अधिकता हो गयी। कारण जो भी रहे हों पर यही असली चिंता की जड़ है। स्वयं के चिंतन में न्यूनता एवं वासना की अधिकता की वजह से हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर खिंचते चले गये, साथ ही कहीं न कहीं अन्य कारणों के साथ-साथ ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ के वर्तमान आर्थिक संस्करण भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण ने उक्त दोषों में और बढ़ोत्तरी कर दी। फलतः मानवीय मूल्यों में उल्लेखनीय गिरावट हुई, यद्यपि प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। अर्थ (धन) भी बढ़ा है, जीवन स्तर भी सुधरा है। हेरिटेज से स्मार्टनेस की ओर गतिमान इण्डिया, शाइनिंग हेतु स्वच्छता मिशन में लगा है। इन्हीं सब का असर भारतीय कार्य संस्कृति पर भी देखने को मिल रहा है जिसका शोधपरक उल्लेख अग्रांकित है। विश्व के महान् समाज वैज्ञानिक कार्ल माक्र्स ने हीगल के द्वन्द्ववाद से प्रभावित होकर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या की थी। हीगल और माक्र्स में मुख्य अन्तर यह था कि जहाँ हीगल अध्यात्मवाद को प्रमुख मानता था वहीं माक्र्स भौतिकवाद को। अपनी भौतिकवादी दृष्टि के मद्देनजर उसने ‘‘आधार एवं अधिसंरचना’’ का सिद्धान्त दिया था। अर्थात् जैसा आधार होगा वैसी ही अधिसंरचना भी होगी। यहाँ पर भारत की प्रतिष्ठा एवं गौरव रूपी वैचारिक एवं आर्थिक अधिसंरचना का विश्लेषण वेद के आधार पर किया जा सकता है। भारतीय समाज एवं संस्कृति का आधार वेद है और वेद की ऋचाओं में गर्भित मूल्य जो आज भी हमारी संस्कृति एवं समाज का अंग है उसे हम अधिसंरचना या समाज का ताना बाना कह सकते हैं। वेद भारतीय समाज रूपी वृक्ष की जड़ हैं, सनातन धर्म तना है, विविध दर्शन, पुराण, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद् एवं स्मृतियाँ शाखाएँ हैं और सहिष्णुता, समन्वय, सद्भाव, समरसता, सह-अस्तित्व, साहचर्य, नैतिकता, अनुशासन, सत्य, अहिंसा, सत्व परम्परा और सामंजस्य आदि वृक्ष के पुष्प और फल हैं जो भारत की पहचान भी है और धरोहर भी। अतः हम यहाँ पर कह सकते हैं कि जब तक समाज एवं संस्कृति को वेद का आधार प्रदान है तब तक भारत की प्रतिष्ठा और गौरव पर आँच आने वाली नहीं है। यह वह संस्कृति है जो कि ‘‘हक्सले’’ के ‘जियो और जीने दो’ से दो कदम आगे बढ़कर ‘दूसरे के लिए जियो’ में विश्वास करती है। हमारी इसी उदारता के कारण तमाम वैश्विक शक्तियाँ हमारे ऊपर शासन स्थापित करती रही हैं परन्तु उन सभी शक्तियों में एक बात तो आम थी वह यह कि सभी मानती थीं कि भारत का आधार वेद हैं जो कि दुनिया के सभी विज्ञानों से आगे हैं और उसमें विश्व गुरु बनने की क्षमता है। आपको याद होगा शिकागो का वह धर्म संसद जिसमें भारतीय प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानन्द जी ने वेद को सभी धर्मग्रन्थों का आधार मानते हुए शून्य पर सम्भाषण दिया था और भारत को विश्व गुरु की प्रतिष्ठा के रूप में स्थापित किया था। हालांकि यह सच है कि हमारी उदारता एवं समन्वयवादी नीति कभी-कभी स्वयं के बर्बादी का कारण बनती है नहीं तो लक्ष्मण को यह नहीं कहना पड़ता कि- ‘जो जितना मीठा होता है वह अपना नाश करता है, देखे तो मीठे गन्ने को कोल्हू में पेरा जाता है।’ बहरहाल हमारे समाज एवं संस्कृति की मिठास हमारी पहचान भी है और मान भी है। हाँ, पर आज भी सब कुछ वैसा ही चल रहा है जैसा कि वेदों में समाज के लिए निर्देश है जवाब होगा-नहीं। जी हाँ आज 21वीं सदी का भारत अपनी प्रतिष्ठा और गौरव के लिए संघर्ष कर रहा है। हम अभी भी यू0एन0ओ0 के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। भारत विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश है, तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, दूसरा जनसंख्या वाला देश है, विश्व का प्रथम युवा जनसंख्या वाला देश है परन्तु भारत विश्व गुरु अपने वेद-विज्ञान, पुराण, धर्मशास्त्र एवं दर्शनों के आधार पर है। भारत की प्रतिष्ठा एवं भारत का गौरव उक्त धर्मात्म एवं वेद-विज्ञानों पर आश्रित रहा है परन्तु आज 21वीं सदी में वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के युग में भारत की प्रतिष्ठा और कैसे सुदृढ़ हो यह एक प्रश्न है। उल्लेखनीय है कि भारत की सम्पूर्ण जनसंख्या की लगभग 65 प्रतिशत आबादी युवा वर्ग की है जिसे लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अत्यधिक उत्साहित हैं क्योंकि उनका मानना है कि यही युवा भारत की प्रतिष्ठा एवं गौरव को विश्व पटल पर स्थापित कर सकते हैं। निश्चित रूप से कोई भी देश अपने नागरिकों के मात्रात्मक अथवा गुणात्मक गुणों के कारण जाना जाता है। अतः भारत को भी अपने युवाजनों पर गर्व होना चाहिए। भारत बौद्धिक रूप से विश्व में स्थापित हो रहा है जो आज के भूमण्डलीकरण के युग में भी ब्रेन-ड्रेन एवं ग्रेन-गेन के रूप में दिखता है परन्तु अभी भी राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, चिकित्सा, सैन्य, खेल एवं तकनीक आदि के क्षेत्र में हमें अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करनी है।  इन सभी क्षेत्रों में भारत की प्रतिष्ठा आसान नहीं है कोशिश ठीक है परन्तु इसमें गति प्रदान करने के लिए भारतीय नागरिकों को भारत के वैदिक इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति के अनुसार उच्चीकृत होना पड़ेगा। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से कहीं कम तो कहीं ज्यादा मैंने ऐसा अनुभव किया है कि भारतीय नागरिकों में वैदिक संस्कृति से सरोकार बहुत कम हो गया, जिससे उनमें कुछ जरूरी गुणों का पतन दिखाई पड़ता है। नागरिकों के संदर्भ में मेरी कुछ चिन्ताएँ हैं जिसे मैं निम्नलिखित प्रकार से व्याख्यायित कर रहा हूँ और इस शोध पत्र के माध्यम से युवा शक्ति फिर से जागृत हो, ऐसी मैं अपेक्षा करता हूँं। मेरी चिन्ताएँ नागरिकों में अनुशासन, अनुशीलन और अनुसंधान की कमी को लेकर हैं जिसे इस प्रकार से दूर किया जा सकता है। 1- अनुशासन 1- दिनचर्या में2- भोजन में3- शयन मेंस्वास्थ्यनागरिक 2- अनुशीलन 1- बुजुर्गों का2- गुरु एवं विद्वानों का3- वेदादि साहित्यों काअनुभव3- अनुसंधान 1- समाज का2- कृषि का3- चिकित्सा एवं विज्ञान का विकास इन पहलुओं पर गम्भीर चिंतन एवं कार्य होगा तो निश्चित रूप से अच्छा स्वास्थ्य होगा, अच्छे स्वास्थ्य से ही अच्छी जानकारी, ज्ञान और कार्य होगा और अच्छा ज्ञान होगा तभी तो अच्छा अनुसंधान होगा जो कि विश्व के लिए परम उपयोगी, क्रान्तिकारी, भारत की प्रतिष्ठा एवं गौरव प्रदाता होगा। इसी समन्वित कार्य का नाम विकास है जो आज का नेतृत्व भी चाहता है। नागरिकों के अनुशासन, अनुशीलन तथा अनुसंधान के लिए वेद में अनेक बार सद्विचार प्रकट किए गए हैं जिसके गहन अवगाहन की आवश्यकता है। तद्नुसार अपनी कार्य संस्कृति में भी बदलाव अपेक्षित है। हमारा कत्र्तव्य है कि हम स्वयम् उन्नत होकर विश्व को उन्नत करें। इसके लिए हम अपने चरित्र को उच्च एवं विश्व को भी आर्य बनाएँ, क्योंकि अनुशासन पूर्वक रहना अत्यावश्यक है। ये सन्देश वेदों में स्थान-स्थान पर परिलक्षित होता है- ‘‘इन्द्रं वर्धन्तो, कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः।।’’