ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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संयुक्त राष्ट्र संघ की व्यवहारिक उपयोगिता

डा0 प्रवीण कुमार
एसोसिएट प्रोफेसर
राजनीतिक विज्ञान विभाग
डी0ए0वी0 काॅलिज, बुलन्दशहर

 पिछले लगभग 150 वर्षाें में अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के क्षेत्र में भारी प्रगति हुई है। अनेक असफलताओं के बावजूद इस और क्रमशः विकास होता रहा है। बीसवीं सदी में राष्ट्रसंघ और संयुक्त राष्ट्रसंघ के रूप में तो मानों अन्तर्राष्ट्रीय सरकार की नींव ही पड़ चुकी है। जहाँ राष्ट्रसंघ केवल इतिहास का विषय मात्र है वहाँ संयुक्त राष्ट्र हमारे सामने अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का जीता-जागता रूप विद्यमान है। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई तो उस समय एक अत्यन्त सुखद भविष्य की कल्पना की गयी। चार्टर को अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की उन बुराइयों से दूर रखने का प्रयत्न किया गया जिनके कारण पुराना राष्ट्रसंघ असफल हो गया था और नये विश्व-संगठन को पहले की अपेक्षा एक उत्कृष्ट और शक्तिशाली संगठन बनाया गया। ऐसा लगता था कि संयुक्त राष्ट के रूप में एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन मात्र ही नहीं वरन शांति और सुरक्षा की स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सरकार की स्थापना भी होने जा रही है। परिणामस्वरू संसार के लोगों में यह विश्वास होना स्वाभाविक था कि नया विश्व-संगठन संसार में स्थायी शांति और समृद्धि लाने में सफल होगा। परन्तु वर्तमान युग में संयुक्त राष्ट्रसंघ का प्रबलतम समर्थक भी इस बात को स्वीकार करेगा कि संयुक्त राष्ट्र से जो आशाएँ की गयी थीं वे पूरी नहीं हो सकीं। यह मानवता को भय से मुक्ति नहीं दिला पाया है। महायुद्ध का भय पूर्ववत् बना हुआ है और संघ आधुनिक समस्याओं को सुलझााने में प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा है। जैसा कि शूमाँ ने लिखा हैः ‘‘एक मध्यस्थ अथवा समझौते की बातचीत के न्यायपीठ के रूप में उनका अभिनय युद्ध में लड़ने वाली सेनाओं के समकक्ष ही है। एक नैतिक अर्थ में भी आक्रमणों से पीड़ित लोगों के रखक के रूप में भी संयुक्त राष्ट्र का अभिनय आपत्तिजनक अपयोगिता का ही रहा है। शांति कराने वाले के रूप में उनका अभिनय अदृश्य ही है।’’ द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्ति के शीघ्र ही बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ ‘शीतलयुद्ध के भँवरजाल में फँस गया। कहा जाता है कि उसका नाम ‘संयुक्त राष्ट’ एक झूठा दिखावा, एक व्यंग मात्र रह गया। यह संयुक्त राष्ट्रों के बदले में विभाजित राष्ट्रों का संघ बन गया। बेटविच और मार्टिन ने लिखा भी हैः ‘‘जिस चीज की रचना विश्व शांति के एक यंत्र के रूप में की गयी थी वह विश्व संघषर्् का एक मंच सिद्ध हुई। सोवियत रूस और अमरीका के पारस्परिक संघर्ष के कारण वह निरस्त्रीकरण के क्षेत्र में नितांत असफल रहा। इसी के कारण बहुत दिनों तक वह साम्यवादी चीन को अपना सदस्य नहीं बना सका। वह चेकोस्लोवाकिया, हंगरी और तिब्बत पर साम्यवादी आक्रमण को नहीं रोक सका और न कश्मीर के मामले में आक्रान्ता को दंडित ही कर सका। दक्षिण अफ्रीका, वियतनाम, और बांगलादेश के मामले में इसकी भूमिका निदनीय ही रही है। इसके रहते हुए भी अनेक अवसरों पर दुर्बल पक्ष को न्याय नहीं मिल पाया है। राश्ट्रपति टन ने सुयुक्त राष्ट्रसंघ के कार्यकरण पर असन्तोष व्यक्त करते हुए कहा भी थ कि संयुक्त राष्ट्र अस्थायी अनतर्राष्ट्रीय शांति का आश्वासन नहीं दे सका, जिसके फलस्वरूप ‘‘संयुक्त राष्ट्रों के लोग अब भी आक्रमण की निरन्तर आशंका से पीड़ित हैं तथा आक्रमण के विरूद्ध तैयारी के व्यय-भार से दबे हुए हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस यंत्र की रचना काफी शोर-शराबे तथा उत्साह के साथ की गयी थी, इतने छोटे समय में उसकी असफलता की व्याख्या किस प्रकार की सकती है? शूमाँ के अनुसार ‘‘ इसके दो उत्तर प्रतीत होते हैं। इंजन की बनावट दोषपूर्ण है या इंजीनियरों में उसके चलाने की इच्छा व चतुराई की कमी है।’’ दोनों ही बाते सत्य है। अपने लगभग 50 वर्ष के जीवन में संयुक्त राष्ट्रसंघ को प्रत्येक महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्याें में प्रायः विफलता का सामना ही करना पड़ा है। इसकी विफलताओं को हम निम्लिखित ढंग से निरूपित कर सकते है। राष्ट्रों के बीच हथियार बन्दी की होड़ को रोकना संयुक्त राष्टसंघ का एक उद्देश्य है। चार्टर में इसीलिए निरस्त्रीकरण के उपबन्ध रखे गये हैं। परन्तु बहुत से प्रयत्नों के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस पग नहीं उठाया जा सकता है। संघ अभी तक इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों के बीच समझौता नहीं करा सका है। 15 जून, 1969 के अपने वार्षिक प्रतिवेदन में संघ के तत्कालीन महासचिव ऊथाँट ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के कार्याें पर निराशा ही व्यक्त की थी। उसे यह देखकर अशांति का अनुभव हो रहा था कि परमाणु शास्त्रों की समस्या आज भी अधर में लटकी हुई है। परमाणु शस्त्रों का परीक्षण होता जा रहा है। विश्व में सेना पर किया जाने वाला व्यय निरंतर रूप में बढ़ता जा रहा है। इनमें से सबसे अधिक भयानक बात परमाणु शस्त्रों  की अबाध गति से चलने वाली होड़ को रोकने में सफल नहीं हुआ। अब सन 1990 में सेवियत संघ और अमरीका ने अपने अधिकांश रासायनिक हथियारों को नष्ट करने पर सहमति की घोषणा की है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का मूल उद्देय अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाये रखना तथा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जहाँ कही भी सशस्त्र आक्रमण हो वहाँ सुरक्षा के लिए सामूहिक एवं प्रभावपूर्ण कार्रवाही करना है। परन्तु उस कार्य में संयुक्त राष्ट्रसंघ पूर्णतया असफल रहा है। यह ठीक है कि इसकी स्थापना से लेकर अब तक मानवता को तृतीय महायुद्ध का भीषण रूप देखने को नहीं मिला, परन्तु इसका पूरा श्रेय संयुक्त राष्ट्र को नहीं दिया जा सकता। यह इसलिए सम्भव है कि युद्धों को सीमित करने में महाशक्तियों का सामान्य हित रहा है अथवा उनमें से काई महायुद्ध का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं है। कश्मीर का प्रश्न रहा हो या अरब-इजरायल का, दक्षिण रोडेशिया का प्रश्न रहा हो या कोरिया का, विगत 50 वर्षाें में संयुक्त राष्ट्रसंघ किसी भी बड़ी समस्या का स्थायी हल निकालने में सफल नहीं हो सका है। प्रत्येक बड़े युद्ध के बाद उसने युद्ध-विराम कराने की भूमिका ही निभायी है। जुड़वाँ बच्चों की-सी उलझी हुई वियतनाम समस्या में तो वह यह भूमिका भी नहीं निभा सका इसके रहते हुए भी अनेक अवसरों पर दुर्बल पक्ष को न्याय नहीं मिल सका है। बांगला देश इसका ज्वलंत प्रमाण है। जम्रनी, कोरिया, वियतनाम जैसे संसार में संकअ पैदा करने वाले स्थलों की समस्याओं के समाधान में संयुक्त राष्टसंघ का योगदान उससे बिल्कुल भिन्न रहा है जिसकी संयुक्त राष्ट्रसंघ के            विधान-निर्माताओं के कल्पना की थी। विगत चार दशकों में क्षेत्रीय स्तर पर लगभग 150 छोटे-बड़े सैन्य संघर्ष हुए हैंः जैसे, भारत-चीन युद्ध, भारत-पाक युद्ध (तीन बार) अरब-इजारायल युद्ध (दो बार) इथियोपिया-सोमालिया संघर्ष, वियतनाम कम्पूचिया संघर्ष, ईरान-इराक युद्ध आदि। इनमें से अधिकांश