ISSN- 2278-4519
RNI : UPBIL/2012/44732
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हिन्दी पत्रकारिता का उद्देश्य: माखनलाल चतुर्वेदीहिन्दी पत्रकारिता का उद्देश्य: माखनलाल चतुर्वेदी

शोध छात्र
विकाश सिंह
शोध निर्देशक
डाॅ0 जीत सिंह
(हिन्दी विभाग)
कु0 मायावती राजकीय महाविद्यालय, बादलपुर (गौतम बुद्ध नगर)

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय जनजागरण की कहानी है। यह जागरण राष्ट्रीयता  के विकास, राष्ट्रीय चेतना के विकास, समाज सुधार और अंधविश्वास की जकड़न से उभरने के अहसास की कहानी है। देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दुरवस्था से मुक्ति की आवश्यकता को महसूस करने का जो मन बनता गया उसके साथ देश में पत्रकारिता का उद्भव हुआ।  हिन्दी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ ही सामाजिक चेतना और समाज को गति दी, शक्ति दी, तीक्ष्णता दी, उसके आधार को व्यापक बनाया तथा तत्कालीन संघर्ष     सम्बन्धी योजनाओं को सैद्धान्तिक रूप से प्रस्तुत करने के साथ ही जनमानस को अनेक खबरों के प्रति सचेत किया। भारत में पत्रकारिता आधुनिक चेतना और ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका रही है। लोक रूचि के परिष्कार और विकास का यह एक सशक्त माध्यम रही है। यह यहां की भाषा, संस्कृति और साहित्य की उन्नायक रही है। पत्रकारिता ने सभी भारतीय भाषाओं को नयी शैली, ओज, शब्दावली और अभिव्यक्ति की विविधता देकर उसे प्रवाहमान, सशक्त और समृद्ध बनाया, उसे ओज का पुट दिया, सामाजिक एवं जातीय चेतना के प्रवाह को इसने विशेष गति दी। शुरूआत में पत्रकारिता का उद्देश्य केवल जनहित था, किंतु समय के अनुसार यह उद्देश्य व्यापक होता गया। आजादी के महान लक्ष्य के साथ-साथ पत्रकारिता देश और समाज की सेवा की भावना से जुड़ी। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘पत्रकारिता एक सेवा है। पत्रकार सेवक है और पत्रकारिता सेवा का माध्यम। जहां भी सेवा की जरूरत होगी वहां पत्रकारिता जायेगी और अपनी शक्ति के अनुसार अच्छी से अच्छी सेवा करेगी।’ इस तरह के चिन्तन से पत्रकारिता के उद्देश्य को व्यापकता और स्वीकार्यता मिली। आजादी के समय पत्रकारिता का स्वरूप थोथा प्रचार या अखबार की बिक्री के लिए सनसनी पैदा करने वाला नहीं था। तब पत्रकार जोखिम के माहौल में कलम चलाता था। पत्रकार अपना खुद का आत्म-निरीक्षण भी करता था। वह अपनी जिम्मेदारी एवं रोल के प्रति सजग था। माखन लाल चतुर्वेदी के शब्दों में:- ‘समाचार पत्र संसार की एक बड़ी ताकत है, तो उसके सिर पर जोखिम भी कम नहीं है। पर्वत की जो शिखरें हिम से चमकती हैं और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवारें बनती हैं, उन्हें ऊँची होना पड़ता है। संसार में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाये हुए है तो उनकी जिम्मेदारी भी भारी है। बिना जिम्मेदारी बड़प्पन का मूल्य क्या है और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल में जाता है, जो अपनी जिम्मेदारी को नहीं संभाल सकता।’ यानी पत्रकारिता एक बड़ी शक्ति है, तो उसका उत्तरदायित्व भी बहुत बड़ा है। पत्रकारिता आधुनिकता की विशिष्ट उपलब्धि है। आधुनिकता वह सामाजिक और सांस्कृतिक संचेतना है, जिसने वैज्ञानिक आलोक से मानवीय धरातल के विभिनन स्तरों को उजागर किया है। विश्व के अन्य विकसित देशों की तरह भारत में भी आधुनिकता का प्रवेश विज्ञान के साथ हुए नवजागरण के साथ हुआ। आधुनिकता यानी एक वैज्ञानिक सोच एवं दृष्टिकोण, जो पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु बना। इस आधुनिकता से व्यक्ति के भीतर नयी सोच और चेतना पैदा हुई। पुरानी घिसी-पिटी मान्यताएं टूटीं और अपने आपको एवं अपने सारे क्रिया कलापों के पुनरीक्षण का दौर शुरू हुआ। इस दौर से शुरूआती प्रतिक्रियात्मक अवरोध के बाद जहां पुरानी जकड़नों, अंधविश्वासों एवं कुरीतियों को तोड़ने का मानस बना, वहीं अपनी हीनता पर विजय पाने का लोगों में साहस भी पैदा हुआ। इससे उपजे आत्मविश्वास ने व्यक्ति एवं समाज को नयी दिशा दी, जिससे उसकी दशा भी बदली। यह प्रक्रिया जो सारे विश्व में चली उससे भारत भी प्रभावित हुआ। पत्रकारिता और पत्रकार का दायित्व वस्तुतः समाज के प्रति है। इसलिये उसका निर्भीक और निश्छल होना तथा बनावट से दूर रहना जरूरी हैं वह व्यक्तिवाद या अन्य किसी प्रभाव से ग्रस्त हुआ तो उसकी लेखनी अहम, आक्रोश या रागद्वेष से प्रभावित होगी। उसे बड़े दायरे के प्रति प्रतिबद्ध होना होगा। पत्रकार जो कहे, उसके प्रति उसे खुद उŸारदायी रहना होगा। आखिरकार पत्रकार भी कानून एवं मर्यादा से बंधा है। उसे ऐसा काम करने का हक नहीं है, जिससे दूसरे की स्वाधीनता का हनन हो या अपराध को बढ़ावा मिले या किसी को हत्या, लूट अथवा आग लगाने की प्रेरणा मिले। किसी भी मानहानि या प्रतिष्ठा गिराने का पत्रकारिता में किसी को हक नहीं है। किसी दुर्भावना के शिकार होकर वीभत्स या विकृत रचना द्वारा समाज में विकृत पैदा करने का भी उसे हक नहीं है वरना वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग माना जायेगा। प्रेस की स्वाधीनता महत्वपूर्ण और जरूरी है। इस मर्यादा का उल्लंघन पत्र और पत्रकारिता को शंका के घेरे में लाता हैं प्रेस की स्वाधीनता जरूरी भी है, परंतु उसके उपयोग में भी सावधानी जरूरी है। एक मान्यता यह है कि पत्रकारिता के प्रभाव के कारण इस पेशे मंे आजकल कई अनुभवहीन, अधकचरें, शिक्षाहीन, मौकापरस्त और व्यवसायिक बुद्धि वाले घुस आये हैं। कुछ ऐसे हैं जो कहीं और जगह फिट नहीं हो सके, तो उन्होंने किसी की शह पर या सस्ते लाभ के लिये एक परचा निकाल कर ब्लैकमेल का रास्ता अपना लिया। ऐसे तत्वों की बाढ़ आने से अर्थशास्त्र का वही सिद्धांत कहीं-कहीं लागू हो गया है कि खोटा सिक्का सच्चे सिक्के को मार्किट के बाहर कर देता है। यह चिंतनीय स्थिति है। ऐसी स्थिति में कभी रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की बातें संवादाताओं के पक्ष से और कभी उस पक्ष से आती है, जिससे समाचार प्राप्त होते हैं। इस पर पत्रकार वर्ग के, शासन एवं लोकतंत्र की संस्था के समर्थकों को गम्भीरता से सोचना होगा। शायद इसके लिये दूसरे वर्ग और तत्व भी कुछ हद तक दोषी हों, लेकिन लोकतंत्र के हिमायतियों की यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि पत्रकारिता अपने उद्देश्य पर कायम रहे। यह पत्रकारिता व्यवसाय की साख, विश्वासनीयता और व्यवसाय की प्रतिष्ठा का सवाल है। इसके लिये अभिव्यक्ति की आज़ादी पर विभिन्न रूपों में आने वाले संकट के खिलाफ जहां पत्रकारिता को महौल बनाया होगा, वहीं पर अपने घर को भी ठीक करना होगा। विचारों की अभिव्यक्ति एवं लेखन की स्वतंत्रता के दुरूपयोग अथवा उसके किसी से प्रभावित होकर एकांगी और असंतुलित होने के कुचक्र से भी बचना होगा।  