1 राष्ट्र के प्रत्येक मानव को आत्महित के साथ ही विश्व हित का भी चिन्तन करना चाहिए। भारतीय नागरिकों में यह भावना कूट-कूट कर भरी है, क्योंकि हमें अनुशासित जीवन जीने के लिए वेद ही आदेशित करते हैं। अनुशासन और विश्व हित की भावना का  केन्द्र वैदिक साहित्य ही है जिसका अनुशीलन कर हम जगत गुरु बन सकते हैं। ये सदाचार ही वैश्विक प्रतिष्ठा की स्थापना में महतीय भूमिका का निर्वहन करते हैं- ‘‘विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव।।’’2 हे विश्व के उत्पादक देव! आप हमारे सारे दुर्गुणों को दूर कीजिए और जो कल्याणकारी गुण हों उनको हमें दीजिए। इसमें भारतीय संस्कृति झलकती है। संस्कृति में संस्कार, परिष्कार और संशोधन होता है। संस्कृति बिल्कुल कृषि की भाँति होती है। अथर्ववेद के ऋषि का कथन है कि अपने माता-पिता के कल्याण के साथ ही विश्व का भी कल्याण हो ऐसे भाव किसी अन्य राष्ट्र में दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। विश्व हित के लिए चिन्तन-मनन एवं व्यवहार हमारी प्रतिष्ठा को स्थापित करता है- ‘‘स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु, स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः। विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु, ज्योगेव दृशेम सूर्यम्।।’’3 हमारे माता-पिता, गायों एवं समग्र विश्व का कल्याण हो। हम सबके लिए सभी ऐश्वर्य और उत्तम ज्ञान प्राप्त हो, हम सभी विश्व निवासी नागरिक दीर्घायु प्राप्त करें। इस मंत्र में अपने साथ ही साथ विश्व के कल्याण एवं गायों के कल्याण की कामना प्रस्फुटित होती है जो हमें वैश्विक प्रतिष्ठा अर्जित कराती है। इन्हीं सद् आदर्शों से हमारी कार्य संस्कृति भी बनती है। जब हम वेदादि साहित्यों से विरत होते हैं तो हमारी कार्य संस्कृति में भी गिरावट आती है।भारत की कार्य संस्कृति में निश्चित रूप से बदलाव देखने को मिल रहा है परन्तु उक्त बदलाव की दिशा में भारत विकास के पथ पर अग्रसर है अथवा विनाश की पूर्व पीठिका तैयार हो रही है यह तो समय ही तय करेगा। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि आज वैश्वीकरण के युग में, विकास की आपा-           धापी में व्यक्ति, व्यक्ति को रौंद रहा है। वैश्विक मंचो पर चर्चा चाहे जितनी आदर्शवादी हो पर सच यह है कि गरीबी मिटाने के बजाय गरीबों को मिटाने का षड्यन्त्र चल रहा है। तथाकथिक विकास की नकली होड़ में कृषि योग्य भूमि  सिमट कर छोटी हो रही है। विकास की वर्तमान भारतीय स्थिति यह है कि  जहाँ एक वर्ग पंच-सितारा होटलों में जीने लगा है, वहीं दूसरा दाने-दाने को मोहताज है। कार्य संस्कृति एवं प्रतियोगी विकास ने ऐसी र्खाइं पैदा कर दी कि आभिजात्य वर्ग के लोग  अपने बच्चे को कान्वेंट में दीक्षित कर रहे है तो गाँव का गरीब स्कूली शिक्षा से भी वंचित है। भारत सहित विश्व के तमाम अल्पविकसित एवं विकासशील देश आस्था एवं सिद्धान्तों की गठरी लादे अभावों, संत्रासों के साथ दो जून की रोटी के जुगाड़ में लगा है वहीं कार्य संस्कृति एवं विकास का पाठ पढ़ाने वाले विकसित राष्ट्र पैसा पानी की तरह बहाकर हबस एवं वासना को गले लगा रहे हैं और गम्भीर बीमारी के शिकार है।