का निपटारा वस्तुतः सम्बद्ध देशों की सीधी वार्ता या दूसरे की मध्यस्थता से हुआ है। उनमें संयुक्त राष्ट्र की या तो कोई भूमिका नहीं रही है या नगण्य रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के गत 50 वर्षाें के कार्यकाल में अनेक राष्ट्रों के संघ के चार्टर और उद्देश्यों का अतिक्रमण किया है, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों की अवहेलना की है। कुछ उदाहरणों द्वारा यह बात स्पष्ट हो जाएगी। संयुक्त राष्टसंघ के निर्माता मानव अधिकारों तथा मूल स्वतंत्रता में अधिक विश्वास रखते थे। इसलिए इनकी रक्षा के लिए घोषणा-पत्र 6-7 उपबन्ध बनाये गये तभी 10 दिसम्बर, 1948 को साधारण सभा द्वारामानव-अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकार किया गया। परन्तु दुःख की बात यह है कि कुद राज्यों ने चार्टर और घोषणा के शब्दों और भावनाओं की अवहेलना की। दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार ने उनका अतिक्रमण किया। वह भारतीय तथा अश्वेत जातियों के साथ प्रजातीय व्यवहार करके संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा उद्घोषित मौलिक मानवीय अधिकारों का उल्लंघन करती रही और संयुक्त राष्टसंघ उसको रोकने में विफल रहा। उसी तरह संयुक्त राष्ट्र बल्गेरिया, हंगरी, रूमानिया आदि देशों में मूल अधिकारों की अवहेलना को नहीं रोक सका। एच0फील्ट हैवीलैंड का कहना है कि संघ की महासभा तो केवल यह मालूम कर लेती है कि कहाँ-कहाँ पर मूल अधिकारों की अवहेलना हुई। इससे अधिक वह कुछ और नहीं कर पाती। कई अन्य राज्यों ने भी संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के विरूद्ध कार्य किया है। सन् 1956 में इंगलैंड और फ्रांस ने स्वेज पर आक्रमण करके संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणा-पत्र की उपेक्षा की थी। रूस ने महासभा के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसके द्वारा रूस को हंगरी के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप न करने के लिए कहा गया था। यद्यपि हंगरी संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है फिर भी उसने संयुक्त राष्ट्र के प्रेक्षको को अपने क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। कादर सरकार ने अपने देश में महासचिव का स्वागत करने की भी नम्रता नहीं दिखलाई। बिजर्टा संकट के उपरान्त जब महासचिव ने फ्रांसीसी सरकार से बातचीत करने की प्रार्थना की तो उसने महासचिव का पेरिस में स्वागत करने से इनकार कर दिया। संयुक्त राष्ट्र के आग्रह करने के बाद भी पुर्तगाल ने अपने उपनिवेशों को स्वतंत्रता नहीं दी थी। सन् 1967 के अरब-इजरायल संघर्ष में भी संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र का अपमान हुआं इस अपमान के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ से भी           अधिक संयुक्त राज्य अमरीका उत्तरदायी था। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बार-बार दक्षिण अफ्रीका की रंग भेद की नीति के विरूद्ध प्रस्ताव पारित किये किन्तु वहाँ काले लोगों पर अत्याचार उसी प्रकार होता रहा। उसके विरूद्ध आर्थिक प्रतिबन्धों के बावजूद उसका विदेशी व्यापार बढ़ता रहा। इस सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि संघ के चार्टर की अवहेलना की गयी है जिसके चलते संघ की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है तथा वह अपना कार्य सफलतापूर्वक नहीं कर पा रहा है। यह भी देखा गया है कि विश्व शक्तियों ने अनेक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझााने के लिए संघ के बजाय सीधे द्विपक्षीय परामर्श का साहारा लिया है। साल्ट-2 और हिन्द महासागर के विसैन्यीकरण पर अमरीका और सोवियत संघ सीधी बातचीत करते रहे। यह देखने में आया है कि महाशक्तियाँ अपने हितों और स्वार्थाें की पूर्ति के लिए सैद्धान्तिक विष्यों पर दृढ़, नहीं रहती। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों तथा अश्वेत जातियों के साथ जो प्रजातीय व्यवहार किया जाता रहा है उसमें उसे ब्रिटेन और अमरीका प्रोतसाहन देते रहे हैं। अमरीका और पश्चमी राष्ट्रों ने लैटिन अमरीका के प्रति जो अनुचित पक्ष लिया, उससे विश्व शांति को गहरा धक्का पहुँचा, वास्तव में संयुक्त राष्ट्र के कार्य गुटबन्दी पर आधारित है। ऐसा देखा जाता है कि किसी प्रश्न पर एक गुट का समस्त मत एक ही ओर पड़ता है। यह एक अनुचित प्रवृत्ति है। डाॅ0 ईवाट उसे खतरानक एवं अवांछनीय मानते है। यह भी देखने में आया है कि सदस्य-राष्ट्रों द्वारा विश्व संस्था का उपयोग अपने स्वार्थाें के लिए किया जाता है। संघ की महासभा तथा अन्य अंगों को अन्तर्राष्ट्रीय विवादों तथा मतभेदों को दूर करने के लिए प्रयोग में नहीं लाया जाता रहा है वरन् अपने गुट के समर्थको की संख्या बढ़ने के लिए प्रचार संस्था के रूप में किया जाता है। जैसा कि बेटविच तथा मार्टिन ने लिखा हैः ‘‘ महासभा और सुरक्षा परिषद् का प्रयोग विवादों को सुलझााने के लिए नहीं वरन् झगड़ों को बढ़ाने के लिए किया जाता है। ऐसे प्रचार के कारण महासीाा का अमूल्य समय ही नष्ट नहीं होता वरन् संसार की निगाहों में इस संस्था का महत्व भी कम हो जाता है। इसके कार्याें को गंभीरता से नहीं देखा जाता और आम जनता को इसकी सच्चाई और उपयोगिता में विश्वास नहीं रह पाता। महासभा के कार्याें की प्रभावशीलता इसलिए भी कम हो जाती है कि सदस्य-राज्यों के प्रमुख राजनीतिक उसकी बैठकों में उपस्थित होने की परवाह नहीं करते। महान् शक्तियों के प्रधान मंत्री और विदेश मंत्री इसकी बैठकों में उपस्थित होने में अपना समय नष्ट नहीं करते। परिणामस्वरूप साधारण राजनीतिज्ञ ही इसकी बैठकों में उपस्द्यिथत रहते हैं। इसके कारण महासभा की कार्रवाई अधिक प्रभावशाली नहीं हो पाती। यदि सदस्य सरकार के मंत्रिमंडल के सदस्य महासभा की बैठकों में भाग लेने लगे तो विश्व के लोग इसकी कार्रवाई में          अधिक रूचि लेने लगेंगे। श्री डोंगस ने कहा थाः ‘‘यह वह समय है जब कि सरकारें और व्यक्तिगत राजनीतिज्ञ अपने कार्याें में अधिक व्यक्त हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रतिष्ठा रखनी है तो यह आवश्यक है कि मंत्रिमंडल स्तर के प्रतिनिधि इसके सत्रों में उपस्थित हो, इसलिए नहीं कि प्रतिनिधि योग्य और अनुभवी हैं वरन् इसलिए कि ये प्रतिनिधि अपने-अपने देशों को निर्धारित करने के लिए उत्तरदायी है। वे ही अपने देश की नीति निर्धारित करते हैं।’’ न केवल महासभा वरन् सुरक्षा परिषद् जिसकी रचना प्रधानतः अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखने के लिए की गयी थी, अपने प्रधान उत्तरदायित्व का पालन करने में सफल नहीं हुई। निषेधाधिकार की व्यवस्था ने इसे पंगु बना दिया औरमहाशक्तियों के संघर्ष द्वारा यह पक्षाघातग्रस्त कर दिया गया है। इसके कारण सुरक्षा परिषद् की प्रतिष्ठा घटी है और जनता की दृष्टि में वह गिर गयी है। बहुत ही कम विषय अब सुरक्षा परिषद् को सौंपे जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के हिमायती राष्ट्र भी अपना विवाद सुरक्षा परिषद् नहीं ले जाना चाहते। सदस्यता के सम्बन्ध में भी संयुक्त राष्ट्रसंघ असफल रहा है। इसके अन्दर आपसी मतभेद इनता अधिक है कि अभी तक जर्मनी, कोरिया, वियतनाम आदि देश इसके सदस्य नहीं बन पाये हैं। संघ में इन राज्यों को अभी तक शामिल नहीं होना इसकी त्रृटियो का द्योतक है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की असफलता के दो प्रकार के कारण बतलाये जा सकते है-सांविधानिक तथा राजनीति अथवा मनोवैज्ञानिक। सांविधानिक तथा संगठनात्मक कारण: संयुक्त राष्ट्रसंघ की असफलता के लिए उसके    संविधान और संगठन को भी उत्तरदायी बतलाया जाता है। इसकी प्रमुख वैधानिक दुर्बलताओं का वर्णन नीचे दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का निर्माण संसार के राष्ट्रों की सरकारों ने संसार की जनता के नाम पर किया। वर्तमान प्रजातंत्र के युग की यह विशेषता है कि निर्णय तो कुद राजनीतिज्ञों के द्वारा लिये जाते हैं परन्तु नाम जनता का रहता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के विषय में भी यह सत्य है। फलस्वरूप राष्ट्रसंघ की भाँति संयुक्त राष्ट्रसंघ भी प्रधानतः सरकारों का ही संगठन है। उसे जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित करने का कोई अधिकार नहीं है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का आधार वही है जो पुराने राष्ट्रसंघ का था। यह आधार है राष्ट्रसंघ का था। यह आधार है राष्ट्रीय ‘संप्रभुता’ की अक्षुण्णता। इसमें भी राष्ट्रों की संप्रभुता सर्वाेंपरि है। इस दृष्टि से संयुक्त राष्टसंघ पुराने राष्टसंघ की प्रेतात्मा है। यह उस अनाथ की तरह है जो इधर-उधर से भीख माँगकर अपने को धनपति समझ लेता है। अन्तर्देशीय क्षेत्र में राष्ट्रीय संप्रभुता का अर्थ है विभिन्न देशों की सरकारों की स्वेच्छा। तत्त्वतः यह विभिन्न देशों की पृथक तथा प्रतिस्पर्धाजनक शक्ति है। अतः राष्ट्रीय संप्रभुता का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का विरोधी है। राष्ट्रीय संप्रभुता के विद्धान्त पर            आधिरित होने के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ केवल, चर्चा, वाद-विवाद तथा विवादों के शांतिपूर्ण हल के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय स्थल-मात्र बना हुआ है। इसके पास स्वयं भी का्रई ठोस शक्ति नहीं है, सिवा उन अधिकारों के जो सदस्य -राष्ट्रों ने उसे स्वेच्छा से प्रदान किये है। यद्यपि संयुक्त राष्ट्रसंघ के संगठन में राष्ट्रों की समानता का सिद्धान्त मान्य है तथापि, व्यवहार में यह व्यवस्था असमानता पर आधारित है। इसका प्रमाण यह है कि इसमें बड़े राज्यों और छोटे राज्यों का अन्त माना गया है। बड़े राज्यों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दी गयी है और निषेधाधिकार प्राप्त है। इस प्रकार यथार्थ में महाशक्तियों का ही बोलबाला हैं। यह बात छोटे राष्ट्रों को बहुत अखरती है। एक ओर चार्टर में जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुहाई दी गयी है वहाँ दूसरी ओर महाशक्तियों की मनमानी को बनाये रखा गया है। यह संयुक्त राष्ट्रसंघ के चार्टर में विद्यमान एक गंभीर विरोधाभास है। सदस्यता प्रदान करने का प्रश्न संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक बहुत बड़ी उलझन है। चार्टर के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता उन सभी शांति-प्रेमी राज्यों के लिए खुली है जो चार्टर में  दिये गये दायित्वों को पूरा करने की इच्छा और योग्यता रखते हों। किसी राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों में तभी शामिल किया जा सकता है जब सुरक्षा परिषद उसकी सिफाारिश करे और महासीाा उस सिफाारिश पर अपना निर्णय दे। सैद्धान्तिक दृष्टि से उसमें कोई दोष नहीं है, लेकिन राष्ट्रों की गुटबन्दी तथा उनकी राजनीति ने सदस्यता के सवाल को काफी उलझानपूणर््ा बना दिया है। सुरक्षा परषिद में सोवियत संघ तथा पश्चिमी राष्ट्र अपनी स्थिति सुदृढ़ करने हेतु अपने विरोधी राज्यों के प्रवेश का विरोध करते रहे हैं। इस प्रकार विरोधी गुटों की हठधार्मिता के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता विश्व के सभी देशों के लिए खुली हुई न हो तब ताकि संगठन विश्वव्यापाी नहीं बन सकेगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ के कम प्रभावशाली होने का मुख्य कारण इस संगठन में प्रभुसत्ता का अभाव होना है। इसके सदस्य राज्यों में प्रभुसत्त निहित है, लेकिन इसके पास नहीं है। प्रभुसत्ता के अभाव में संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने निर्णयों को लागू नहीं कर सकता। वह सिर्फ सदस्य-राज्यों को निर्देश भर दे सकता है जिसे मानना या न मानना सदस्य-राज्यों की इच्छा पर निर्भर करता है। यह बात संघ के दो प्रमुख अंगों की स्थिति से स्पष्ट हो जायगी। महासभा की शाक्तियाँ अत्यन्त सीमित है। उसको केवल सिफारिशें करने का ही अधिकार प्राप्त है जिन्हें मानना या न मानना सदस्य-राज्यों की इच्छा पर निर्भर है। सुरक्षा परिषद भी किसी सदस्य राज्यों को उसकी इच्दा के विरूद्ध सशस्त्र कार्रवाई में योग देने के लिए विवश नहीं कर सकती। कोई भी महाशक्ति अपने निशेधाधिकार से उसे पंगु बना सकती है। यद्यपि चार्टर ने एक अन्तर्राष्ट्रीय सेना का उल्लेख किया गया है और कोरिया, मिस्त्र और कांमो में एक प्रकार की अन्तर्राष्ट्रीय सेनाओं ने कार्य भी किया है, परनतु फिर भी अभी संयुक्त राष्ट्रसंघ के पास विश्व शान्ति की रक्षा के लिए प्रभावशाली कार्रवाई करने के लिए अपनी कोई स्वतंत्र सेना नहीं है। अपने आदेशों का पालन कराने के लिए उसे अपने सदस्य-राज्यों की सेना पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वर्तमान परिस्थितियों में यह भी निश्चित है कि किसी बड़ी सैनिक कार्रवाई के लिए सेना बड़े और शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा ही उपलब्ध करायी जा सकती है। ऐसी स्थिति में संघ केवल छोटे राष्ट्रों के विरूद्ध ही सैनिक कार्रवाई कर सकता है और वह भी तब जबकि बड़े राष्ट्र उसके लिए सेनाएँ देने को तत्पर हों। स्वयं बड़े राष्ट्रों अथवा उनका समर्थन  प्राप्त छोटे राष्ट्रों के विरूद्ध तो किसी भी प्रकार की सैनिक कार्रवाई की ही नहीं जा सकती है। सुरक्षा परिषद् में सभी महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए 15 में से 9 मत चाहिए, जिनमें पाँच बड़ी शक्तियों के मत अवश्य सम्मिलित हो। इसका तात्पर्य यह है कि यदि एक भी शक्ति किसी निर्णय के विरूद्ध हो तो वह निर्णय लागू नहीं हो सकता। व्यवहार में, निषेधाधिकार की शक्ति का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है और इसके संघ के कार्याें में बहुत अधिक बाधा पहुँची है। इस अधिकार के दुरूपयोग ने संगठन को बदनाम कर दिया है। बेटविच और मार्टिन के अनुसार ‘‘सुरक्षा परषिद की दोषपूर्ण मतदान प्रक्रिया के फलस्वरूप यह संस्था मुख्य झगड़ों को सुलझाने में उपयोगी सिद्ध नहीं हुई है। चार्टर ने सामूहिमक सुरक्षा की अवासताविक पद्धति स्थापित की है।’’ निषेधाधिकार के अधिक प्रयोग ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रभावहीन बना दिया है। लैस्टर बी0 पीयर्सन के अनुसार ‘‘शीतयुद्ध के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सुरक्षा परषिद के प्रत्येक सदस्य के पास यह अधिकार हों। जाॅन फास्टर डलेस ने इस अधिकार के प्रयोग के सम्बन्ध में बड़ी निराशा प्रकट की थी। उनके अनुसार ‘‘इस अधिकार के दुरूपयोग के कारण संयुक्त राष्ट्र जनता की दृष्टि में गिर गया है। आज कोई भी राज्य अपना विवाद सुरक्षा परिषद में ले जाना नहीं चाहता।’’ संयुक्त राष्ट्रसंघ के चार्टर की धारा-2 के अन्तर्गत आक्रमण की जो परिभाषा दी गयी है, वह निश्चित नहीं है। जब आक्रमण की परिभाषा ही स्पष्ट नहीं है, तो उसे रोकने के लिए उठाए जानेवाले आवश्यक पग वैधानिक दृष्टि से अनिश्चित तथा व्यावहारिक दृष्टि से निःशक्त होंगे ही। चार्टर के अनुसार शक्ति का अवैधानिक प्रयोग ही आक्रमण है किन्तु शक्ति का अवैधानिक प्रयोग क्या है यह स्पष्ट नहीं है और यह प्रश्न विवादास्पद बना हुआ है। अनेक आक्रमण है किन्तु शक्ति का अवैधानिक प्रयोग क्या है, यह स्पष्ट नहीं है और यह प्रश्न विवादस्पद बना हुआ है। अनेक आक्रमक राष्ट्र चार्टर की इस अस्पष्टता से लाभ उठाते हैं। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब आत्म-सुरक्षा के नाम पर आक्रमण किया। दिसम्बर, 1974 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा ने सर्वसम्मति से आक्रमण की परिभाषा को पारित कर दिया है। इसके अनुसार एक देश के द्वारा दूसरे देश की प्रभुसत्त, क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरूद्ध सशस्त्र सेना प्रयोग या अन्य किसी तरीके का प्रयोग, जो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप नहीं है, आक्रमण माना जायेगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक अन्य महत्वपूर्ण कमजोरी अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय को अनिवार्य                 क्षेत्राधिकार का प्राप्त न होना है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना तो की गयी है लेकिन इस न्यायालय को अनिवार्य क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं, जिसे इस न्यायालय की स्थिति बहुत असहाय हो गयी है। जिस प्रकार एक देश के न्यायालयों को प्राप्त होना चाहिए। महासभा की कार्य विधि भी दोषपूर्ण है। महासभा की कार्यावली में विषयों की संख्या काफी            अधिक रहती है। कभी-कभी तो उसकी संख्या एक सौ के लगभग होती है। उनके इतने विषयों पर एक सत्र में विचार करना संभव नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि महासभा की कार्रवाई सन्तोषप्रद नहीं होती। महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीरता से वाद-विवाद नहीं हो पाता। यदि कोई विषय कार्यावली के अन्त में होता है या सत्र के समापत होने के समय लिया जाता है तो उस पर विचार करने के लिए अधिक समय नहीं मिलता। इसके अलावा सम्पूर्ण बैठकों में औपचारिक भाषणों के कारण अमूलय समय नष्ट कर दिया जाता है। इस पुनरावृत्ति से लाभ कम होता है, समय की हानि अधिक। प्रक्रिया सम्बन्धी इन त्रुटियों के कारण महासीाा के सत्र गंभीरतापूर्वक नहीं हो पाते। इस कमी को दूर करने के लिए श्री डोंगस का सुझाव है ‘‘मुझे यह आवश्यक दिखाई पड़ता है कि हमें अपनी कार्यावली के साथ कैंची का प्रयोग करना चाहिए, तथा उन विषयों को काट देना चाहिए, जिनके रखने से कार्यावली की संख्या बढ़ जाती है और जिनमें किसी प्रकार के सुझाव की आशा नहीं होती।’’ चार्टर के दूसरे अनुच्छेद में यह घोषित किया गया है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ किसी राज्य के घरेलू क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सिद्धान्ततः यह ठीक भी है किन्तु त्रुटि यह है कि घरेलू क्षेत्राधिकार को स्पष्ट नहीं किया गया है। इसके अीााव में सम्बन्धित राज्य द्वारा इस अनुच्छेद की मनमानी व्याख्या कर संयुक्त राष्ट्रसंघ के कार्यक्षेत्र को सीमित कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद की नीति को घरेलू मामला बनाकर संयुक्त राष्टसंघ के प्रस्तावों का विरोध किया है। इसी तरह ऐंग्लों ईरानी तेल-विवाद में, कोरिया-संघर्ष में घरेलू मामले के प्रश्न ने संघ की कार्रवाई में बाधा पहुँचाई थी। संयुक्त राष्ट्रसंघ का उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा की स्ािापना है। इसका सिद्धान्तः यह अर्थ है कि संघ के सदस्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए वचनबद्ध है। अतः जब कभी भी शांति और सुरक्षा पर संकट आएगा तो यह आशा की जाती है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य प्राण-प्रण से उसकी रोकथाम करेंगो। परन्तु इसके साथ ही चार्टर की 51वीं और 52वीं धाराओं में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा सदस्य राज्यों को प्रादेशिक अथवा क्षेत्रिय संगठन बनाने की अनुमति दी गयी है। क्षेत्रीय संगठनों के लिए छूट इसलिए दी गयी ताकि स्थानीय तथा क्षेत्रीय विवादों का निबटारा इन संगठनों के माध्यम से हो सके। संघ का यह प्रावधान स्वयं संघ के अस्तितव के लिए घातक रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि कितने ही सैनिक गुट, जैसे नाटों, सीटों सेंटो, वारसा-पैक्ट आदि शांति और सुरक्षा के नाम पर संयुकत राष्ट्रसंघ के बाहर स्थापित हो गये। क्षेत्रीय गुटों की प्रतिस्पर्धा विश्व सुरक्षा के लिए एक नयी समस्या बन गयी। इनसे शीतयुद्ध को प्रोत्साहन मिला और शांति की समस्या जटिलतर होती गयी। इस तरह इन सैनिक गुटों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को निर्बल करने का ही प्रयास किया है। वास्तव में इन क्षेत्रीय सैनिक गुटों का अस्तित्व संयुक्त राष्ट्रसंघ रूपी ‘शांति मंदिर’ में सशस्त्र डाकुओं की तरह है। क्वंसी राइट ने ठीक ही लिखा हैः ‘‘निःसनदेह यह कहा जा सकता है कि इन क्षेत्रीय सुरक्षा गुटाों के अनियंत्रित विकास से संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के मूल उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकती।’’ चार्टर के अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शांतिपूर्ण परिवर्तनों के लिए किसी यंत्र को व्यवस्था नहीं की है। अतः संयुक्त राष्टसंघ पुराने राष्ट्रसंघ के समान ही एक ‘यथास्थिति’ की रक्षा करने वाली संस्था बन जाती है। संयुक्त राष्ट्रसंघ अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपने सदस्य-राष्ट्रों द्वारा दिये गये आर्थिक अनुदान पर ही निर्भर रहता है। सदस्य-राष्ट्रों में यह मनोवृत्ति पायी जाती है कि वे संघ को उसी स्थिति में आर्थिक अनुदान पर ही निर्भर रहता है जबकि वह उनकी आकांक्षाओं और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप कार्य करता है। यहाँ तक कि महाशक्तियाँ भी जब यह अनुभव करती हैं कि संघ उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर रहा है तो वे भी उसकी आर्थिक संकट बना रहता है। एक ओर लगातार संघ के उत्तरदायित्वों में वृद्धि होती जा रही है, परन्तु उसके अनुपात में आर्थिक स्त्रोंत उनके पास नहीं हैं। यह भी एक प्रमुख कारण है कि संघ अपने उद्देश्यों को अर्थभाव के कारण पूर्ण नहीं कर पाता है। सन 1983 के बाद संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय निर्बलता और अधिक उभरकर सामने आयी है। पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासचिव जेवियर पेरेज कुरियार ने कहा था कि विश्व संस्था लगभग दिवालिया हो चुकी है, उसका अतिरिक्त कोष खाली हो चुका है तथा इसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। सितम्बर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासीाा के 48वें अधिवशन में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए हासचिवव डाॅ0 बुतरस घाली ने स्पष्ट कहा कि संगठन पर गंभी आर्थिक संकट आ गया है और यदि तत्काल उपाय नहीं किया गया तो शीघ्र ही वह दिवालिया हो जाएगा। कुछ आलोचकों ने संयुक्त राष्ट्रसंघीय व्यवस्था की कतिपय अन्य आधारों पर भी निन्दा की है। अमरीका के भूतपूर्व विदेश सचिव फास्टर डलेस ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में तीन महत्वपूर्ण त्रुटियाँ बलबलायी हैं। प्रथमतः सेन फ्रांसिस्को सम्मेलन में जब चाट्रर का निमार्ण हो रहा था उस समय किसी को उस