पत्रकारिता और समाचार-पत्र दोनों बड़ी शक्ति हैं। दोनों की बड़ी जिम्मेदारी को देखते हुए दोनों की समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता एवं अपने उद्ददेश्य के प्रति निष्ठा ज़रूरी है। महात्मा गांधी ने 18 फरवरी,1939 के ‘हरिजन’ के अंक में लिखा था, ‘वे समाचार पत्र, जो असत्य और अतिश्योक्ति में उलझे रहते हैं, अपने उद्देश्यों का अहित करते हैं। इसी प्रकार ‘माई एक्स्पेरिमेंट विद ट्रुथ’ में उन्होंने लिखा- ‘समाचार-पत्र एक बड़ी शक्ति है, लेकिन जिस प्रकार एक अनियंत्रित जलधारा गांवों को जलमग्न करके फसलों को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार एक अनियंत्रित लेखनी सेवा के बजाय नुकसान ही करती है। यदि यह नियंत्रण बाहर से हैं, तो यह नियंत्रण अधिक विषैला है। यह तभी हितकर हो सकता है, जबकि यह नियंत्रण आंतरिक हो।’ ज़ाहिर है कि पत्रकारिता तब तक जनमानस को प्रेरित एवं प्रभावित कर सकती है, जब तक सत्य का वरण एवं अन्याय का प्रतिकार करती रहे। श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के ये शब्द महत्वपूर्ण हैं- ‘मैं पत्रकार को सत्य का पुजारी मानता हूँ। सत्य को प्रकाशित करने के लिये वह मोमबत्ती की भांति जलता है।’ जो विधा इतनी महत्वपूर्ण, उपयोगी, समाज को प्रभावित करने वाली एवं सार्थक है, उसे शिक्षक एवं प्रशिक्षण से संवारने की एवं ठोस आधार दिये जाने की ज़रूरत है। यह शिक्षण-प्रशिक्षण ऐसी होना चाहिये जो प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक पक्ष से सीधा जुड़ा हो। शिक्षण-प्रशिक्षण की सही व्यवस्था से व्यवसाय में संजीदा लोग आयेंगे और      अंधी भरती पर कुछ रोक लगने से जिम्मेदारी की भावना पैदा करना आसान होगा। इससे पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने एवं सब तरफ की गिरावट के विरूद्ध माहौल बनाने में मदद मिलेगी। जापान में जहां पत्रकारिकता के शिक्षण-प्रशिक्षण की शुरूआत 1932 में हुई इसके शिक्षण -प्रशिक्षण से सनसनीखेज, गौरजिम्मेदार और उग्रवादी पत्रकारिता को काबू में लाने में संपादाकों को बहुत सफलता मिली। संचार तकनीकी में क्रांति से सूचना देने और पहुंचाने की गति बढ़ी है। उससे कुशलता भी बढ़ी है। यूरोपीय देशों और अमेरिका में भी इसके शिक्षण-प्रशिक्षण की बड़े पैमाने पर व्यवस्था है। आने वाले समय में संचार की तकनीक, पत्रकारिता, संचार और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र मेें अहम रोल अदा करेगी। सूचना और जानकारी के खुले प्रसार से अनेक देशों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सुधार आये हैं। यहां तक कि पुराने ढांचे बदल गये हैं। इससे जनता में नया माहौल और नया नजरिया बनाने में मदद मिलती है।  