वैश्वीकरण एवं भूमण्डलीकरण एक बहुआयामी खुली प्रतियोगिताजन्य संवेदनहीन प्रक्रिया है जिसमें कथित भौतिक विकास की आपाधापी में नैतिक मूल्य कहीं खो से गये हैं। वैश्वीकरण के इस पदार्थगत होड़ में मानवीय पहलू के जिस पक्ष पर गहन एवं व्यापक प्रभाव पड़ा है, वह है- कार्य करने की संस्कृति। कार्य-संस्कृति से वस्तुतः व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र की पहचान होती है। अपने कार्य संस्कृति के कारण ही भारत की अपनी अलग पहचान रही है, जिसके मूल में हम कर्म की प्रधानता को महत्व देते थे कर्मगत फल की चिन्ता किए बगैर। यथा- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुमा ते सगेऽस्तवकमणि।।4 यहाँ पर हम भारत की कार्य संस्कृति को 3 वर्गों में विभाजित करते हैं जिस पर वैश्वीकरण के प्रभाव का विस्तृत उल्लेख किया जायेगा-1. शासन एवं प्रशासन की कार्य संस्कृति।2. निजी क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकारी एवं कर्मचारियों की कार्य संस्कृति।3. आम जनमानस की कार्य संस्कृति ।1. शासन एवं प्रशासन की कार्य संस्कृति – शासन एवं प्रशासन लोकतंत्र में कार्यपालिका के रीढ़ हैं। वस्तुतः कार्यपालिका के दो भाग हैं, एक है- राजनीतिक व्यक्तियों का वह समूह जो लोकप्रियता के         आधार पर जनता के द्वारा नियत समय के लिए चुना जाता है और शासन के लिए प्रत्यक्षतः जिम्मेदार होता है। वस्तुतः भारत जैसे संसदीय शासन प्रणाली में यह राजनेता कार्यपालिका के अंग तो होते ही हैं साथ में विधेयक निर्माण में भी इनकी भूमिका अहम होती है। शासक वर्ग की इन समूहों की कार्यशैली सर्वथा भिन्न एवं जनभावनाओं से खलने वाली होती है। वहीं कार्यपालिका का दूसरा हिस्सा वह है जिसमें योग्यता के आधार पर चयनित होने वाले प्रशासक वर्ग का अधिकारी तन्त्र होता है जो विधियों के क्रियान्वयन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है। इनकी सेवा स्थायी होती है स्थिर होती है। इनकी कार्यशैली शासक वर्ग से भिन्न विधिक एवं तार्किक रहती है। वास्तव में ये दोनों वर्ग सरकार के महत्वपूर्ण अंग होते हैं। जहाँ तक राजनीतिज्ञ एवं प्रशासक की कार्यसंस्कृति का प्रश्न है तो दोनों में पर्याप्त भिन्नता दिखाई देती है। जैसे-राजनीतिज्ञ लोकमत से सीधे जुड़ा रहता है। अतः वह अपने वोट बैंक के हिसाब-किताब से काम करने का आदी होता है जबकि प्रशासक को उससे कोई लेना-देना नहीं होता। प्रशासक तथ्यों एवं तकनीकी आंकड़ों के आधार पर कार्य करता है। शासक प्रायः दलगत भावना से कार्य करता है जबकि प्रशासक दलगत भावना से परे होता है। शासक अधिकतर निर्णय करते हैं जबकि प्रशासक           अधिकतर परामर्श से कार्य करते हैं। परन्तु आज वैश्वीकरण के युग में दु्रतगामी प्रशासनिक क्रिया-कलापों ने इनके बीच की दूरी काफी न्यून कर दी है। आज प्रशासन का नीति निर्धारण में सक्रिय भागीदारी हो चुकी है। प्रशासक ही मंत्रियों के समक्ष आवश्यक तथ्य एवं आंकड़े एकत्रित करके रखते हैं। इन्हीं के आधार पर मंत्री नीति निर्धारित करता है। वर्तमान समय में प्रदत्त