अणु-बम का ज्ञान नहीं था। वास्तव में यह चार्टर उस समय बना जब अणु-बम-युग प्रारंभ नहीं हुआ था अतएव चार्टर प्रयोग में आने के पहले ही पुराना हो गया। द्वितीयतः हिटलर को परास्त करने वाले तीन बिजयी नेताओं-रूजवेल्ट, स्टलिन तथा चर्चित-ने ही इस संस्था की नींव डाली थी। उनका विश्वास था कि उनमें युद्ध के समय जो मेल रहा है वह शांति के समय भी बना रहेगा। परन्तु उनका यह अनुमान गलत साबित हुआ। तृतीयतः सदस्य-राज्य विधि, न्याय और नैतिकता की ओर कम ध्यान देते है। लीलैण्ड एम0 गुडरीच ने भी संयुक्त राष्ट्रसंघ की कुछ त्रुटियों की ओर संकेत किया है। उनके अनुसार संयुक्त राष्ट्रसंघ न तो स्वतंत्रतापूर्वक कानून बना सकता है, न कर वसूल कर सकता है और न शक्ति द्वारा अपने निर्णयों को कार्यान्वित करा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की सीमित असफलता का दूसरा कारण वह राष्ट्रवाद के विचार को मानता है। राजनीतिक कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ की असफलता का प्रधान कारण राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक है। कोई भी अन्तर्राष्ट्रीय संगठन उसी समय सफलतापूर्वक कार्य कर सकता है जबकि उसके सदस्य-राष्ट्रों में अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विद्यमान हो। किन्तु वास्तव में इस दृष्टिकोण की बहुत कमी है। विश्व के अधिकांश राज्य अब तक अपने राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से ही विचार करते हैं और अपने राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के लिए वे अन्य राष्ट्रों के साथ अन्याय करने में भी नहीं चूकतें। अन्तर्राष्ट्रीय संगठन को सफल बनाने के लिए अनतर्राष्ट्रीयता की भावना को प्रबल बनाने की चेष्टा की जानी चाहिए। परन्तु दुर्भाग्यवश अपनी स्थापना के बाद से ही संयुक्त राष्टसंघ पूर्व और पश्चिम के संघर्ष का अखाड़ा बन गया। संघ की स्थापना के तुरन्त बाद ही विश्व की दो बड़ी शक्तियाँसंयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत रूस-एक-दूसरे की विरोधी हो गयी और इन दोनों के द्वारा अपने प्रभावक्षेत्र में वृद्धि के प्रयत्न प्रारंभ कर दिये गयें। इसके परस्पर विरोधी स्वार्थ के कारण एक ही दशक में संघ के भाग्य का फैसला हो गया। यदि वे दोनों राष्ट्र सहयोग की भावना से प्रेरित होकर कार्य करते तो उन्हें अवश्य सफलता मिलती। उदाहरणार्थ, 1965 में भारत-पाक युद्ध से उतपन्न स्थिति को सँभलने में संयुक्त राष्टसंघ इसलिए सफल हुआ क्योंकि सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने एक-दूसरे के साथ सहयोग किया। यह संघ के इतिहास में एक असाधारण घटना थी। अभी तक संघ का जो इतिहास रहा है। उसको देखकर संयुक्त राष्ट्रसंघ ही कहा जा सकता है। 1974-78 के वर्षाें में महाशक्ति के बीच तनाव शैथिल्य या ‘देतांत की स्थिति विकसित हो रही थी, इससे ऐसा लगने लगा था कि शीत युद्ध का स्थान तनाव शैथिल्य ले लेगा। इससे यह भी आशा की गयी थी कि महाशक्तियों के सहयोग से यह विश्व संगठन संसार के विभिन्न देशों के बीच शक्ति सम्बन्धों को बनाये रखने का कार्य अधिक अच्छे प्रकार से कर सकेगा। परन्तु 1980-81 में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप और अन्य कुछ प्रश्नों को लेकर महाशक्तियों के तनाव की स्थिति पुनः बल पड़ने लगी। 1983 में, विशेषताया सितम्बर, अक्टूबर, 1983 में महाशक्तियों के आपसी सम्बन्धों में पुनः अधिक कटुता तथा तनाव की स्थिति उतपन्न हो गयी। यह संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर आघात है। इस प्रकार महाशक्तियों के पारस्परिक अविश्वास, संघ एवं वैमनस्य के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्रसंघ सफल हो भी कैसे सकता है? जैसा कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ट्रिग्वे ली ने 23 सितम्बर, 1947 को ही कहा था; ‘‘संयुक्त राष्ट्रसंघ का वास्तविक सृदृढ़      आधार महाशक्तियों का सहयोग तथा समझौता हिल गया है। संसार के लोग तथा इसके साथ-ही-साथ अनेक सरकारें स्तब्ध, भयभीत एवं निरूत्साहित हो रही हैं। भय से घृणा उत्पन्न होती है तथा धृणा से संकट उत्पन्न होता है।’’ 1990 के दशक में शीत युद्ध के समाप्त हो जाने कारण संघ के प्रभावशाली ढंग से कार्य करने की संभावना बढ़ी है। इसमें संदेह नहीं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ को शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिली है और यह पूरी तरह उन आशाओं को पूरा नही कर सका है जिसकी कल्पना संघ के निर्माताओं ने की थी। हमें इस बात को भी स्वीकार कर लेने में कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए कि प्रत्येक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्रसंघ असफल रहा है और युद्ध के कारणों का निवारण, जो उसका प्रधान उद्देश्य है, अभी तक नहीं कर सका है। विश्व में ऐसी अनेकानेक समस्याएँ बनी हुई है जिनकों लेकर किसी भी क्षण युद्ध हो जा सकता है। परन्तु केवल इसी आधार पर यह मान बैठना कि संयुक्त राष्ट्र संघ का भविष्य अधकारमय है और पुराने राष्ट्रसंघ की भाँति संयुक्त राष्ट्रसंघ भी विश्व शांति को बनाये रखने में असफल ही रहेगा, उचित नहीं है। संयुक्त राष्ट्रसंघ संगठन, कार्य-प्रणाली और प्रभावशीलता की दृष्टि से राष्ट्र संघ की तुलना में बहुत अधिक सुधरे हुए रूप में है, यद्यपि इसकी कतिपय असफलताएं भी हैं किन्तु इन कतिपय असफलताओं के साथ-साथ महतवपूर्ण सफलताएँ भी प्राप्त की गयी हैं। एक व्यकित के जीवन में 46 वर्ष की अवधि भले ही बहुत होती हो लेकिन सम्पूर्ण मानवता से सम्बन्द्ध किसी विश्व संस्था के इतिहास में यह अवधि निश्चित रूप से बहुत छोटी ही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का उद्देश्य महान् है और महान् उदद्ेश्यों की प्राप्ति में अनेक बाधाएँ आती ही हैं। निरनतर प्रयत्न करने से ही सफलता मिल सकती है। यदि संयुक्त राष्ट्रसंघ वह सब कुद जो हम चाहते थे नहीं कर सका है, तो इसका एकमात्र कारण यही है कि यह एक मानवीय संगठन है और इस प्रकार में मानवीय संगठन से किसी चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती। इन सीमाओं के बावजूद संयुक्त राष्टसंघ को कुछ उल्लेखीनय सफलताएँ भी मिली हैं जिन्हें निम्नांकित क्रम में सूचिबद्ध किया जा सकता हैः राजनीतिक विवादों का समाधानः संयुक्त राष्ट्रसंघ का प्रधान कार्य शांति तथा सुरक्षा है। इस क्षे में यद्यपि इसको पूर्ण सफलता नहीं मिली है परन्तु आंशिक सफलता का श्रेय अवश्य है। सर्वत्र राजनीतिक वातावरण शीतयुद्ध तथा शक्ति-राजनीति से ओत-प्रोत था फिर भी अनेक राजनीतिक विवादों को सुलझाने में सफलता हासिल की। 19 जनवरी, 1946 को ईरान ने सुरक्षा परिषद् को सूचित किया कि सोवियत रूस की सेनाएँ उसके क्षेत्र में घुस आयी हैं। रूस के विरोध के बावजूद यह प्रश्न सुरक्षा परिषद् की कार्यसूची में रखा गया और सुरक्षा परिषद् में इस प्रश्न पपर विचार से जो प्रबल जनमत जागृत हुआ, उसके कारण सोवियत रूस को ईरान से अपनी सेनाएँ वापस बुलानी पड़ी। 