आज के हालात पर माखनलाल चतुर्वेदी की आज़ादी मिलने के तुरंत बाद के वर्ष में की गयी टिप्पणी कितनी सटीक बैठती है- ‘कितने संकट के दिन हैं ये। व्यक्ति ऐसे चैराहे पर खड़ा है जहां भूख की बाजार-दर बढ़ गयी है और पायी हुई स्वतंत्रता की बाज़ार-दर घट गयी है। पेट के ऊपर हृदय और सिर रखकर चलने वाला भारतीय मानव मानों हृदय और सिर पर पेट रखकर चल रहा है। खाद्य पदार्थों की बाजार-दर बढ़ी हुई है और चरित्र की बाजार-दर गिर गयी है।’ गम्भीर संकट की और नैतिक गिरावट की ऐसी परिस्थिति मंे मानसिकता और माहौल के बदलने का कार्य उद्देश्य के प्रति समर्पित पत्रकारिता ही कर सकती है। अकसर विवाद तो उठता है कि पत्रकारिता किसके लिये समर्पित है? मालिक के प्रति, पाठक के प्रति? राजनेताओं या राजनीतिक गिरोहों के प्रति या समूचे समाज के प्रति? शासन-सत्ता के प्रति या खास राजनीतिक विचाराधारा के प्रति? अथवा किसी भाषा, जाति, क्षेत्र और संप्रदाय के प्रति? या फिर समूची मानवता के प्रति? इस सवाल के उत्तर का संकेत फिर हमें देश और देशभक्ति के लिये समर्पित पत्रकारिता के प्रमुख उन्नायक दादा मानखलाल चतुर्वेदी के शब्दों में मिलता है- ‘हमारा पथ वही होगा जिस पर सारा संसार सुगमता से जा सके। उसमें छत्र धारण किये हुए, चंवर से शोभित सिर की भी वही कमीत होगी, जो कृषकाय, लकड़ी के भार से दबे मजदूर की होगी। हम मुक्ति के उपासक हैं। राजनीति या समाज में, साहित्य में या धर्म में, जहां भी हमारा पथ रोका जायेगा, ठोकर मारने वाले का प्रहार और घातक के शस्त्र का पहला वार आदर से लेकर मुक्ति के लिये हम प्रस्तुत रहेंगे। दासता से हमारा मतभेद रहेगा, फिर वह शरीर की हो या मन की, शासकों की हो या शासितों की।’ पत्रकारिता का इससे सही स्वरूप और उद्देश्य और क्या हो सकता है? लेकिन इसके लिये सबसे पहले पत्रकार, समाचार-पत्र और पत्रकारिता-व्यवसाय को ही पहल करनी होगी। पत्रकारिता जनजीवन का सब कुछ है, ऐसा नहीं है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है और इसका रोल भी महत्वपूर्ण है, यह तो स्वीकार करना ही होगा। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 1. हिन्दी पत्रकारिता की रूपरेखा – एन0सी0 पंत2. भारतीय मीडिया- अन्तरंग पहचान – स0 डाॅ0 स्मिता मिश्रा3. हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम – डाॅ0 वेद प्रकाश वैदिक4. हंस पत्रिका – स0 राजेन्द्र यादव (जून 2010 ई0)5. माखन लाल चतुर्वेदी रचनावली – स0 श्रीकान्त जोशी6. पत्रकारिता के क्षितिज – 1. डाॅ0 सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’2. डाॅ0 अर्जुन सिंह शिशौदिया7. पत्रकारिता: इतिहास और प्रश्न – कृष्ण बिहारी मिश्र8. पत्रकारिता के युग निर्माता माखनलाल चतुर्वेदी – शिव कुमार अवस्थी9. इतिहास- निर्माता- पत्रकार – डाॅ0 अर्जुन तिवारी10. हिन्दी का गद्य- साहित्य – डाॅ0 रामचन्द्र तिवारी11. भारत में प्रेस कानून और पत्रकारिता – 1. गंगा प्रसाद ठाकुर13. शिव अनुराग पटैरया13. कर्मवीर (साप्ताहिक) खण्डवा – सं0 माखनलाल चतुर्वेदी13. पाखी (अगस्त 2012) मासिक पृष्ठ सं0-76 – सं0 प्रेम भारद्वाज15. पाखी मासिक पत्रिका (अगस्त 2012) – सम्पादक प्रेम भारद्वाज  लेखक परांजाॅय गुहा ठाकुरता (पृष्ठ सं0-59)16. पत्रकारिता के विविध आयाम – संदीप कुमार श्रीवास्तव17. पत्रकारिता के विभिन्न स्वरूप – ज्ञानेन्द्र रावत18. हिन्दी पत्रकारिता: स्वरूप और आयाम – राधेश्याम शर्मा

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