व्यवस्थान भी प्रशासकों की भूमिका को अहम बनाते हैं। अत्यधिक कार्यभार, कानूनों की जटिलता तथा आपातकालीन स्थिति का सामना करने के लिए अधिकांश बार सदन विधेयकों की केवल रूपरेखा तैयार कर देती है। उन्हें प्रशासनिक तन्त्र ही विस्तृत रूप देता है। प्रदत्त व्यवस्थापन की सम्पूर्ण धारणा शासन एवं प्रशासन के विभाजन को अर्थहीन सिद्ध कर दिया है। साथ ही राजनीतिज्ञों की व्यस्तता भी प्रशासकों के कार्यभार पर अतिशय बोझ बनकर उभर रही है। उक्त संदर्भ कहीं न कहीं शासन-प्रशासन के कार्य व्यवहार के सैद्धान्तिक विमर्श की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। परन्तु 21वीं सदी के भारत में इसका व्यावहारिक पक्ष बहुत अच्छा नहीं है। जहाँ शासक एवं प्रशासक की कार्यसंस्कृति में अतिशय भिन्नता देखने को मिली है। वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया ने निश्चित रूप से सरकार के इन अंगों को प्रभावित किया है। विकास की गति बढ़ी है। कार्य की भी गति तीव्र हुई है। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि जो विकास समाज के धरातल पर दिखता है उससे कहीं ज्यादा विकास स्वयं मंत्री एवं अफसर का दिखता है। प्रायः सभी की सम्पत्ति-बेनामी हो या स्वयं के नाम, आय से अधिक होती है। पहले कार्य को टाल-मटोल, लेट-लतीफी एवं लटकाने, भटकाने की संस्कृति थी जिसे लालफीताशाही के रूप में देखा जा सकता है। उदारीकरण के बाद भारत में कार्य तीव्रगति से हो रहा है। अन्तर केवल एक दिखाई पड़ता है पहले शासक एवं प्रशासक कार्य को लटकाने, अटकाने एवं भटकाने के आधार पर रिश्वत लेता था आज अधिक से अधिक कार्य करवाकर रिश्वत लेता है। आज भारत में आधारभूत संरचना से संबंधित फाइलें इन्हीं सूत्रों के टेबलों से होकर गुजरती हैं इसके बाद स्टाफ के पास पहुँचती हैं। स्टाफ भी प्रायः फाइलों को गति देने के लिए कुछ अलग से इच्छा रखता है जो लोग उनकी व्यवस्था में उपयुक्त बैठते हैं प्रायः उनका कार्य तेज गति से होता है अन्यथा कार्य अपने रूढ़िवादी रतार से चलता है।2. निजी क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकारी एवं कर्मचारी की कार्य संस्कृति-किसी भी देश के कार्यालयों की कार्यसंस्कृति वहाँ पर संचालित  अर्थव्यवस्था से सीधे प्रभावित रहती है। जैसे कि पूँजीवादी अथवा उदारवादी अर्थव्यवस्था की कार्यसंस्कृति समाजवादी अथवा साम्यवादी अर्थव्यवस्था की कार्यसंस्कृति से सर्वथा भिन्न होती है। आजाद भारत ने इस देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था को रखा जिसका अर्थ था कुछ संस्थाओं का निजीकरण एवं कुछ संख्याओं का राष्ट्रीयकरण। परन्तु सोवियत संघ की खण्डित अर्थव्यवस्था से सीख लेते हुए भारत की नरसिम्हाराव की सरकार ने उदारीकृत अर्थव्यवस्था को               अधिकाधिक महत्व प्रदान कर नये भारत के निर्माण में एक ऐतिहासिक कदम उठाया। तभी से उत्तरोत्तर भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की गति दु्रतगामी हो गयी और साथ ही लोगों की कार्य करने की संस्कृति भी बदल गयी। 