6947 ई0 में इण्डोनेशिया की स्वतन्त्रता के प्रश्न को लेकर इण्डोनेशिया की सरकार और इस क्षेत्र की पुरानी साम्राज्यवादी सरकार नीदरलैंड के बीच युद्ध शुरू हुआ तो युद्ध का अन्त कराने में संयुक्त राष्ट्रसंघ में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बड़ी सफलतापूर्वक हसतक्षेप किया और संघ के हस्तक्षेप के कारण युद्ध बन्द हो गया और राजनीतिक वार्ता प्रारम्भ हुई। बाद में पश्चिम इरियन को लेकर इन दोनों में पुनः तनाव बढ़ा तो संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ने अपने प्रयास से इस समस्या के समाधान में सहायता पहुँचाई। यद्यपि संघ कश्मीर की समस्या का समाधान नहीं कर सका है लेकिन इस विवाद में संघ की सफलताओं को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। शुरू में कश्मीर के प्रश्न को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच जो युद्ध हुआ उसको बन्द कराने का रेय संयुक्त राष्ट्रसंघ को ही है। इसके बाद लगभग अठारह वर्ष तक कश्मीर में युद्ध-विराम रेखा पर पहरा देकर दोनों देशों के बीच युद्ध पिछड़ने से रोका है। अन्त में 1965 में जब दोनों देशों में सशस्त्र युद्ध शुरू हो गया तो उस युद्ध को बंद कराने में संयुक्त राष्ट्रसंघ को बड़ी सफलता मिली। पामर और परकिन्स युद्ध-विराम व्यवस्था को एक सफल प्रयास मानते है। पंडित नेहरू ने भी संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी वर्ग की प्रशंसा की थी। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने पैलेस्टाइन में अच्छा कार्य किया। यह ठीक है कि यह यहूदी अरब समस्या को हल करने में असमर्थ रहा परनतु फिर भी इसने इजराइल और अरब राष्ट्रों के बीच युद्ध-विराम कराकर तनाव को कम कराने का प्रयास किया था। महासभा के तीसरे अधिवेशन के अध्यक्ष एच0बी0ईवाट ने कहा थाः इस विषय के गुण-दोष के सम्बन्ध में कुद भी मतभेद हो, इसमें सन्देह नहीं कि फिलीस्तीन के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र ने एक सच्चा और स्थायी सुझाव रखा था तथा मध्यपूर्व में युद्ध रोका था। संयुक्त राष्ट्र की अनुपस्थिति में एक            साधारणं युद्ध छिड़ने की सम्भावना थी।’’ सन 1960 में संघ ने दक्षिण कोरिया को उत्तरी कोरिया के आक्रमण से बचाया, बर्लिन के घेरे के प्रश्न को सुलझाया, स्वेज के मामले में ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल के आक्रमण से मिस्त्र की रक्षा की तथा युद्ध को रोकने में सफलता हासिल की, इराक, सीरिया तथा लेबनान से विदेशी सेनाएँ हटाने में सहायता की एवं साइप्रस को लेकर तुर्की और यूनान के बीच युद्ध छिड़ने से रोका। बाल्कन प्रदेश के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष समिति ने यूनान की सहायता करने का प्रयास किया। उसके विरोधी पड़ोसी उसको कष्ट दे रहे थे। इस समिति ने यूनान, अलबानिया, बलगेरिया और युगोस्लाविया के बीच वार्तालाप कराया। 1962 में क्यूबा को लेकर सोवियत संघ और संयुक्त राजय अमरीका में युद्ध छिड़ सकता था। इस संकट को समाप्त करने में भी संघ ने सराहनीय कार्य किया। अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों की वापसी के बारे में जेनेवा समझौता (1988), इरान-ईरान युद्ध-विराम समझौता (अगस्त 1988), नामीबिया की स्वतन्त्रता सम्बन्धी समझौता (दिसम्बर 1988), अंगोला से क्यूबाई सेनिकों की वापसी के लिए पर्यवेक्षकों का दल तैनात करना, इराक के             अवैध कब्जे से सैनिक कार्रवाई कराकर कुवैत को मुक्त कराना (ुरवरी 1991) आदि हाल में सुयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ कही जा सकती है। अप्रैल 1992 के प्रारंभ में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बुतरस घाली ने संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा कार्य-सूची की चर्चा की। उन्होंने यूगोस्लाविया, कम्बोडिया, अल सल्वाडोर, पश्चिमी सहमा, इराक, लीबिया और म्यांमार में शान्ति स्थापित करने के लिए किए जा रहे संयुक्त राष्ट्र प्रयासों की चर्चा की-ये वे क्षेत्र हैं जहाँ अशान्ति या संघर्ष विद्यमान है। इन उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र ने कई ऐसे संकाओं को रोका है जिसके कारण मनुष्य मात्र को बड़ी हानि होती। यदि संयुक्त राष्ट संघ नहीं होता तो अनेक राजनीतिक झगड़ों को लेकर युद्ध हो जाता और विश्व शांति खतरे में पड़ जाती। पंडित नेहरू ने लिखा थाः ‘‘संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कई बार हमारे उत्पन्न होने वाले संकटों को युद्ध में परिणत होने से बचाया है। इसके बिना हम आधुनिक विश्व की कल्पना नहीं कर सकते।’’ संयुक्त राष्ट्रसंघ अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षाें को रोकने में ‘सोफ्टी वाल्व’ का काम भी करता है। जब भी कोई संकटकालीन स्थिति संघ के समक्ष आती है उससे सम्बद्ध राष्ट्रसंघ के रंगमंच से बोलकर अपना गुस्सा शान्त कर लेते हैं। संघ भी कोई कामचलाऊ उपाय निकालकर तत्काल के लिए युद्ध की सम्भावना को टाल देता है। जब एक बार यह सम्भावना कम हो जाती है तो बाद में उसके बाद में उसके शान्तिपूर्ण समाधान के रास्ते खुल जाते हैं। इस तरह संयुक्त राष्ट्र का यह साधन अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने और विश्वशान्ति का प्रोत्साहन देने में अधिक सहायक होता है। श्रीमती विजयलक्षमी पंडित ने ठीक ही कहा था। ‘‘यदि हम समस्याओं का अन्तिम हल नहीं निकाल सकते तो हमें इससे हताश नहीं हो जाना चाहिए। इतिहास एक अविराम साधन है। हमें यह स्वकार करना पडेगा कि संयुक्त राष्ट्र के समक्ष सदैव कुछ नयी और पुरानी समस्याएँ रहेंगी। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि समझौता करने का हमेशा एक-न-एक अवसर अवश्य रहता है। आपस में मतभेदों को कम करने का अवसर भी रहता है। यह कार्य विचारविनियम द्वारा ही हो सकता है तथा यह कार्य-विधि अत्यन्त उपयोगी है।’’ वी0के0 कृष्णमेनन ने भी इस बात पर बल दिया था। उनके अनुसारः ‘‘ जब हम कठिन-से-कठिन समस्या पर सामूहिक रूप से विचार करते हैं तो उस समस्या के बहुत-से नये पहलू हमारे सामने आते हैं। इससे समस्या के समाधान में की सहायता मिलती है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्रसंघ राष्ट्रों को बातचीत में व्यस्त रखकर युद्ध की सम्भावना को टालने में सहायता प्रदान करता है। अत हम डा0 ईवाट के शब्दों में कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की सफलता का मूल्यांकन करते समय यह पूछना की नहीं है कि इसने क्या कार्य किया है। हमें यह समझने का यत्न करना चाहिए कि यदि संयुक्त राष्ट्र नहीं होता तो कैसी स्थिति होती। साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का उन्मूलन: संयुक्त राष्ट्र ने गैर-स्वशासित देश के मनुष्यों की भलाई के लिए भी प्रयत्न किये हैं। 24 दिसम्बर, 1960 को महासभी ने प्रस्ताव द्वारा उपनिवेशवाद को पूर्ण रूप से समाप्त करने की आवश्यकता की घोषणा की। इसने घोषित किया कि मनुष्यों को दूसरे देशों के अधीन रखना और शोषण करना मानव के मौलिक अधिकारों की अवहेलना करना है। विश्व-संस्था के रंगमंच से इस तरह की घोषणा का अपने आप में महत्व है। इस घोषण को कार्यान्वित करने के लिए औपनिवेशिक राज्यों से अनुरोध किया कि वे अपने अधीन क्षेत्रों को स्वतन्त्रता दें। संयुक्त राष्ट्र के प्रयतनों के फलस्वरूप अनेक परतन्त्र राज्य स्वतन्त्र हो चुके हैं। इण्डोनेशिया, मोरक्कों,  ट्यूनिसिया तथा अल्जीरिया को स्वतन्त्र कराने में संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रयास कर प्रश्ंसनीय रहे हैं। शुरू में इन देशों की स्वतंत्रता के प्रश्न को टालने का प्रयत्न किया गया, किन्तु अन्त में उपनिवेशवादी राज्य को विवश होना पड़ा और उन्हें स्वतंत्रता देनी पड़ी। विश्व का लोकमत निरन्तर साम्राज्यवादियों का विरोध कर रहा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ इस प्रकार के कार्याें के लिए अत्यधिक उपयोगी रंगमंच है। संघ की संरक्षण-पद्धिति के अनतर्गत भी लगभग सभी उपनिवेश अब तक स्वतंत्र हो चुके हैं ये सारी बाते संघ की महतवपूर्ण सफलताएँ मानी जायेंगी। गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में सफलताः राजनीतिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्रसंघ की सफलता विवादास्पद हो सकती है, किन्तु इस बात पर दो मत नहीं हो सकते कि गैर-राजनीतिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्रसंघ को बहुत अधिक महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त हुई हैं। मानवतावादी, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृति सभी क्षेत्रों में इसकी उपलब्धियाँ प्रशसनीय हैं। इस दृष्टि से इसकी कई विशिष्ट एजेंसियाँ उल्लेखनीय हैं। यूनेस्कों ने शिक्षा, विज्ञान तथा साहित्य के विकास में योग दिया है। अज्ञानता को दूर करने के लिए इसने विभिन्न सरकारों को परामर्श दिया है और शिक्षा व विज्ञान-सम्बन्धी सामग्री के आदान-प्रदान में सहायता की है। निरक्षरता उन्मूलन, नवीन ज्ञान के विश्वव्यापी प्रचार तथा सांस्कृति कार्याें में इसका योगदान काफी प्रशंसनीय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा नागरिकों के स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने और महामारियों पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसके बड़े पैमाने पर पेंसिलिन, डी0डी0टी0 आदि दवाओं के वितरण से बीमारियों के प्रतिरोध में बड़ी सहायता पहुँचायी है तथा महामारियों का प्रसार रोका है। इसके खाद्य संगठन ने अन्न का उत्पादन बढ़ाकर दुर्भिक्षों का तथा भुखमरी का निवारण किया है। इसके श्रम संगठन ने रमिकों की दशा को बहुत उन्नत किया है। इसी प्रकार बाल कलयाण कोष ;न्छप्ब्म्थ्द्ध के द्वारा बच्चों तथा जज्जाअें के स्वास्थ्य के विकास के लिए दवाइयाँ, खाना, बीमारियों के नियंत्रण तथा प्रसूतिमृहों की स्थापना में सहयोग दिया गया है। यह प्राकृति दुर्घटनाओं के समय बच्चों की विशेष रूप से रखा करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मानव-कल्याण के क्षेत्र में निश्चित लाीा भी पहुचायाँ है। यह कहना कतई दोषपूर्ण नहीं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का यह कार्य सामूहिक सुरक्षा प्रणाली से किसी भी अवस्था में कम महत्वपूर्ण नहीं है। व्यापक संपर्क एवं अनतर्राष्ट्रीय सहयोग का निमार्ण करने का मंच:  संयुक्त राष्ट्रसंघ विचारों के आदान-प्रदान पूर्वाग्रह की गुथियों को सुलझााने, एक-दूसरे के दृष्टिकोण को अच्छी प्रकार समझने तथा विश्व में व्यापक संपर्क एवं शांति की जलवायु का निमार्ण करने का मंच है। राष्ट्र चाहे लौह-यवनिका ;प्तवद बनतजंपनद्ध के पीदे हो चाहे ताम्र, रजत अथवा स्वर्ण यवनिका के पीदे-सभी एक सभा मंच पर एकत्रित होते हैं, वार्ताएँ करते है, एक-दूसरे की समस्याओं को समझने तथा उनके सहानुभूतिपूर्ण हल ढूँढ निकालने का प्रयास करते हैं तथा सहयोग का वातावरण निर्मित करते हैं। इसके द्वारा स्थापित सक्रिय सम्पर्क की परिपाटी ने विश्व शांति को बल दिया है। विभाजित विश्व में इस संस्था की महत्ता और बढ़ गयी। आज यह आवश्यक है कि कोई ऐसी संस्था हो जिसमें सोवियत रूस अमरीकी               विचारधारा से तथा अमरीका सोवियत विचारधारा से अवगत हो। जब दोनों एक-दूसरे की विचारधाराओं से अवगत होंगे तभी विवादास्पद विषयों का हल ढूँढा जा सकेगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ एक ऐसा ही प्लेटफाॅर्म है जहाँ महान् राष्टञ बैठकर अपनी समस्याओं पर विचार कर सकते हैं। सर रोजर मैकिन्स ने लिखा हैः ‘‘हम संयुक्त राष्ट्र का समर्थन इसलिए नहीं करते कि यसह पूर्ण यंत्र है, परन्तु इसलिए करते हैं कि इसने अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और झगड़ों को सुलझाने के लिए प्रभावशाली साधन उत्पन्न किये हैं। महान् शक्तियों का सहयोग न मिलने के करण इसके कुछ कार्य विफल रहा सकता हैं। परन्तु इसकी उपयोगिता यहा है कि यहाँ पर सदैव पूर्व व पश्चिम के लोग एक साथ बैठकर वाद-विवाद कर सकते हैं। यदि किन्हीं अन्य ढंगों द्वारा झगड़ों का शांतिपूर्ण निबटारा न हो सके या विफलता प्राप्त हो तो संयुक्त राष्ट्र की शरण ली जा सकती है।’’ संयुक्त राष्टसंघ एक नियंत्रक शक्ति के रूप मेंः संयुक्त राष्ट्रसंघ ने एक नियत्रक शक्ति के रूप में भी काम किया है। इसका दृषिकोण सदैव शांति की ओर रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय विषयों में इसने एक संतुलन शक्ति का कार्य किया है। जब कभी भी कोई विवाद इसके समक्ष आया है। इसने शांतिपूर्वक सुलझाने का कार्य किया है। इसी के चलते अनेक अवसरों पर स्थिति बिगड़ने नहीं पायी है। इसके अस्तित्व के चलते ही बड़े-बड़े राष्ट्र छोटे राष्ट्रों के विरूद्ध शक्ति का प्रयोग करने में हिचकिचाते हैं। इस तरह युद्ध का भय कम हुआ है और छोटे राष्ट्रों की शक्ति में वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त महासभा को पर्याप्त अधिकार होने के कारण छोटे-छोटे सदस्य राष्ट्रों को अपनी शक्ति का पूर्ण उपयोग करने के अवसर प्राप्त हुए हैं और उन्होंने अपने लाभार्थ इन अवसरों का पूरा उपयोग किया है। यह एक शुभ लक्षण है कि पहली बार छोटे-छोटे राष्ट्रों के प्रयासों को निष्फल कर सकना सम्भव हो सका है। अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का आदार एवं पंजीकरणः अन्तर्राष्ट्रीय आचरण को पुष्ट एवं संयत बनाने में संयुक्त राष्टसंघ का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अनतर्गत अन्तर्राष्ट्रीय विधि को संरक्षण तथा स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ है। अनतर्राष्ट्रीय विधि को पंजीकृत करने का कार्य संघ द्वारा स्थापित आयोग, सचिवालय, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय, मानवीय अधिकार आयोग आदि द्वारा किया जाता है। संघ द्वारा देशों के मतभेद दूर करते समय अथवा अनतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की स्थापना करते समय अनतर्राष्ट्रीय विधि का हमेशा पालन किया गया है। इसका हर संभव प्रयास यह रहता है कि संसार के विभिन्न राष्ट्रों में इन कानूनों के प्रति आदर-भाव पैदा किया जाय और कही भी, किसी भी स्थिति में उनका उल्लंघन न किया जाय। यह सत्य है कि विश्व जीवन के स्तर पर विधि के शासन की कल्पना अभी नहीं हो पायी है परन्तु इस दिशा में निष्क्रिया रहने से तो कच्छप गति से आगे बढ़ना ही अच्छा है। संघ के शिक्षावर्द्धक कार्यः संयुक्त राष्ट्रसंघ का एक शिक्षावर्द्धक कार्य यह है कि इसकी अनेक प्रवर समितियाँ संसार के लोगों के जीवन से सम्बन्धित सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक विषयों पर शोध, अन्वेषण, निरीक्षण आदि कार्य करती है। जब इन विषयों पर रिपोर्ट प्रकाशित होती है तो उनमें बहुमूल्य सूचनाएँ होती हैं। इस प्रकार सामान्य जनता का अनुभव तथा ज्ञान तो बढ़ता ही है, इसके साथ ही, उसे यह भी विश्वास हो जाता है कि जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक      आधार को सुदृढ़ करके ही अच्छी मानवता का निर्माण हो सकता है। इस दृष्टि से ये प्रकाशन लाभदायक है। नैतिक दबाव का साधन:  संयुक्त राष्ट्रसंघ यद्यपि सामूहिक सुरक्षा की दृष्टि से एक व्यवस्थित और एकीकृत प्रणाली का उपयुक्त विकास नहीं कर पाया है किन्तु फिर भी यह लोकमत का रंगमंच और नैतिक दबाव का एक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्णय विश्व के नैतिक प्रभाव को दर्शाते हैं। इसकी अनतर्राष्ट्रीय स्थिति