1991 के बाद भारत में अधिकाधिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रवेश प्रारम्भ हुआ। भारत सरकार विनिवेशीकरण की प्रक्रिया के तहत अपने तमाम उपक्रमों को निजी हाथों में देना प्रारम्भ कर दिया। अपरिहार्य सेवाओं को छोड़ बाकी सेवाओं में संविदा कर्मचारी एवं आउट सोर्सिंग की मांग बढ़ने लगी। सरकारी सेवाओं में स्थिरता दिखाई देने लगी। ऐसी व्यवस्था में निजी संस्था अधिकाधिक लाभ की अभिलाषा में अत्यधिक चुस्ती से कार्य करने वाले एवं यथोचित परिणाम देने वाले अधिकारी एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करता है जिनकी सेवा शर्तें स्थायी न होकर लक्ष्य की शर्तों से जुड़ी रहती है। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा एवं कौशल के चलते कई बार कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को निकाल देती है तो कई बार कर्मचारी स्वयं बड़े पैकेज की लालच में कम्पनी छोड़ जाता है। राजनीति विज्ञान के जनक अरस्तू ने कार्य करने की प्रवृत्ति के साथ ही अवकाश पर भी विशेष बल दिया। दास प्रथा को इसी दृष्टिकोण से उपयुक्त माना था। परन्तु यहाँ पर उल्लेखनीय है कि प्राइवेट सेक्टर में कार्य करने वाले व्यक्ति को न तो सेवा की सुरक्षा है, न ही उपयुक्त अवकाश है। साथ में लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु प्रतिस्पर्धी बाजारोन्मुख वातावरण में कार्य की अधिकता है। वह व्यक्ति मशीन का एक पार्ट बनकर कार्य कर रहा है, जीवन के मूल्य उसके जीवन से दूर हो गये हैं। अधिकारी एवं कर्मचारी में जब तक कुशलता है तब तक वह उपयोगी है अन्यथा की स्थिति में वह सड़क पर है। माना कि कुछ कुशल लोगों को सरकारी कर्मचारी से ज्यादा रूपया मिलता है परन्तु सुकून नहीं मिलता। कर्मचारी वैश्वीकरण के इस युग में कार्य की अधिकता से कराह रहा है। पारिवारिक जीवन अस्त-व्यस्त है। पति मुम्बई में है, पत्नी चेन्नई में है तो माँ-बाप बंगलौर में है। क्या है यह जिन्दगी? कार्य की यह संस्कृति दाम्पत्य जीवन को ऐसा बना दिया है कि लोग सन्तानोत्पत्ति से विमुख हो रहे हैं या एक बच्चे की इच्छा रखते हैं। संस्थान स्वागत पटल के लिए खूबसूरत लड़कियों को नौकरी देते हैं और ये लड़कियाँ सौन्दर्य प्रसाधन से लिपटी हुई अनवरत् सेवा देती है और आराम के लिए नींद की गोलियां खाती हैं। मेट्रोपोलिटन सिटीज में वैश्वीकरण के इस प्रभाव को ज्यादा देखा जा सकता है। जहाँ पर अर्ह-निश कार्य ही कार्य है लोग भाग रहे हैं। पता बताने भर का प्रायः किसी को फुर्सत नहीं है। समय कम हो गया है कार्य अधिक हो गया है। फलतः लोग हाईपरटेंशन, बी0पी0 एवं शुगर के मरीज हो रहे हैं। युवा भारत युवा तो हैं पर उसके अंदर चिन्तन की कमी, संतोष की कमी, एवं बात को बर्दाश्त करने की क्षमता की कमी प्रायः देखने को मिल रही है। इसीलिए मैंने आलेख की भूमिका में ही कहा था मानवीय मूल्यों में गिरावट हुई है, चिंतन कम हुआ है, वासना बढ़ी है। चिन्ता बढ़ी है। मैं स्वयं वर्तमान आधुनिक भारत में दासप्रथा को अनपयुक्त मानता हूँ परन्तु साथ ही शरीर को आराम, परिवार एवं समाज के लिए उपयुक्त समय हेतु सेवा में समुचित अवकाश या छुट्टी का होना परमावश्यक मानता हूँ।3. आम जनमानस की कार्यसंस्कृति- कार्य करना व्यक्ति का स्वभाव है। व्यक्ति एक मुख तथा दो हाथ लेकर पैदा हुआ फिर भी कुछ लोग अपने कार्य से अत्यधिक संसाधन के मालिक बन बैठे वहीं दूसरे अपना पेट भी नहीं पाल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग प्रायः खेती से जुड़े हुए हैं। कृषि इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पहले किसान परम्परागत खेती का कार्य करता था। यथा- रबी, खरीफ एवं जायद की फसलें उगाने में श्रम लगता था। बाकी समय में स्वयं द्वारा उपजाये अन्न को खाता था। समाज की सेवा करता था और आराम करता था। खेती करने वालों की अच्छी हैसियत होती थी- ‘‘उत्तम खेती मध्यम बान, नीच चाकरी भीख समान’’ व्यवसाय और नौकरी को किसान से नीचे माना जाता था। आचार्य विनोबा भावे ने स्वयं खेती करना साक्षात् ब्रह्म की उपासना करने के समान माना है।’’5 परन्तु वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया ने व्यावसायिक खेती को बल दिया। अब किसान परम्परागत खेती के साथ-साथ तम्बाकू, नील, पिपरमिण्ट, अफीम आदि उगाने लगा है। पूरे वर्ष भर वह व्यस्त रहता है और धनोपार्जन भी करता है। खेती-किसानी में प्रायः पुरुष वर्ग ही कार्य करता है। महिलाएँ घर देखती हैं। पर 1991 के बाद वैज्ञानिक खेती की दिशा में प्रायः महिलाएँ भी कार्य कर रही है। ग्रामीण जनमानस की कार्य संस्कृति में प्रायः 3 हिस्सा देखने को मिलता है, एक हिस्सा वे कार्य पर फोकस करते हैं दूसरा हिस्सा समाज एवं ग्राम की सेवा में समर्पित रहता है तीसरा हिस्सा वे आराम करते हैं। यद्यपि आज कार्य संस्कृति में बदलाव आया है परन्तु फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी बहुत है, नगरीय एवं महानगरीय क्षेत्रों में रूपये एवं संसाधनों का संकेन्द्रण हो गया है। लगता है कि नगरीय एवं महानगरीय कार्य संस्कृति में तेजी से बदलाव आया है तभी तो लोग गाँव से नगरों महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।  नगरीय कार्य संस्कृति में भी वैश्वीकरण का प्रभाव देखने को मिल रहा है। नगर व्यवसाय एवं व्यापार का केन्द्र बनता जा रहा है। महिला-पुरुष दोनों कार्य करते हैं। साथ-साथ सामुदायिक सेवा देने में भी दोनों तन्मयता से कार्य करते दिख रहे हैं। जागरूकता बढ़ी है। प्रायः महिलाएँ घर देखने के साथ-साथ सरकारी सेवा भी करती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखल छोटे-छोटे नगरों में भी पहुँच चुकी है। लोग शान-शौकत से जीने के आदी हो चुके हैं। फलतः किसी एक के कमाने से काम नहीं चलता। ऐसे में दोनों कार्य पर निकलते हैं जिसमें से एक कठिन परिश्रम करता तो दूसरा सहूलियत भरा कार्य करता है। ऐसी सोच मैने देखी है कि एक सरकारी सेवा चाहता है। दूसरा प्राइवेट सेक्टर में जाना चाहता है। भारत का मध्यम आय वर्ग वाले लोग ही प्रायः नगरों एवं जनपद मुख्यालयों में रहते हैं। यहाँ पर सभी वर्ग के लोग बसने के इच्छुक रहते हैं। जहाँ तक महानगरीय कार्य संस्कृति की बात है तो इसमें समाज का अभिजात्य वर्ग रहता है और उनके कामगार एवं सेवादार के रूप में गाँव से गया हुआ श्रमिक रहता है। महानगरों में प्रायः दो ही वर्ग होते हैं, मध्यम वर्ग प्रायः महानगर से दूर ही रहना चाहता है। महानगरों में बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मालिक नेता, फिल्म इण्डस्ट्रीज से जुड़े लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक, वरिष्ठ अधिकारी आदि रहते हैं। वे प्रायः पंचसितारा होटलों में जीने के आदी होते हैं। वहीं उनकी सेवा में लगा कामगार (मजदूर) वहीं पर झोपड़ी-झुग्गियों में रहने को मजबूर है। उल्लेखनीय बात यह है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आफिस में कार्य करने वाले अधिकारी-कर्मचारी कार्य की अधिकता से कराह रहे होते हैं और कथित अभिजात्य के रूप में जीने को