और सदस्य-संख्या के कारण इसके प्रस्तावों और सिफाारिशों को बल मिलता है। यदि कोई राष्ट्र इसके निर्णय को ठुकरा देता है तो विश्व के सब राष्ट्रों की नजर में वह नीचे गिर जाता। संयुक्त राष्ट्रसंघ से कम-से-कम यह तो संभव हो सका है कि यहाँ आक्रामक राष्ट्रों के इरादों का बहुत आसानी से भंडाफोड़ हो जाता है और विश्व जनमत उनसे पूर्ण रूप से अवगत हो जाता है। साम्राज्यवादी एवं उपनिवेशवादी शक्तियों के बर्बर कृत्यों तथा क्रूरतापूर्ण अतयाचारों की चर्चा जब यहाँ की जाती है तो उसका प्रचार क्षणभर में संपूर्ण संसार में हो जाता है। सभी देशों पर इसका प्रभाव पउत्रता है। जनमत के ीाय से आक्रामक राज्य को विश्व-संस्था के समख अपनी नीतियों की व्याख्या करने तथा उनको सार्थकता प्रमाणित करने का प्रयास करना पड़ता है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्रसंघ आक्रामक राष्ट्रों पर अपना नैतिक प्रभाव दबाव डालकर उन्हें अच्छे रास्ते पर आने के लिए बाध्य करता है। इस प्रकार का नैतिक दबाव बहुधा सैनिक दबाव से भी अधिक प्रभावशाली साबित हुआ है। जाॅन फाॅस्टर डलेस के अनुसार ‘‘इसका कारण यह है कि कोई भी राष्ट्र यह नहीं चाहता कि महासीाा नैतिकता के आधार पर उसके कार्याें की निन्दा करे।’’ संघ के नैतिक दबाव के कारण ही सोवियत संघ ने ईरान से सेनाएँ हटायाी थीं तथा ब्रिटेन ओर फ्रांस ने मिस्त्र के स्वेज नहर क्षेत्र से अपनी सेनाएँ हटा ली थीं। इसी तरह के दबाव के परिणामस्वरूप ही इण्डोनेशिया को स्वतंत्रता मिली थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के रक्षक तथा सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति के अग्रदूत-इन दोनों ही रूपों में संयुक्त राष्ट्रसंघ पुराने राष्ट्रघ की अपेक्षा अधिक सफल सिद्ध हुआ है। अपनी दुर्बलताओं और विफलताओं के बावजूद यह मानवीय बुद्धि द्वारा परिकल्पित अब तक का श्रेष्ठतम अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इसमें सन्देह नहीं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक आदर्श संस्था नहीं माना जा सकता। यह न केवल एक विश्व-सरकार के रूप में कार्य करने की स्थिति से बहुत दूर है वरन् एक अन्तर्राष्ट्रीय पंच और मध्यस्थ के रूप में भी अत्यन्त शक्तिहीन है। इसकी स्थापना के पिछले पाँच दशकों में विश्व रंगमंच पर जो कुछ हुआ है उसको देखते हुए अनेक क्षेत्रों में इस संस्था की सार्थकता पर प्रश्न किये जा रहे हैं। कुछ निराशावादियों ने तो यहाँ तक कह डाला है कि विश्व संस्था यदि मर नहीं चुकी है तो मरणोन्मुख हो रही है। उनके अनुसार जिन आदर्शाें को लेकर तथा जिन आशाओं के साथ इसकी स्थापना की गयी थी उनमें बहुत-कुछ आज धूमिल पड़ चुके हैं तथा कुद छूट चूके हैं। आज कोई जबर्दस्त आशावदी भी यह नहीं सोचता कि संयुक्त  राष्ट्रसंघ किसी कल्पित विश्व संघ या महासंघ का आदि रूप बन सकता है। परन्तु इसकी कमियाँ हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि कोई भी संस्था अपने सदस्यों की क्षमता के अनुरूप ही काम कर सकती है। सदस्यों की क्षमता ही उसकी शक्ति और सीमा होती है। संयुक्त राष्ट्रसंघ भी इसका अपवाद नहीं है। यह कोई रामबाण नहीं है और न कोई जादू की छड़ी। ‘‘यह तो एक मंच है या सांविधानिक ढाँचा है जिसमें सरकारों के बीच वार्तालाप होता है।’’ यह राजनीतिज्ञों के लिए एक नया शस्त्र है, सरकारों के लिए एक नया साधन है और राजनय की एक नयी प्रविधि है। यह सहयोग का एक साधन या एक अन्तर्राष्ट्रीय सहकारी समिति के सामान है। आधुनिक जगत की वास्विक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस तरह के साधन अथवा मंच की सार्थकता निर्विवाद है। संप्रभुता के कट्टर समर्थक राज्यों के लिए भी एक विश्व-मंच अनिवार्यतः चाहिए ही और नहीं तो वहाँ अपने मन का गुब्बार निकालने का अवसर मिलता है। इससे भी कुछ शांति मिलती है, समस्या के कुछ सूत्र उलझते हैं तो कुछ सुलझते भी हैं। इस दृष्टि से संयुक्त राष्ट्रसंघ की सार्थकता आज भी बनी हुई है। 7 जून, 1963 को संघ की बजट समिति में भाषण करते हुए भारतीय प्रतिनिधि बी0एन0 चक्रवर्ती ने कहा भी था कि हम संघ से रहित विश्व की कल्पना नहीं कर सकते। इसके बिना हम संघर्ष, युद्ध और विध्वंस की पुरानी स्थिति में लौअ जायँगे। संघ की उपयोगिता इस बात में निहित है कि यह सम्मेलन पटल ;ब्वदमितमदबम जंइसमद्ध को युद्धभूमि का स्थनापन्न बनाने की मनुष्य की सर्वाधिक आशा का प्रतिनिधित्व करता है। जैसा कि क्लाॅड ने लिखा हैः ‘‘अपनी सभी कमियों एवं त्रुटियों के बावजूद संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रथम कोटि की एक महती उपलब्धि है। यह सभ्यता का प्रतीक है। यह ऊँची आशाओं तथा प्रगतिशील आकांक्षाओं का पुंज है।’’ उसके अनुसार संयुक्त राष्ट्रसंघ का उपयोग किया जा रहा है, दुरुपयोग किया जा रहा है, अथवा उसे जन्नत बनाया जा रहा है। यह मनुष्य मात्र की अन्तिम तथा सर्वोच्य आशा नहीं हो सकता परन्तु आधुनिक युग की कठिनाइयों को सुलझााने का यह अच्छा साधन है तथा भविष्य की आवश्यकताओं को सुलझााने का यह अच्छा यंत्र है। वेण्डेनबोश तथा होगन संयुक्त राष्ट्र की सफलता को आधुनिक सभ्यता के भविष्य से संयुक्त मानते है। वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ का स्वरूप बदल रहा है। अब अमरीका और रूस में शीतयुद्ध समाप्त हो चुका है। दोनों महाशक्तियों में एक नवीन सहयोग देखने को मिलता हैं इसके अलावा अब अमरीका और उसके मित्र राष्ट्रों का विश्व संस्था में इस प्रकार का आधिपत्य नहीं रहा है, जैसा पूर्व में था। अब विकासशील देश अपनी संख्या का लाभ उठाकर अपनी आवाज बुलन्द कर सकते हैं। यहाँ तक कि विकासशील देश संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्णयों को प्रभावित करने की स्थिति में आ गये हैं। इसके कुछ कारण हैं, यथा- अरब राष्ट्रों की तेल शक्ति का उदय, आर्थिक संकट ग्रसित पश्चिमी देशों की आर्थिक सहायता के शिकंजे का कमजोर पड़ना तथा विकासशील देशों पर निर्भरता में कमी आना तथा तीसरी दनिया का उदय संयुक्त राष्ट्रसंघ में विकासशील देशों का बहुमत स्थापित हो जाने से अब संघ विश्व जनमत का वास्तविक प्रतीक बन गया है। संघ में शक्ति के विकेन्द्रीकरण के माध्यम से उन परिवर्तनों का समावेश हो रहा है जिसके कारण संघ वास्तविक दृष्टि से एक प्रभावपूर्ण विश्व संस्था का स्वरूप ले सकेगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ के संगठन एवं चरित्र में यह शुभ परिवर्तन है जिसका सभी ओर से स्वागत किया जाना चाहिए। वास्तव में संयुक्त राष्टसंघ एक पद्धति, एक संस्था तथा एक अवसर प्रस्तुत करता है। संघ की सफलता आधुनिक सभयता के भविष्य के साथ जुड़ी हुई है। ‘दिनमान’ ने संघ की सार्थकता पर टिप्पणी करते हुए लिखा हैः ‘‘निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ से कोई अच्छी व्यवस्था हो सकती है? इन परिस्थितियों में हमें देशों के आपसी झगउ़े तय करवाने और दुनिया को तीसरी बड़ी लड़ाई से बचाने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र पर ही भरोसा करना होगा, लेकिन इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र अपने-आपको प्रभावशाली सिद्ध कर सके,  इसके लिए उसे और अधिकार देने होंगे तथा उसकी शक्ति बढ़ानी होगी।’’ स्थायी सदस्यता के लिए जनसंख्या की दृष्टि से आज के परिपेक्ष्य में भारत को तथा अन्य विकासशील देशों को शामिल करना होगा तभी संयुक्त राष्ट्र संघ में सार्थकता का समावेश होगा।

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