मजबूर रहते हैं। वास्तविक अभिजात्यवर्ग स्वयं कार्य नहीं करता बल्कि मजदूरों से करवाता है और मजदूरी से ज्यादा काम लेता है वही अतिरिक्त मूल्य के रूप में पूँजी एकत्रित होकर मालिक को और धनी बना देती है। वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के प्रभाव से भारतीय कार्य संस्कृति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। बावजूद इसके अभी भी हम कार्य संस्कृति में पाश्चात्य देशों से बहुत पीछे हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं में देख सकते हैं-(1) समय की महत्ता- पाश्चात्य देशों में लोग कार्यालय समय से पहुँचते हैं और निर्धारित समय के बाद ही आते हैं जबकि भारत में इसका उल्लंघन होता है।(2) सहकर्मियों में संबंध-पाश्चात्य देशों में व्यावसायिक संबंध को लोग तरजीह देते हैं परन्तु भारत में संबंधों को तिलांजलि देते हैं।(3) अवकाश की स्थिति-पाश्चात्य देशों के कार्यालयों में प्रायः 30 मिनट भोजन अवकाश 15 मिनट चाय के लिए होता है। यहाँ पर लगभग एक घण्टा भोजन, 30 मिनट चाय के लिए होता है।(4) कार्यालयी पर्यावरण-पाश्चात्य देशों में शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यालयी वातावरण होता है परन्तु यहाँ पर प्रायः नहीं होता।(5) पदसोपान-पाश्चात्य देशों में बड़े पद पर कोई कम उम्र का व्यक्ति या कनिष्ठ है तो लोग आदर के साथ उसके आदेश को मानते हैं परन्तु यहाँ लोग प्रायः वरिष्ठता के अहं से ग्रसित होते हैं।उल्लेखनीय है कि प्रत्येक व्यक्ति एक मुह एवं दो हाथ ले पैदा होता है। कार्य करना उसका स्वाभाविक लक्षण है परन्तु एक वर्ग कार्य करते हुए अत्यधिक संसाधन का मालिक बन जाता है और दूसरा कार्य की अधिकता से कराह रहा है। तो तीसरा अपना पेट भी नहीं पाल पा रहा है। सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी को नौकरी की सुरक्षा है अतः उनकी कार्य संस्कृति अत्यधिक धीमी है वहीं प्राइवेट सेक्टर के लोग अत्यधिक कार्य के दबाव से परेशान है हालाँकि उनके मालिक तीव्रगति से पूँजीपति बन रहे है। अन्त में भारत की आम जनता एवं किसान ‘जाहे विधि रखे राम ताहे विधि रहिए’ की संस्कृति में जी रहे है। यह सच है कि 1990 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी है और वर्तमान में भारत विश्व के मानचित्र पर राजनीतिक, आर्थिक एवं सामरिक दृष्टि से मजबूती के साथ उभरा है। ख्याति बढ़ी है, पहचान मिली है परन्तु इस चक्कर में हम कहीं अपने ज्ञान दर्शन एवं जीवन दर्शन से न भटक जाएँ इसका चिंतन, मनन अति आवश्यक है। चिंतन का स्वभाव निर्माणशील एवं सकारात्मक होता है, अतः सम्यक् चिंतन होगा तो अनुशासन भी आयेगा, अनुशीलन की भी प्रतिष्ठा होगी और अनुसंधान भी होगा। कार्य संस्कृति में जवाबदेही एवं सकारात्मक बदलाव भी आयेगा और वासना का रोग धीरे-धीरे समाज से दूर हो जा जायेगा और भारत की विशाल युवा शक्ति में भटकाव नहीं होगा। भारत का समग्र एवं धारणीय विकास होगा। यदि युवाशक्ति में एक बार गुणात्मक बदलाव आ गया तो निश्चित रूप से भारत विश्व का सभी क्षेत्रों में नेतृत्व करेगा और दिशा दिखायेगा। संदर्भ सूची1. ऋग्वेद-9.63.52. यजुर्वेद- 30.33. अथर्ववेद- 1.31.44. श्रीमद्भगवद्गीता 2/475. चोलकर, राग- ‘विनोबा-विचार-दोहन’ परंधाम प्रकाशन, एन0बी0टी0, नई दिल्ली, पृ0 160

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